Showing posts with label आलेख. Show all posts
Showing posts with label आलेख. Show all posts

Monday, November 29, 2010

स्त्री पर विमर्श ...फेक बुक

अशोक कुमार पाण्डेय जी के फेस बुक प्रोफाइल पर हुए "स्त्री पर विमर्श" को मैं उनके अनुमोदन की अपेक्षा के  साथ मित्रो के साथ साझा करने हेतु...सिलसिलेवार कुछ अंकों में पोस्ट कर रहा हूँ.....

एक पोस्ट पर की गयी टिप्पणी के बाद तमाम महिला मित्रों ने वहाँ भी और अलग से भी कहा कि भाई औरतें घर का काम अपनी ख़ुशी से करती हैं। यह स्वाभाविक है। अक्सर नौकर ख़ुशी से सेवा करना सीख जाते हैं…प्रभावी वर्ग की विचारधारा को स्थापित कर दिया जाता है सबकी विचारधारा के रूप में…यह कन्डीशनिंग कैसे होती है इसे सबसे अच्छी तरह से औरतों के संदर्भ में समझा जा सकता है कि कैसे जिन चीज़ों को उनकी स्वतंत्रता तथा यौनिकता को नियंत्रित करने के लिये लागू किया गया था वे उनसे ऐसी कण्डीशन हुईं कि उसे स्वाभाविक फ़र्ज़ मान बैठीं।


Lovely Goswami मैं तो घर के काम "ख़ुशी से" नही करती हूँ ...
November 25 at 9:52am · LikeUnlike · 3 peopleAshok Kumar Pandey and 2 others like this..

Sameer Yadav  यह 'स्मृति' लोप का शिकार क्यों नहीं होती...?
November 25 at 10:28am · LikeUnlike.

Atul Arora  - koi bhi kaam kaun khushi se karta hai ..daam milta hai to kaam hota hai ...usmein bhi alienation ka element to rahta hai hai ..main apne ghar mein maalik nahin ,ghar ke naukar ki tarah se hi hoon aur is se bachaav bhi nahin kyonki main ghar... ko chalaayemaan chaahta hoon . .mere liye ghar amoort nahin hai ..ek jeevit organic shakhsiyat hai jise agar aap marney nahin dena chaahtey --apney rahte -apney liye ..apneyi nourishment ke liye to yah karney mein sharm kyon aur ghar ki vyavastha ka naukar honey mein shoshan kaisa...?

'Manu Smriti' ke shadyantra ka main hissa nahin hoon ...main nahin jaanta koi smriti itani kroor aur aatankvaadi kaisey ho sakti hai ...iska virodh ho raha hai to bura nahin hai ... Jalaa diye jaaney chahiyein aise nirdesh ...kam se kam humein apni smriti zaroor saaf rakhni chahiyey...See More
November 25 at 10:30am · LikeUnlike · 3 people

Nirmal Paneri निर्मल पानेरी जी -बहुत बढ़िया ....दो इंसानों का प्यार भरा मिलन ...इस्वर के प्रेम का रास्ता ....और दो इंसानों का बेर ....राक्षस सिय गुण का मिलन !!!!!!!!!आब चाहे वो स्त्री स्त्री हो या पुरुष स्त्री हो ..या पुरुष पुरुष हो ....अलग अलग इंसानों और अलग अलग विचारधाराओं से इतिहास ...ने हम सब के बीच गुण की बात को गोण कर दिया है ...और सब आपनी अपनी ढपल बजने पर उतारू हो गए है ....बस विसगातिया वही से चालू हुई है ....मेरा मनना है ये !!!!!!!!!!!!!!
November 25 at 10:41am · LikeUnlike · 2 people

Ernest Albert- MEOW FM पर अनिल श्रीवस्ता ने एक कार्यक्रम तीन महीने चलाया था कमोबेश इसी विषय पे ! उसे सुनना चाहिए, एक अच्छा दस्तावेज़ जहाँ दिल्ली की हजारों सभ्रांत महिलाओं ने "खुल कर" इस स्टीरियोटाइप को सिरे से ख़ारिज ही नहीं किया, इसके विरोध में कमाल की ...बातें सहजता से कह डाली ! अपना देश ख़ासा ही दोगला, तीगला है जी ..जिस जिस को माँ कहता है , चाहे वो गंगा , गौ या अपनी हजारों देवियाँ , उनमें, उनके आसपास मूत्रालय , अधजली लाशें डालता जाता, खाप पंचायत खड़ी करता जाता ! किसी भी 'माता" का रोटी बनाता, झाडू लगाता पोस्टर आज तक तो देखा नहीं....तो औरत से ये सब किसने "कहा होगा", ये इंट्रेस्टिंग रहेगा जानना !पर अब तो जमाना आ गया की अपनी ही कम उम्र बेटिओं , बहनों को हम खुद कामुक कपडे पहना कर, कामुक गानों पर कामुक ठुमके लगाने के लिए स्टेज पर परोस देते और खुद उनकी विडिओ बनाने में झूमते ! और ऐसी "गति" के फेवर में नैतिकताएं भी बना ली गईं है, गढ़ ली गयी हैं ! अपने को बुरा नहीं लगता ये सब, बुरा तब लगता है जब मोरल पोलिसिंग वाले त्रिशूल उठा कर रुदाली बनते हैं ! रही बात निगरानी की...छोडो जी, द्रौपदी युग दस्तक दे रहा, आदमी अपनी निगरानी को तैयार रहे ! शुक्रिया अशोक भाई !
November 25 at 1:38pm · UnlikeLike · 5 peopleYou, Ashok Kumar Pandey and 3 others like this.

Aparna Manoj -यदि शोषण की बात है तो विरोध .. लेकिन घर के काम बेमन तो नहीं ही करते हैं ... बच्चों को और सारे घर की पसंद का बनाने में अलग मज़ा मिलता है ... कभी ऐसा नहीं लगा कि थोपा हुआ काम है .. ये भी एक skill है . किसी की रूचि है , तो वहाँ उत्पीड़न नहीं क...हलायेगा . मनु के ये नियम स्थापित थे.. आज व्यावहारिक रूप से इन्हें कितनी स्वीकृति मिली हुई है ... आम इंसान तो इन स्मृतियों को जानता तक नहीं ... वैसे आजकल दाम्पत्य में इतनी breathing space तो मिली हुई है ... लडकियां सचेत हैं ; अधिकारों के लिए .. ग्रामीण परिवेश में भी शुभ बदलाव आने लगा है ... शुरुआत तो कह सकते हैं इसे .
कल उड़ीसा की एक जनजाति के बारे में (शायद ओंजेस ) पढ़ रहे थे कि स्त्री पर यदि शंका हो जाए तो उसे अग्नि परीक्षा देनी होती है .. गरम अलाव हाथ में लेकर साक्षी मानना होता है ... हाँ , इन दुष्प्रवृतियों पर ध्यान केन्द्रित हो तो बेहतर ... और भी कई एक हैं जिन्हें समूल नष्ट करना ज़रूरी है .. किन्तु आमूल चूल परिवर्तन सरकारी नियम बनाने से संभव है और उनका पालन ठीक से हो ये देखना ज़रूरी है.
November 25 at 1:57pm · LikeUnlike · 4 people Amrendra Nath Tripathi and 3 others like this..

Vandana Sharma -आप कितना भी तर्क देते रहिये हम मनु स्मृति को बिना पढ़े भी इतना आत्मसात किये हैं कि ''नारी तुम केवल श्रद्धा हो '' को किनारे रख कुछ नही सोचेंगे ..हमारे 'मालिक' बड़े क्रपालु दयालु स्नेही और आज़ाद ख्यालों के हैं खाने पहनने कि आजादी है गिफ्ट, शाबाशी ...मिलती है ..उनके लिए क्या इतना भी न करें समाज परिवार सब बिखर जाएगा भई ..काम काज का बटवारा तो करना ही पड़ेगा .अब तो.सुपर वुमन हैं ..घर बाहर सब सभाल लेती हैं,घर तो घरवाली का है घर में चार पैसे आयें सो नौकरी करने कि आजादी भी है.ये सब करके संतोष और कंट्रोल का अहसास भी हो रहा है.पत्नी का धर्म जननी का फर्ज बहू के कर्तव्य.. कैसे होगा भला आखिरी बात.. ''जब मुझे प्रोब्लम नही तो कहीं प्रोब्लम नही'' समझे क्या ?
November 25 at 1:58pm · LikeUnlike · 3 people Ashok Kumar Pandey and 2 others like this..

Sameer Yadav -प्रसंगवश...... क़ल इसी प्रकार की चर्चा के दौरान एक पिता पश्चाताप करते हुए बता रहे थे कि कुछ दिनों पहले मैं अपनी विवाह योग्य पुत्री को पूर्व अनुमति लेकर साइबर केफे जाने पर २ घंटे बाद भी घर नहीं लौटने पर मोबाइल लगाकर पूछने लगा कि कहाँ हो...... अब तक क्यों नहीं लौटी.....वहाँ क्या कर रही हो...आदि आदि ! जबकि उसके पहले से बाहर गए पुत्र के लिए कोई चिंता नहीं की....बावजूद इसके कि पुत्री मुंबई के किसी मेनेजमेंट संस्था में अध्ययनरत भी है. मैं भी उस पिता के असमंजस में उलझा हूँ कि इसे एक पिता की पुत्री के प्रति स्वाभाविक स्नेहिल-चिंता कहें या फिर अवचेतन में आत्मसात मनुस्मृति का कुप्रभाव.
November 25 at 2:50pm · LikeUnlike · 2 peopleAshok Kumar Pandey and Rajeev Kumar like this..

Thursday, October 23, 2008

ब्रेन मेपिंग और नार्को टेस्ट....!!!

.............................देश के अग्रणी मानसिक स्वास्थ्य संस्थान "नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस" के निदेशक की अगुआई में बनी विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की छः सदस्यीय कमेटी ने ब्रेन मेपिंग के सन्दर्भ में अपने जिन निष्कर्षों का खुलासा किया है, वह काफी अहमियत रखते हैं......आइये देखते आज के समय में सर्वाधिक चर्चित टेस्ट की हकीक़त और फ़साना क्या है..!!!..............................उपरोक्त कमेटी में देश के अन्य अग्रणी संस्थानों के बिहेविरियल एंड कोगनिटिव साइंस, साइको फार्माकोलाजी, साइकिआत्री, फोरेंसिक साइंस जैसे अहम् विषयों के जानकार शामिल थे, जिन्होंने ब्रेन मेपिंग के बारे में अपने अध्ययन को अंजाम दिया. सभी जानते हैं कि आपराधिक घटनाओं में या आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्तता की पड़ताल करने के लिए इन दिनों नार्को परीक्षण के साथ-साथ ब्रेन मेपिंग परीक्षण का बोलबाला भी बढ़ा है. ब्रेन मेपिंग में अभियुक्त को कंप्यूटर से जुडा एक हेलमेट पहनाया जाता है. जिसमें कई सेंसर और इलेक्ट्रोनिक उपकरण लगे होते हैं. फ़िर जाँच अधिकारी एवम फोरेंसिक विशेषज्ञ की मौजूदगी में उसे अपराध से जुड़ी तस्वीरें दिखाई जाती है. इसे देखकर अभियुक्त के दिमाग में उठी हलचलों की इलेक्ट्रिकल फिजिओलाजिकल गतिविधियों का विश्लेषण किया जाता है. अपराध विज्ञान में उपकरण के तौर पर काम करने के लिए एक ऐसी प्रक्रिया की जरुरत होती है जिसमें ग़लत होने की संभावना समाहित हो. बंगलौर और गांधीनगर आदि स्थानों पर जहाँ यह परीक्षण किया जाता है, क्या वहाँ इस कारक को मद्देनजर रखा गया है ?
................................वैसे सिर्फ़ ब्रेन मेपिंग नहीं अपितु नार्को टेस्ट की वैज्ञानिकता पर भी बहुत पहले सवाल खड़े किए जा चुके है. यह जानना भी दिलचस्प है कि अपने यहाँ भले ही नार्को टेस्ट लोगों को नया नजर आता हो, विकसित देशों में तो वह वर्ष 1922 में मुख्यधारा का हिस्सा बना था जब राबर्ट हाउस नामक टेक्सास के डॉक्टर ने स्कोपोलामिन नामक ड्रग का दो कैदियों पर प्रयोग किया था. दरअसल नार्को एनालिसिस टेस्ट एक फोरेंसिक टेस्ट है, जिसे टेस्ट जाँच अधिकारी, मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर और फोरेंसिक एक्सपर्ट की मौजूदगी में अंजाम दिया जाता है. इसमे संदिग्ध व्यक्ति को सोडियम पेंताथेल नामक केमिकल का इंजेक्शन दिया जाता है. जिससे न केवल वह अर्ध बेहोशी की हालत में चला जाता है बल्कि उसकी तर्क बुद्धि / रिजिनिंग भी ख़तम हो जाती है. और फ़िर उससे सवाल पूछ कर जानकारी उगलवाई जाती है. वह व्यक्ति जो एक तरह से सम्मोहन अवस्था में चला जाता है वह अपनी तरफ़ से ज्यादा कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होता बल्कि पूछे गए कुछ सवालों के बारे में कुछ बता सकता है. जो लोग यह मानते है कि नार्को टेस्ट में व्यक्ति हमेशा सच ही उगलता है, दरअसल उस अवस्था में भी वह झूठ बोल सकता है, विशेषज्ञों को भरमा सकता है.
................................जहाँ विकसित दुनिया के बाकी हिस्सों ने ऐसे टेस्ट को इन्वेस्टीगेशन से मुख्य रूप से पृथक कर दिया हो, ज्यादातर डेमोक्रेट दुनिया जिनमे अमेरिका और ब्रिटेन भी शामिल हैं, वहाँ ऐसे टेस्ट कुछ समय से लुप्त प्राय जैसे हैं जबकि हमारे देश में ऐसे टेस्ट की लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है. किसी अपराध के संदिग्ध को पकड़ते ही लोग उसके नार्को टेस्ट की मांग करने लगते हैं कि इनका अगर नार्को टेस्ट हो जाए तो सच्चाई उगल ही देंगे. संविधान का एक अहम् तत्त्व है article - 20[3] जो कहता है कि "किसी व्यक्ति को जिस पर कोई आरोप लगे हैं, उसे अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा." अगर नार्को टेस्ट की बुनियादी अंतर्वस्तु को समझाने की कोशिश करेंगे तो इसके जरिये व्यक्ति को एक तरह से अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की संभावना रहती है. लेकिन विगत कुछ निर्णयों में माननीय न्यायालयों के द्वारा टेस्ट के पक्ष में मत दिया गया है.

.................................इसमें कोई दो राय नहीं कि नार्को टेस्ट में कोई व्यक्ति कुछ भी प्रलाप करे या कबूल करे. अपराध को साबित करने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता होती ही है . टेस्ट से प्राप्त जानकारी को विवेचना में अन्य सूत्रों से कोरोबोरेट करने और सुसंगत बनाने के लिए उपयोग किया जाता रहा है. अभियुक्त को दवा पिलाकर उससे जानकारी लेने की इस कोशिश को चेन्नई एवम मुंबई हाईकोर्ट ने "यातना के श्रेणी" में रखने से मना किया और ऐसा तर्क दिया कि अभियुक्त को भले ही उसकी इच्छा के विरुद्ध प्रयोगशाला में ले जाया जाए, लेकिन टेस्ट के दौरान वह जो बात प्रगट करे, वे स्वैच्छिक हो सकती है. .................................वर्ष 2000 में तत्कालीन सरकार की सदारत में आपराधिक न्याय प्रणाली को सुधारने के लिए जो मलिमथ कमेटी बनी थी उसके जरिये कानून में सकारात्मक परिवर्तन की यही कोशिश हम देख सकते है. दरअसल नार्को टेस्ट को लेकर अमेरिकी गुप्तचर एजेन्सी सीआईए, जिसने शीत युद्ध के दौर में इसे आजमाकर सच उगलवाने की खूब कोशिश की थी, के अनुभव बहुत उत्साहजनक नहीं थे. उपरोक्त कमेटी ने भी अपने अध्ययन में इन नार्को टेस्ट को लेकर अवैज्ञानिक और सबूतों के तौर पर इस्तेमाल पर रोक लगाने की अनुसंशा की है. अतएव मामला अब कानून निर्माता सरकार, इन्वेस्टीगेशन एजेन्सी और न्यायालय के बीच है.....कि इस चर्चित अपराध अनुसंधान परीक्षण को किस रूप में उपयोगी बनाये रखा जाये.

--

Tuesday, October 21, 2008

शहीद पुलिस

शायद शीर्षक पढ़कर अनेक लोगों को विश्वास ही नहीं होगा....होना भी नहीं चाहिए. ये तो 21 अक्टूबर "शहीद दिवस" हर साल मनाते हैं, इसलिए 'पुलिस' के साथ 'शहीद' लिख दिया.


पुलिस शहीद हो नहीं सकती, कैसे होगी जो समाज में व्याप्त सभी बुराइयों से वास्ता रखती है. उसके मृत्यु को शहीद का दर्जा दे भी तो कैसे.....???

@ जो भर्ती तो करती है ऊंचे आदर्शों और मानदंडों के साथ लेकिन यह छूट जातें हैं... प्रशिक्षण काल में ही.
@ जो अभी भी उन्हीं प्रशिक्षण तकनीक और उपकरणों को उपयोग कर जवान तैयार कर रही है जो वर्षों पहले [ जिसे तकियाकलाम में अंग्रेज जमाना या 1865 माडल कहतें हैं ] नकार दिए गये हैं.
@ जिस एजेन्सी की संख्या बल रोज बढती जनसंख्या और अपराध के अनुपात में हास्यास्पद अंक यथा नगण्य तक है. [ पुलिस में अक्सर इसे हौसला अफजाई के जुमले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है कि एक सिपाही पूरे गाँव को हड़का आएगा और एक थानेदार अपने इलाके का मालिक होता है ] पर अब हकीकत क्या है, चैतन्य होती जनता संग अपराधी समझने लगी है.
@ जो सूचना देने पर [ ख़ुद से पाने पर नहीं भई ] भी अपने आधुनिक वेशभूषा, वाहन, उपकरण और अस्त्र-शस्त्र के साथ घटना स्थल पर सायरन बजाते मुंबई फिल्मों की तरह नाटकीय रूप से कई घंटों बाद पहुंचती है.
@ जो बिना अपशब्द के बात और बिना तरलता के काम नहीं करती है.
@ जो आम से दूर होकर सदैव ख़ास के पास की ड्यूटी करती है.@ जो 24 घंटे में कोई काम के घंटे तय न होने पर भी लगातार ड्यूटी करती है.
@ जिसमें एक ही जवान सफ़ेद वस्त्रधारियों की सुरक्षा, अपराध विवेचना, पतासाजी, धर पकड़ से लेकर मण्डी-मेले और ट्रैफिक की व्यवस्था सब में पारंगत होने जैसे कर लेता हो.
@ जो भ्रष्टाचार के इंडेक्स में 17 वें क्रमांक पर है, [ पहले 16 के बारे में आपको मालुम होगा, शायद..? ]
@ जिसके काम करने पर कभी-कभार यह कह दिया जाता है, कि ठीक है !!! यह तो उसका काम ही है. और बिगड़ने पर दूसरों की अकर्मण्यता का ठीकरा भी अक्सर उस पर ही फूटता हो.
@ जिसके फील्ड पर ड्यूटी करने वाले 55-60 साल के कांस्टेबल/ हेड कांस्टेबल भी जवान कहलाते हैं. सो काम भी जवानों की तरह करने पड़ते हैं.
@ जिसके 80 प्रतिशत कार्यकारी एवं पर्यवेक्षण अधिकारी अभी भी कंप्यूटर निरक्षर हैं. इस पर अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रम और नए पुलिस उपयोगी सॉफ्टवेर उपयोग कर हार जाने के बाद.
@ जिससे हम अनुशासित भारतीय नागरिकों के बीच कार्य करते हुए सदभावना, सद्व्यहार और दयालुता की उम्मीद हमेशा पश्चिमी पुलिस की क्षमता और तत्परता के साथ की जाती है. [ एक प्रसंग : एक.....ट्रैफिक पुलिस ने एक बाइक सवार को वाहन के आवश्यक कागजात चेक करने को रोका, वह बड़ी हिकारत वाली मुद्रा बनाकर रुका क्योंकि अन्य लोग भी रोके जा रहे थे, फ़िर उसने आवश्यक जांच से पहले ही अपने सेल फोन से किसी को कॉल मिलाकर पुलिस को पकड़ा दिया,... पुलिस वाला खीसें निपोर कर तत्काल उसे जाने के लिए कहता है....| दूसरा....फ़िर भी दस्तावेज चेक कर 50/- रुपये जुर्माना राशि जमा करने कहता है, किंतु वह बाइक सवार विशेष नागरिक अपने सेल फोन का लगभग 100/- कई विशेषाधिकारियों को फोन लगाने में खर्च कर बिना जुर्माने की रकम अदा किए वहाँ से जाने में सफल हो जाता है.]
@ जिसके पास कानूनी अधिकार ही होता है, क्योंकि वह जिनके लिए काम करती है, केवल उनका मानव अधिकार होता है.

अरे कहाँ भूल-भुलैया में रह गया .........!!!!
फ़िर भी इस वर्ष- 2007-2008 के दौरान एक वर्ष की अवधि में 3000 से अधिक पुलिस जवान शहीद * हुए. जिनकी याद-सम्मान में आज 21 अक्टूबर को पुलिस शहीद दिवस मानती है. आखिर क्यों ? और क्यों ?......????
{ *शहीद-- याने की ड्यूटी के दौरान अपने कर्तव्य निभाते मृत्यु. }
उन सभी कर्तव्यनिष्ठ जांबांज शहीद पुलिस को मेरा सादर नमन....सेल्यूट .<

Tuesday, October 14, 2008

टिपियाने का मतबल....गिनती बढ़ाना और हक़ पाना है क्या..???



इसे लिखने हेतु प्रेरणा स्त्रोत हैं सम्मानीय समीर जी और नीशू जी
पहले उन्हें अभिवादन !! फ़िर टिपियाना शुरू.......


ब्लॉग लेखन की दुनिया में टिप्पणी को इतना महत्त्व आख़िर क्यों मिला ? इसका मूल कारण है. ब्लॉग में विसिटर्स की पहचान और संख्या याने ट्रैफिक का सही जानकारी नहीं हो पाना है. हम अपनी पोस्ट रचना पर सुधी ब्लागर्स के टीप की अधीरता मय व्यग्रता से प्रतीक्षा इसीलिए करते हैं कि उस रचना के सम्बन्ध में लोगों की राय क्या है.

लेकिन यह भी सोचने का विषय है कि किसी भी क्रिया, प्रतिक्रिया और उसको लिखने, पढ़ने वाले कि कोई सीमा है कि नहीं. व्यक्ति विशेष की पठन पाठन, पसंद, नेट कनेक्शन की गति, ब्लागर के मति की गति, समय और फ़िर ब्लॉग अथवा ब्लागर विशेष से लगाव ......और पता नहीं कितने ऐसे कारक हैं, जिनसे किसी पोस्ट विशेष पर टिप्पणी लेखन निर्भर करता है. यह शिकायत आम है कि बहुत सुंदर, उम्दा, बढ़िया, आभार, धन्यवाद, जारी रहें से उस वक्त लिख रहे टिप्पणीकर्ता के अतिरिक्त सभी को एलर्जी है..सभी चाहते हैं कि वह लिखे या न लिखे लेकिन उसके पोस्ट पर विस्तृत, विश्लेषणात्मक, भावनात्मक टिप्पणी जरुर लिखी जाये. पर यह सम्भव है या नहीं यही तो चर्चा का विषय है, और इंशा-अल्लाह आगे भी बना रहेगा.

अब इस पर ज्ञान, सलाह तो यह भी दी जायेगी कि " भईया अजीरण होते तक न पढिये...के टीपे करने लायक न रह जाए. वैसे तो " .टिप्पणियों को अनेक प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है....एक वो जो सबको भाती है, दूसरी वो जो ठीक लगती है पोस्टकर्ता और अन्य टीपाकारों को, तीसरी वो जो केवल टीपाकार को ही ठीक लगती है कि हाजिरी लग गई अब हक़ बन गया हमारा इन पर, एवम पोस्टकर्ता को गिनती बढ़ने का संबल देती और चौथी वो चेहरा छुपाये टीप जो स्वयं टीपाकार को टीस देती है और शेष को तो एलर्जिक जैसी ही होती है. टीप पर अनूप जी से प्रेरणा लेना श्रेयस्कर होगा जो अनेक टीपकारों के गुरु समान हो सकते हैं..एक लाइना में जो ब्लॉग का विषयवस्तु , शीर्षक का अवलोकन कर तुकांत कटार जैसी टीप देते हैं, वह न केवल संबंधित ब्लागर को अपितु अन्य विचरणकर्ता को भी वहां विसीट करने, न करने का मार्ग प्रशस्त कर देता है. क्या इस तरह की सारगर्भित टीप किसी भी ब्लोगर को अस्वीकार होगी. हो भी सकती है भइया...."'एक लाइना" कई बार केवल पोस्ट की लिंक बतौर ही होती है क्योंकि पोस्ट का शीर्षक पढ़कर तुकांत टीप लिख देना आप से अपेक्षित नहीं होता है. पर "चिठ्ठा चर्चा" का उद्येश्य पृथक होने से यह टीप की श्रेणी में आता है या नहीं यह भी चर्चा का विषय है."

मज़बूरी में अजीरण का रोग कई लोगों ने लगा रखा है..कोई निर्धारित.समय न होने का, नेट पर लगातार बैठकर शेष कार्यों से दूर होने का और फ़िर बचे हुए समय में रचनाओं के सम्बन्ध में सोचकर थकने का.

एक खास बात पर भी खूब मानसिक द्वंद और बहस होती है बल्कि कुछ ब्लागर ने बाकायदा "टिप्पणी चौकोर' के ऊपर उनकी आगत टीपाकार से क्या अपेक्षाएं है संकेत रूप में लिख रखा है. बाबा भावनाओं को समझो और वैसे ही टिपियाओ. कुछ ने निरापद होने और कुछ ने टीप को ही सबकुछ मान लेने जैसा भी संकेत किया हुआ है लेकिन एक अदद टिप्पणी कि चाह तो .....तो है.

लेकिन अपेक्षाओं की बयार इतनी दबाव लिए होती है कि टीप करनी ही है तो फ़िर सहज-सुलभ मार्ग तो अपनाया जायेगा ही. टिप्पणी को जब तक ब्लॉग में उपस्थिति के द्योतक के रूप में प्रतिष्टा मिली रहेगी यह प्रश्न बार-बार सभी ब्लागर बंधुओं के विचार में कौंधता रहेगा. इसलिए मेरा तकनीकी रूप से विशेषज्ञ ब्लागर भाइयों...रवि रतलामी , संजय बेंगानी, पंकज जी, श्रीश जी, समीर जी एवम अनेक....अन्य से निवेदन है कि वह ब्लॉग विसिटर्स की संख्या एवम उनके पहचान हेतु कोई तकनीक उपलब्ध हो तो कृपया हम सबको बतायें या न हो तो अविलम्ब उपलब्धता के लिए प्रयास करें.

फिलहाल यहीं तक, वैसे तो टिप्पणी पुराण बहुत जगह दे रही है, मुझे कुछ भी टिपियाने की. लेकिन मुझे लग रहा है कि इतना लिखने पर ही मुझे बहुत से टीप मिल जायेंगे. तो लालच बुरी बला से सराबोर यह टिप्पणी यही पर ख़तम .

टिप्पणी पर कभी फ़िर "टिपियाया" जायेगा....इसके लिए जरुरी है आप सब इस पर अच्छी टीप जरुर टिपिया दें . बिना टिपियाये या टिपिया के चलते न बने......वरना एक और झेलाऊ पोस्ट के लिए फ़िर तैयार रहिएगा.
.हा हा....हा....!

Friday, October 10, 2008

चालान की प्रति और करोड़ों का खेल





जबलपुर ही नहीं वरन समूचे मध्यप्रदेश में "चालान" की प्रति के नाम पर लाखों- करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार का खुला खेल वर्षों से चल रहा है. किसी भी आपराधिक प्रकरण में जल्द न्याय हो इसके लिए न्यायालय में समय से चालान पेश होने की महत्ता अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है . कानून निर्माताओं ने दंड प्रक्रिया संहिता में ऐसे प्रावधान किये हैं कि आपराधिक प्रकरण में प्रत्येक आरोपी को चालान एवम उसमे संलग्न पुलिस के दस्तावेजों की निःशुल्क प्रतिलिपि अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाए. अनुशासन की दुहाई देने वाले पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस बात पर चुप्पी साधे बैठे हैं कि आरोपी को चालान की प्रतिलिपि उपलब्ध कराना किसकी जिम्मेदारी है. वहीं न्यायालय में चालान पेश करने की जिम्मेदारी का निर्वहन करने वाला पुलिस कर्मचारी नासूर बन चुकी ऐसी पीड़ा झेल रहा है जिसे वह खुलकर व्यक्त भी नहीं कर सकता. दरअसल विभाग के इन्हीं कर्मचारियों पर जिम्मेदारी थोप दी जाती है कि वे आरोपी को चालान व पुलिस के दस्तावेजों की प्रतिलिपि उपलब्ध कराये. मध्यप्रदेश शासन पुलिस विभाग को दस्तावेजों की फोटोकॉपी के लिए पृथक से कोई भी बजट उपलब्ध नहीं करता है और यदि ऐसे में समस्त दस्तावेजों की फोटोकॉपी के लिए पुलिस कर्मी आरोपी से रुपये की मांग करता है तो सीधे सीधे दंड प्रक्रिया की धारा 207 में बनाये गए कानून का उल्लंघन होता है. यदि ये पुलिस कर्मी कानून का पालन करता है तो फोटोकॉपी ले लिए उसे अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है जो अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण बनता है.






दृश्य एक


..........चोरी के एक मामले में पुलिस ने १० लोगों के खिलाफ विवेचना में सबूत जुटाये और प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत करने की स्थिति बनी. मामले की विवेचना करने वाले पुलिस कर्मी की धड़कने उस वक्त बढ़ने लगी जब आरोपियों को सैकड़ों पन्नों के दस्तावेजों की फोटोकॉपी देने का समय आया . पुलिस कर्मी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 का पालन नहीं किया और कानून का भय दिखाकर आरोपियों से फोटोकॉपी के पैसे वसूल लिए . खास बात यह है कि पुलिस कर्मी ने आरोपियों से फोटोकॉपी में खर्च होने वाली राशि की तुलना में कुछ ज्यादा ही पैसे वसूल लिए.



दृश्य दो


........... एक आपराधिक प्रकरण में नियम कानून जानने वाले कुछ आरोपी या कह ले रसूखदार आरोपी इस बात पर अड़ गये कि चालान की फोटोकॉपी के पैसे वे नहीं देंगे . चालान पेश करने वाला पुलिस कर्मी चिंता में पड़ गया कि तकरीबन दो हजार रुपयों का इंतजाम कहाँ से किया जाए . पुलिस कर्मी ने आधिकारियों से मदद मांगी तो उसे कोई राहत नहीं मिली, किसी तरह manage करने की बात कह कर टाल दिया गया. इस मामले में पुलिस कर्मी को अपनी जेब से ही फोटोकॉपी कराने कि नौबत आ गई, तो जाहिर है वह अपनी जेब से थोड़े ही फोटोकॉपी कराएगा.





क्या कहता है....पुलिस मेनुअल और CrPC

मध्यप्रदेश पुलिस मेनुअल एवम रेगुलेशन एक्ट कंडिका [ पेरा ] - 524 में न्यायालय अर्दली के कर्तव्यों को स्पष्ट किया गया है. रेगुलेशन के मुताबिक "तेज बुद्धि का आरक्षक" जो ठीक से लिखने और पढ़ने योग्य हो, दंडाधिकारी और उसके प्रत्येक सहायक के न्यायालय में अर्दली के रूप में पदस्थ किया जायेगा. वह दंडाधिकारी का व्यक्तिगत अर्दली नहीं है और न ही दंडाधिकारी के न्यायालय के लिपिकीय कार्य के स्टाफ को भारमुक्त करने के लिए आशयित है. वह पुलिस अभियोजक के नियंत्रण में है, जो यह देखने के लिए जिम्मेदार है कि वह [ अर्दली ] अपने कर्तव्यों को दक्षतापूर्वक करता है. वह कार्यालयीन समय में न्यायालय में उपस्थित होगा और उसके कर्तव्यों में निम्नलिखित समावेश होगा...

१. व्यवस्था बनाये रखना
२. अभियुक्त की सुरक्षित अभिरक्षा
३. हिन्दी समन्स एवम वारंट लिखना एवम जारी करना
४. न्यायालय में अपने बचत समय में मामलों की डायरी के बयानों की नक़ल करने में सहायता करना जो बचाव पक्ष के उपयोग के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 162 के अंतर्गत आवश्यक है.


..... दंड प्रक्रिया संहिता 1973

अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट या अन्य दस्तावेजों की नक़ल प्रतिलिपि देना
धारा 207 - किसी ऐसे मामले में जहाँ कारवाई पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संस्थित की गई है, मजिस्ट्रेट निम्लिखित में से प्रत्येक के एक प्रतिलिपि अभियुक्त को अविलम्ब निःशुल्क देगा

१. पुलिस रिपोर्ट
२. धारा 154 की अधीन लेखबद्ध की गई प्रथम इत्तिला रिपोर्ट [ FIR ]
३. धारा 161 की उपधारा [3] के अधीन अभिलिखित उन सभी व्यक्तियों के कथन , उनमें से किसी ऐसे भाग को छोड़कर जिनको ऐसे छोड़ने के लिए निवेदन की धारा 173 की उपधारा [6] के अधीन पुलिस अधिकारी द्वारा किया गया है.
४. धारा 164 के अधीन लेखबद्ध की गई संस्विकृतियाँ या कथन , यदि कोई हों .
५. कोई अन्य दस्तावेज या उसका सुसंगत उद्धरण जो धारा 173 की उपधारा [5] के अधीन पुलिस रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को भेजी गई है.




अभियोग पत्र या चार्ज शीट जिसे सामान्य भाषा में " चालान " कहा जाता है. पुलिस के द्वारा किसी भी अपराध की विवेचना में आरोप सिद्ध पाए जाने ऐ उपरांत आरोपियों के विरुद्ध विचारण हेतु न्यायालय में प्रस्तुत किया जाता है .

भारतीय कानून व्यवस्था में समस्त भारतीय नागरिकों को एक समान दर्जा दिया गया है. चाहे वह किसी मामले में आरोपी ही क्यों न हो..? और जब तक उसके विरुद्ध अपराध सिद्ध न हो जाये, उसे एक सामान्य नागरिक होने के रूप में समस्त अधिकार प्राप्त होते हैं. इसके लिए आरोपी जिसके विरुद्ध पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट [FIR] दर्ज करायी जाती है. उस अपराध की विवेचना में आरोप सिद्ध पाए पर साक्ष्य एकत्र कर विवेचक उसे गिरफ्तार करता है. जमानतीय मामलों में आरोपी को जमानत दे दी जाती है, तथा अजमानतीय मामलों में उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया जाता है. फ़िर विवेचना पूर्ण होने पर उसके खिलाफ अभियोग पत्र प्रस्तुत किया जाता है.

आरोपी के रूप में नामजद व्यक्ति के नैसर्गिक, संवैधानिक और कानूनी अधिकार का संरक्षण करने हेतु दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अंतर्गत उल्लेखित किया गया है कि किसी ऐसे मामलें में जहाँ कार्रवाई पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संस्थित की गई हो, उसे चालान की प्रतिलिपि निःशुल्क उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

जानकार कहते हैं कि कभी-कभी मध्यप्रदेश पुलिस मेनुअल एवं रेगुलेशन एक्ट पर 524 का हवाला दे दिया जाता है, जो कि ग़लत तर्क है. दरअसल पुलिस की तरफ़ से कार्य में लगे न्यायालय अर्दली को सामान्य व्यवस्था, अभियुक्त की सुरक्षित अभिरक्षा, हिन्दी समन्स, वारंट्स लिखने और जारी करने के कार्य से मिले बचत समय में जो मामलों की डायरी से बयानों की नक़ल करने में सहायता की , जो एक लाइन लिख दी गई है, उसके आधार पर पुलिस ने शायद अपना अधिकार ही मान लिया है. जबकि पुलिस रेगुलेशन में यह आदेश उस ज़माने का है जब न फोटोकॉपी मशीन थीं, न ही typewritter का चलन आम था.

पुलिस विभाग में इस प्रावधान को अलग-अलग लोगों ने अपनी तरह से परिभाषित कर लिया और नफा-नुकसान के खेल में लिप्त हो गए. चालान की कॉपी कराने का दर भी पृथक-पृथक तय किया गया है. स्वाभाविक है , न्यायालय अर्दली जैसी जगह जहाँ कुछ न हो, वहां लहरें तो गिनना पड़ेगा !!! इस सम्बन्ध में यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि पुलिस विभाग या शासन स्तर पर किसी अन्य माध्यम से चालान की कॉपी कराकर एक नक़ल प्रति मुलजिम [बचाव पक्ष] को देने के लिए कोई फंड की व्यवस्था नहीं है, न ही कोई बिल स्वीकृति करने का प्रावधान है, फ़िर भी चालान की कॉपियाँ तो हो रही हैं और काम भी चल रहा है. आख़िर ये कॉपियाँ हो कैसे रही हैं ? रुपये कहाँ से आते हैं ?? कितना खर्च हो रहा है ??? यह विचारणीय है.

इस क्षेत्र में जो होशियार है वो तो वर्षों से चालान ड्यूटी कर रहे हैं और जिन्हें कॉपी कराने का कार्य manage करना नहीं आता वो ड्यूटी लगते ही कहने लगते हैं, चालान कैसे पेश हो पायेगा ? मैं कहाँ से कराऊंगा कॉपियाँ , लेकिन परम्परा है तो निभानी पड़ेगी की तर्ज पर वह भी कार्य करता जाता है. शायद अपने वेतन के रुपयों से कॉपियाँ कराकर या फ़िर कोई और रास्ता अपनाने के लिए वह भी मजबूर हो जाता है. परिणाम स्वरुप भ्रष्टाचार का व्यवस्था के स्तर पर खुलेआम स्वीकृति देना और इस पर कोई स्पष्ट दिशा निर्देश जारी न कर , बढावा देने की बात साफ जाहिर होती है. पुलिस जिसकी छवि आमतौर पर ठीक नहीं कही जाती है, उसके विरुद्ध यह और भी नकारात्मक है और व्यवस्था भी इस न्याय-अन्याय कि लड़ाई में चालान की निशुल्क प्रति की तरफ़ बेसुध है. निशुल्क न्याय देना की नीति का हश्र इन गरीबों की कटती जेबों से दिखाई दे जाता है. यह एक ऐसा गोरखधंधा बन चुका है जिसमें लाखों-करोड़ों का खेल हर महीने हो रहा है और किसी के कानो में जूं तक नहीं रेंग रही है.



न्याय में विलंब


पुलिस की विवेचना और साक्ष्य जुटाने के तरीकों के बारे में वैसे भी अच्छी धारणा नहीं है. विवेचना के दौरान पुलिस अभियोजन के लिए यथासंभव साक्ष्य जुटा कर अनेक व्यक्तियों के खिलाफ न्यायालय में चालान प्रस्तुत करती है. तब ऐसे में वे व्यक्ति जो अपने को बेगुनाह साबित करना चाहते हैं, उनके लिए एक मात्र रास्ता न्यायालय से न्याय पाने का रह जाता है. जिसके लिए जरुरी है कि चालान समय पर न्यायालय में समय पर प्रस्तुत हो जाये, किंतु आर्थिक कारणों से यदि चालान की प्रतिलिपि के लिए वह पैसे नहीं जुटा पाता है तो चालान न्यायालय में समय से पेश नही हो पाता है. इस स्थिति में व्यक्ति को न्याय पाने के लिए पता नहीं और कितने दिन इंतजार करना पड़ता है. एक मामले में माननीय उच्चतम न्यायलय में साध्वी ऋतंभरा के खिलाफ दायर याचिका में सम्बंधित शासन [अभियोजन पक्ष] को साध्वी के आवेदन पर उस जनसभा के ऑडियो और विडियो केसेट की प्रतिलिपियाँ उपलब्ध कराने को मान्य किया था. और सम्बंधित न्याय के केसेट्स की प्रतिलिपियाँ तैयार करने के लिए अस्वीकृति को उचित नहीं माना था.

यह व्यवस्था जो किसी भी कारण से चल रही है, उसमें पुलिस के पास कोई निर्धारित फंड कि व्यवस्था नहीं जबकि वह अभियोजन पक्ष के रूप में है...? शासकीय अभियोजक जो न्याय के लिए अभियोजन पक्ष की और से पैरवी करता है. और जिसके नियंत्रण एवम मातहत जो अर्दली कार्यरत है उनकी भूमिका....? और व्यवस्था में इस तरह के अदृश्य रूप में चल रहे कार्यों पर नजर एवम अंकुश हेतु जो विजिलेंस गठित है, उसके कार्य विचारनीय है ???

और आप भी विचार कर सकते है !!!



जवाब किसी के पास नहीं ..?????


जानकारों का कहना है कि चालान की फोटोकॉपी के नाम पर समूचे मध्यप्रदेश में हर साल करोड़ों रुपये आरोपी या फरियादी की जेब से वसूल कर संबंधितों [ पुलिस एवम अन्य ] द्वारा करोड़ों खुलेआम भ्रष्टाचार किया जा रहा है . यदि उदाहरण के रूप में देखा जाए तो जबलपुर जिले में यदि साल भर में सिर्फ़ दस हजार आपराधिक प्रकरणों का दर्ज होना तथा प्रत्येक मामले में सिर्फ़ दो लोगों को आरोपी बनाया जाना मान लिया जाये तो करीब एक करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार आशंकित है. कई आपराधिक प्रकरणों में तो पुलिस दस्तावेजों व चालान की प्रतियाँ की संख्या सैकड़ों में होती है . फ़िर भी प्रत्येक चालान की प्रतिलिपि में सिर्फ़ पॉँच सौ रूपये का अनुमानित खर्च मान लिया जाये तो आंकड़ा करीब एक करोड़ रुपये तक पहुँच जाता है. बात यदि प्रत्येक जिले में इतने ही आपराधिक मामलों की जाए तो पैंतालिस जिलों के हिसाब से राशि ४५ करोड़ रपये हो जाती है. इतनी बड़ी रकम आती कहाँ से है इसका उत्तर किसी के पास नही है....?????

जानकारी साथी रामकृष्ण परमहंस पाण्डेय से साभार

Sunday, August 24, 2008

अपन गोठ...

सुकवि बुधराम यादव जी के रचित थोरकुन गीत, कविता, जागरण गीत , मुक्तक , साखी के गुरतुर-गोठ अउ मनोरथ के माध्यम से आप मन अवलोकन करेव । ये सब मोर तीर जौन आदरणीय के जुनाहा संग्रह रहिस ओखरे खजाना आए. ...उनकर गीत/रचना प्रसतुत करईया तो मे हवव , पर आपोमन ला ऐसे लगत होही के उनकर रचना बर आपमन के जौन प्रतिक्रिया बिचार मिलथे ,तेखर बर आदरणीय बुधराम जी के का सोचना हवे..... ता मे उन्करे खजाना -संग्रह म ले एक उनकर लेख इन्हा पोस्ट करत हंव ....... आर्शीवाद देहव

अपन गोठ...

मिरगा कस बिरथा तिसना पाले जनव उचाट मारत जिनगी हा तीसर पहर म कब हबर गय पता नई लगिस , पीछू डहर झाँके ले बहुत पहाये अउ थोरे बचाए के मरम हा सालथे , जीव ला कचोतथे अउ सुरता आथे नीत के ओ गोठ जौन माता-पिता , गुरुजन अऊ बड़का सियान मन ले सुने रहेन अऊ जेकर परभाव हा आज घलव संकलप के रूप म हावय के .......

सेवा म अरपन कर सगरी -अपन हित बिसराके
करज चुका ले महतारी के मनुख तन ये पाके

सोरह आना सच आय के ----- आये हें सो जाये बर राजा रंक फ़कीर जमो निचट जुच्छा हाथ , जत्तेक इंहा पाये , कमाए हें इहें गवाएं परही।
" अंचरा के मया " जनम देवैया महतारी अउ कोरा म basar देवैया धरती महतारी दुनो के मया के बखान अउ महिमा गान करे के laaikaai जतन आय , जौन हां ये माटी के दुलौरा जमो मनखे तक कुछ आखर मा पहुचाये ले बिस्वास हे जरुर सनेह अउ दुलार के भागी बनही ।
ये गीत अऊ कविता मन ला एक संग्रह के सकल देवाय म मोर हित-मिट साहित्यकार मन के संगी धुरंधर साहित्यकार अउ प्रयास प्रकाशन के निदेशक डॉक्टर विनय पाठक के गजब आभारी हँव ।
परम आदरणीय पंडित राजेंद्र प्रसाद शुक्ला , डॉक्टर पालेश्वर प्रसाद शर्मा जइसन प्रतिष्ठित अउ वरिष्ठ मनीषी मन के दू आखर आसिरवचन अउ सनेह के खातिर बहुते आभारी हंव ।
भाई कृष्ण कुमार भट्ट 'पथिक ' , डॉक्टर अजीज रफीक अउ सनत तिवारी घलव ला धन्यवाद ।
गीत - कविता के ये संग्रह मोर पूजनीया महतारी अउ पिता ला परम श्रद्धा सहित समर्पित हवय। जिनकर असीरवाद के आन्छत अपन भाखा के सेवा मा ये अरपन होए पावत हे ।
1966-६७ ले प्रयास प्रकाशन ले जुरे साहत्या यात्रा म , बिसरत , भुलावत , रेंगत , सुस्तावत बरस २००१ मा बिलासा कला मंच के छैन्हा मा घाम घाले बर पहली ठीहा पाईस ।
आख़िर मा ये माटी के जमो गुनिजन , मुनिजन , सुधिजन , गुरुजन अउ बुधजन मन ले निवेदन हवय के येला पढ़के , सुन के , देख के एकर बने अउ घिनहा ला पोगरी झन पचोंहय। अपन सनेह संग सुघर सुझाव अउ आसिरवाद ला बिना अबेर करे मोर कटी भेजे बर झन भुलाहन्य ।

तुंहर सनेह अऊ दुलार के अगोरा मा........


pataa...
बुधराम यादव
एम.आई.जी.अ/८
चंदेला नगर
ringroad no.२
बिलासपुर छत्तीसगढ़