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Sunday, March 8, 2015












गुरुत्वाकर्षण- आकर्षण-शारीरिक विवशता
(दम लगा के हईशा)
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सिनेमा एक गज़ब की विधा है, अपनी बात कहने के सबसे प्रभावी माध्यमों में से एक. दर्शक के सभी इन्द्रियों को गूंथकर धीमी आंच में दिल-दिमाग को सेंक लेने वाली. मुकेश, मोहिंदर-हरेन्द्र भाई ने सब कह दिया, वैसे अब कुछ शेष रहा नहीं. मगर उसी "शाखा" में दिए वचन निभाने के लिए मेरा लिखना कदाचित आवश्यक है.

मध्य वर्ग के लिए जहाँ टिकिट से कई गुना भारी पॉपकॉर्न और समोसे के रेट पड़ते हों और कॉफ़ी का बड़ा कागजी कप मेरे जैसे प्राणी के लिए दो तीन के हिसाब का हो, वहाँ मुकेश-हरेन्द्र भाई की स्पॉन्सरशिप में मोहिंदर भाई का कॉफ़ी में हिस्सेदारी कर लेना, जाहिर है मेरे लिए फिल्म के मजे को कुछ स्टार बढाने जैसा है.
अपनी ख्वाहिशों को मसोसकर, कर्ज लेकर उपभोग किये जा रहे उपकरणों के मद्देनज़र मध्यवर्ग का दायरा भले ही बढ़ा लिया गया हो मगर भारत का असल और मूल मध्यवर्ग यही है जो जीवन में हर दिन करता है "दम के लगा के हईशा..."
कहानी तो आप जान ही चुके हैं. उस वय, और इस वर्ग की चिर चाहत से अलग मोटी युवती के किरदार में "भूमि पेंदनेकर" अपने भारतीय नाक-नक्श और सहज अभिनय से हीरो "आयुष्मान खुराना" को दम लगाने में सच में बेलेंस करती है. संजय मिश्रा [नायक के पिता की भूमिका में] और अन्य पात्र बोनस की तरह हैं जो जब स्क्रीन पर आते हैं दर्शकों को कुछ न कुछ दे जाते हैं.
निर्देशक की बुनाई में कहानी, स्क्रीन प्ले, पात्रों की कास्टिंग, देशकाल सब अपने ठिकाने पर हैं, उसी में खुबसूरत टिपकियों की तरह संवाद को भी बुना गया है. आजकल फिल्मों में सप्रयास शहर को एक पात्र की भूमिका निर्वाह कराया जा रहा है, जिसे निर्माता आदित्य चोपड़ा और निर्देशक/सिनेमेटोग्राफर " शरद कटारिया की टीम ने बखूबी निभाया है.
गीत-संगीत फिल्म के लय में हैं. हाँ पात्रों की भाषा के मसले पर हरेन्द्र भाई से सहमत.
और ख़ास बात ..... पूरी फिल्म देखते हुए एक बात यह कौंधती रही कि "शाखा" परिवार अब तक इसका "संज्ञान" क्यों नहीं ले सकी कि उसके "क्रांतिवीर" यहाँ वन्देमातरम के इतर मद्यपान, मुख अतिचार करते दिखाए गए हैं. खैर.... हईशा को दम भी तो उनके चर्चित ब्रह्मचर्य "शाखाई व्यायाम" से ही प्राप्य होना जो दर्शाया गया है. 

फिल्म देखना हो तो पति-पत्नी अनिवार्य और जो संयुक्त परिवार के साथ है, वे सभी जिम्मेदार सदस्यों के साथ देखें. रिश्तों के सारे मंज़र चुपचाप देखने के बजाय.....

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समीर

Saturday, February 21, 2015

बदलाPUR ने बदला बदला लेने का अंदाज़

                                       
अपना बॉलीवुड बदला/revenge पर खाँटी मूवी बनाने और #टैग लाइन रखने का आदी रहा है. हमारी टिपिकल बदला लेने वाली फिल्मों में खालिस अनैतिकता, अन्याय और सिस्टम के खिलाफ उतने ही अभिनव ढंग से बदला लेने वाला नायक कभी-कभार विलेन से तो ज्यादातर महँगे टिकिट और बेशकीमती टाइम खोटी करने वाले दर्शकों से हिसाब बराबर करता है. क्या "बदलाPUR" का बदला भी उतने ही शिद्दत से श्रीराम राघवन [एजेंट विनोद फेम] ने रचा है ? यह जानने के लिए फिलिम देखना तो बनता है.

फ़िल्म दर्शक की नब्ज़ को पहले ही मिनिट से मैच कर लेती है फिर उसे थामे, दबाये, बढाए, रोके चलती रहती है. गाने बैकग्राउंड स्कोर की तरह हैं जो सूफियाना अंदाज़ में में स्टोरी को सपोर्ट करती हैं, गुटखा थूकने, कश लगाने या फिर उबासी दूर करने के लिए वॉशरूम तक जाने की इजाज़त नहीं देती.  ये सोचना मज़ेदार है कि जब श्रीराम राघवन ने इसके कलाकारों को पहली बार story narrate किया होगा तब उनका रिएक्शन कैसा-कैसा रहा होगा. कुछ को समझ आया होगा तो कुछ ने इस रिस्क के साथ फिल्म साइन कर लिया होगा कि फिल्म के प्रीमियर शो में राघवन से ही पूछ लेंगे.

दर्शक को सबकुछ  दिखाकर उसे स्टोरी के क्लाइमेक्स पर अटकल लगाते रहने पर मजबूर करना ही इस "थ्रिलर" का असली "थ्रिल" है.

यामिनी गौतम, दिव्या दत्ता, राधिका आप्टे, विनय पाठक, हुमा कुरैशी एक तरफ अपने करैक्टर में डूबे हुए "irreplaceable" हैं, तो दूसरी तरफ "तीन प्रमोशन और दो बाईपास" वाला पुलिस ऑफिसर, "पुराने चाँवल में कीड़े न निकाल" की सलाहियत वाली माँ, पुलिस थाना, जेल, पुलिस/जेल लाइन के साथ सिनेमेटोग्राफी सब फिल्म के मूड और फ्रीक्वेंसी को ऊपर वाले लेवल पर ले जाते हैं.

वरुण धवन चौंकाते हुए उठते हैं, तो नवाजुद्दीन की एक्टिंग सभी रसों का पान कराती यह तय करती है कि वो स्टोरी टेलिंग की विधा के साथ इस फिल्म के असल हीरो हैं. बहरहाल अब बॉलीवुड एक्सपेरिमेंट, सेक्स को लॉजिकली यूज करना सीख रहा है.

धोनी की तरह फिल्म की फिनिशिंग भी नवाजुद्दीन ने अपने ही बिग शॉट अंदाज़ में किया है. क्या किसी अन्याय/गलत कार्य का बदला उसी तरह लिया जाना कंसर्न्स को न्याय दिलाने का सही इंसानी तरीका है या नहीं ? इस प्रश्न को ऑडियंस के दिमाग में खलबली मचाने के लिए छोड़ते हुए.


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#समीर 

Saturday, July 5, 2014

चारमीनार का नारको टेस्ट २

ये क्या हुआ...आया तो था नारकोटिक्स केसेस में कुछ बेहतर साइंटिफिक ऐड वाले इन्वेस्टीगेशन सीखने एक सेमीनार के लिए. पर शाम को घूमते फिरते जब चारमीनार देखने पहुँचा तो हैदराबाद से उसके पुराने रिश्ते के मद्देनजर धीरे से कुछ जानने की इच्छा हो गयी. पूछा तो उसने साफ़ मना कर दिया. उससे इस कदर बेरुखी की उम्मीद न थी. मैंने उसे एक बार भरी नजर से देखा और लम्बी सांस लेने की इच्छा के बावजूद वहाँ पसरी गर्दी को महसूस कर घुटे हुये से आवाज में फिर मिन्नत की. पुराना, बेहाल, निपट चुके बूढ़े, तिस पर एक मीनार पर बंधी मरहम पट्टी।  फिर भी जवाब आया..न.  इसके इसी जिद ने इसे इस हाल में पहुँचाया होगा . ऐसा सोचते हुए मीनार से पूछा - तुम कौन सी बात नहीं बताने के लिए यूँ चुप्पी लगाये हो. उस निजाम, उन ताबेदारों या आज के रहनुमाओं के. यहाँ से गुजर रहा हरेक शख्स तुम्हारे वजूद से बाख़बर पर तुमसे बेख़बर है. पर तुम कहो न कहो यहाँ तिजारत करते दिख रही बुर्का वालियों की तरह इस आधी चाँदनी और  मोतियों की दूकान वाली आधी रौशनी में तुम्हारे चेहरे पर तारी  मायूसी कुछ बयाँ तो कर रही है. उसे पढ़ने की कोशिश करते ही तुरंत ख़याल आया ये क्या.. इसमें क्यूँ इमोशनल होकर वक्त जाया किया जाये.क्यों न आज की क्लास में सीखे फार्मूला को आजमाया जाये. इस बेजान बन रहे मगर  अपने आग़ोश में कई इतिहास छुपाये चारमीनार से उसकी दास्ताँ सुन ली जाये... क्यूं न चारमीनार का "नारको टेस्ट' कर लिया जाये.



                         इसी तरह चारमीनार से गुफ़्तगू शायद थोड़ी देर और चलती लेकिन साथ ही चल रही "सीमा" [ मेरी पत्नी ] ने अपनी "मनुहार" वाली आवाज से क्रम तोड़ दिया- देखिये, कोकिला के लिए कोई छोटा मोटा खिलौना लेके मोतियों की दुकान पर चलते हैं मुन्नू ने यहीं का पता बताया है. हाँ यह ठीक रहेगा- मैंने बिना कुछ ज्यादा सोचे कह दिया. कैमरे को पाकेट में रखते हुए मैंने चारमीनार से "ख़िदमत में सलाम अपुन" के अंदाज में सर झुकाया तो उधर से तुरत फुरत में जवाब मिला- इस तरह के ख़िदमत से बेहाल हूँ. कुछ ना कहो यार. मैंने कुछ न कहते हुए सीमा की ओर निगाहें की किया इशारे में ही कल फिर आने की बात चारमीनार को समझाते वहाँ से मोतियों की दुकान की तरफ रवाना हो गया. मोतियों की दूकान पर मोबाइल हाथ में लिए सवालों का एक खाका तैयार करने लगा। …… लिखा 

 ऐ चारमीनार बता..

@ सबसे पहले निजाम के विरासतों में क्या हैदराबाद का ये हाल भी शामिल है. तुम्हारे एक मीनार के पाए पर आबाद मंदिर नुमा घेराबंदी क्या हमारी गंगा-जमुनी तहजीब का एक रंग है, या हमारे सेमीनार को-ऑर्डिनेटर रामाराव और मेरे ड्राईवर वाहिद जैसे लोगों के डर का एक अबूझ हिस्सा ?

@ एक तरफ डॉट कॉम के चमचमाते ऑफिस है तो दूसरी तरफ दस्त कम और जवानी बढाने वाले हकीमों के विज्ञापन भी है..तुम किसकी तरफ हो चारमीनार ?

@ हैदराबादी बिरयानी का ग्लो साइन बोर्ड पर प्रचार करते पैराडाइज शाप और उसकी ब्रान्चेस है और उसके साथ-साथ वो टपरे भी है जिनके बाहर हकाली गयी भेड़ें-बकरी भी जो बेकदरी से  छिले-कटे और लटके अपने साथी को निहारते  ख़ुद की बारी का इंतज़ार कर रही है. क्या वो कातर निगाहें अक्सर तुम्हारी ओर भी देखती है चारमीनार ?

@ हुसैन सागर पर शान्ति के प्रतीक स्वरुप बुद्ध की वह प्रतिमा, कद के हिसाब से बने अपने बड़े-बड़े कानों पर हाथ धरे दिखती है, जो नेकलेस, वी.आई.पी.रोड से घिर चुके झील पर चल रहे स्टीमर्स, मोटर बोट, उस पर सवार लोगों के शोर और झील के किनारे महा नगरनिगम की निगाह में किरकिरी बने झुग्गियों से आती रोजमर्रा के चीखों से बचना चाहती है. ऐसा मैं सोचता हूँ..पर बुद्ध कहते है...चारमीनार जाने.

@ मेरा ड्राईवर वाहिद पिछले 15 साल से ड्राइवरी करता, 35 साल से हैदराबाद में रहता है.वालिद के इंतकाल से पहले से ही काम करने लगा फ़िर इंतकाल के बाद उस काम के अलावा कुछ कर भी ना सका. शायद इसीलिए केवल तेलुगू में लिखे बोर्ड को मुझे पढ़कर नहीं बता सकता. बोलता है मदरसा भी नहीं जा सका, अपनी जबान में तुमसे शिकायत भी नहीं कर सकता. मैं पूछता हूँ.. वाहिद ! फ़िर तुम खुश कैसे रहते हो.. ? वह मुस्कराते हुए कहता है- साब, ये तो चारमीनार जाने.

@ आसपास के ग्रामीण, उपनगरीय लोगों को मिला लिया जाये तो करीब एक करोड़ की आबादी को चलने-फिरने लायक बनाती यहाँ की ट्रेफिक व्यवस्था, गलियों,सड़कों से लेकर प्रस्तावित मेट्रो रेल. सब खराब पड़े ऑटोमेटिक सिग्नल पर खड़े ट्रेफिक पुलिस की तरह है जो कभी सिग्नल, कभी भीड़ तो कभी अपने नाक पर बंधे रुमाल को देखता है. और हर एक मिनट में हांथो से इशारा कर पूरे मन से सिग्नल को कोसता है. मैंने एक सिग्नल पर किसी सिटी बस से डेस लग जाने पर निराकार हो गये ऑटो रिक्शा के निर्विकार चालक से कुछ पूछने की मुद्रा बनाई तो वह उसी भाव से कहता सुनाई दिया- मई कयाँ बोलूँ, सब चारमीनार जाने.

@ और हाँ, केंद्र सरकार और राज्य सरकार के गिने-चुने शासकीय भवनों के अलावा कहीं भी हिंदी का कोई बोर्ड नहीं, बाजार में हिंदी विज्ञापन नहीं, पी.वी.आर तक में हिंदी सिनेमा नहीं, कथित हिंदी पट्टी के सेलिब्रिटीज का नामोनिशान नहीं [ धोनी के एक्का-दुक्का बोर्ड को छोड़कर ], बुक स्टाल पर हिंदी किताब, मेगजीन भी नहीं, हिंदी में सूचना नहीं, हिंदी में जानकारी नहीं, हिंदी अखबार भी नहीं. एक बात सुकून का है आम आदमी हिंदी समझता है और जवाब भी कमोबेश दे देता है. इससे यह भ्रम जरुर दूर हो रहा है कि क्या जरुरी है. हम हिंदी प्रदेश वाले भी इन्हीं नाटकों के अलावा हिंदी में करते क्या है, जो हम करते है वो तो ये भी समझते है. पर एक चिंता जरुर होने लगी कि चारमीनार से सवाल हिंदी में करूँ या फ़िर...!

@ इस महानगर के भविष्य के बारे में बात करने पर मेरे ड्राईवर वाहिद की एक बात याद रह जाती है - साहब जी ! तेलंगाना वालों ने पिछले कई सालों से हलाकान कर रखा है. बंद, बंद फ़िर बंद सब ठप्प हो गया है. मैं उससे कुछ पूछता मगर क्या पूछूं ! जाहिर है, सवाल तो वह कर रहा है...! क्यों चारमीनार..?

ओहो..हैदराबाद में और भी बहुत कुछ है....बहुत से सवाल हैं मगर आज इतना ही...

सभी के ख़िदमत में सलाम अपुन का.

हैदराबाद डायरी.


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समीर यादव 

चारमीनार का नारको टेस्ट

March 9, 2011 at 8:23pm
ये क्या हुआ...आया तो था नारकोटिक्स केसेस में और बेहतर साइंटिफिक ऐड के साथ इन्वेस्टीगेशन पर सेमीनार के लिए..पर शाम को घूमते फिरते जब चारमीनार देखने पहुँचा तो हैदराबाद से उसके पुराने रिश्ते के मद्देनजर धीरे से कुछ जानने की कोशिश की तो उसने साफ़ मना कर दिया. उससे इस कदर बेरुखी अपेक्षित नहीं थी. मैंने उसे एक बार भरी नजर से देखा और लम्बी सांस लेने की इच्छा के बावजूद वहाँ पसरी गर्दी को महसूस कर घुटे हुये से आवाज में फिर मिन्नत की. पुराना, बेहाल, निपट चुके बूढ़े, तिस पर एक मीनार पर मरहम पट्टी बंधी फिर भी जवाब आया..न. इसके इसी ज़ज्बे ने इसे इस हाल में पहुँचाया होगा ..ऐसा मन में सोचते मीनार से पूछा- तुम कौन सी बात नहीं बताने के लिए यूँ चुप्पी लगाये हो. उस निजाम, उन ताबेदारों या आज के रहनुमाओं के. यहाँ से गुजर रहा हरेक शख्स जैसे तुम्हारे वजूद से बाख़बर पर तुमसे बेख़बर. तुम कहो न कहो यहाँ तिजारत करते दिख रही बुर्का वालियों की तरह इस आधी चाँदनी और  मोतियों की दूकान वाली आधी रौशनी में तुम्हारे चेहरे पर पसरी मायूसी कुछ बयाँ तो कर रही है. उसे पढ़ने की कोशिश करते ही तुरंत ख़याल आया ये क्या.. इसमें क्यूँ इमोशनल होकर वक्त जाया किया जाये.क्यों न आज की क्लास में सीखे फार्मूला को आजमाया जाये. इस बेजान बन रहे पर अपने आग़ोश में कई इतिहास छुपाये चारमीनार से उसकी दास्ताँ सुन ली जाये... क्यूं न चारमीनार का "नारको टेस्ट' कर लिया जाये.

चारमीनार का नारको टेस्ट ..... जारी ....हैदराबाद डायरी के साथ..!

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समीर यादव 

Saturday, August 17, 2013

नाईट गश्त में चेकिंग



वूं वूं वूं ......................वूँ....वूं...!!!!!

अरे कितनी बार कहा गश्त के दौरान सायरन या हूटर मत बजाया करो और हाँ पीली बत्ती भी जलाने की जरुरत नहीं है.

वो क्या है न सर, फिर पॉइंट ड्यूटी वालों को पता कैसे चलेगा हम चेकिंग में आये हैं. मैं तो केवल पॉइंट पर ही बजाता हूँ.

इस चेकिंग के चक्कर में वो लोग डीसी [ड्यूटी सर्टिफिकेट] लिए बस अपने पॉइंट पर खड़े रहते हैं, मेरा बस चले तो ऐसे डीसी चेकिंग ही बंद कर दूं. वायरलेस सेट क्यों दिया है कॉल नहीं कर सकते.

सभी पॉइंट वाले के पास थोड़े ही है सर, और जो हैं वो भी किस हालत में हैं आप तो जानते हैं. किसी की बैटरी डिस, तो किसी से आवाज ही नहीं आती. ये हूटर वाला आईडिया सबसे बढ़िया है, इसीलिये सिकरवार साहब कहते हैं- “स्साले जब हम अपनी नींद रात में खराब कर रहे हैं तो इनको भी कोई हक़ नहीं है सोने का. करो हल्ला, जागते रहेंगे तो कम से कम कुछ तो क्राइम रुकेगा.”

और गोविन्द कैसा चल रहा है, सब ठीक है तुम्हारे पॉइंट पर 
जी सर !
वो मुन्ना खटिक को चेक किया, पता चला है जेल से छूट गया है.
हाँ सर, लेकिन घर पर कभी नहीं मिलता. बस उसकी माँ और भाभी रहती है
अरे कभी सुबह सुबह दबिश दिया कर, वो भी छत पर, तब मिलेगा ओके 
इस तरफ परवेज डेंजर, अशरफ डॉन, कन्नू काडर को भी दिखवा लेना गौतम....! स्साले...... कुछ न कुछ करते रहते हैं. 
हाँ सर ! आजकल कन्नू काडर अध्यक्ष बनने के चक्कर में झांसी के खूब चक्कर लगा रहा है.. गौतम ने अपना सर जिप्सी के पिछले हिस्से से डी.एस.पी.के कान के पास लाकर बताया  

अरे गौतम ! उधर देखना गली के अन्दर उस मकान की लाइट इस वक्त कैसे जल रही है.

जी सर !

जैसे ही गाड़ी रुकी वहां से कुछ आवाज आते हुए भी सुनाई दी. सब इंस्पेक्टर गौतम उसके साथ गनमेन और एक होमगार्ड फुर्ती में गाड़ी से कूदे और मकान की तरफ दौड़ लगा दिए.

मकान के नजदीक पहुँचने पर वहाँ से आती आवाज लगभग शोर में बदल चुकी थी. मुमकिन झरोखों और दरवाजों से अन्दर झाँकने के बाद भी कुछ ज्यादा समझ नहीं आने पर गौतम ने दरवाजा खटखटाना शुरू किया. थोड़ी देर तक कोई जवाब नहीं मिलने पर पुलिस वालों का गुस्सा और आवाज देने की फ्रिक्वेंसी अपने आप बढ़ने लगी. भीतर तक आवाज पहुंचाने के लिए वे दरवाजे पर हाथ की जगह मुक्के और लात मारने लगे और हाँ मुंह से.... #$%^%$ [ हाँ इसका मतलब गाली है, आपने सही सोचा ]

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला.

पहले दौर में एक दूसरे को हैरानगी से देखा-देखी के बाद गौतम ने ही पूछा - "अरे इतनी रात को तेज आवाज में टेप बजाकर तुम क्या कर रहे हो."

“अपने घर में मैं कुछ भी करूँ आपसे क्या मतलब” – उस अधेड़ से भी अधिक उम्र के लग रहे है आदमी ने जवाब दिया.

“लेकिन इस उम्र में तुम्हारी ऐसी हरकत से दूसरे परेशान हो रहे हैं. बहुत हो गया, चलो अब सो जाओ..@#$@@ के”- गौतम ने कहा

“किसी को कोई प्रॉब्लम नहीं है तुम नाहक ही मुझे परेशान मत करो....और मुझे @#$%$$ मत दो”- आदमी ने कहा

"तुम हमें प्रॉब्लम समझाओगे #$%^&$ ....., अरे वीरेंदर ले चल इसको".

देखते ही देखते माहौल खराब हो गया और पुलिस ने उस आदमी को टेप रिकार्डर के समस्त सहायक उपकरणों के साथ जीप के पिछले हिस्से में ला पटका.

"सर ! ये तो बहुत #$%^# आदमी है इसे थाना ले जाना पडेगा..." गौतम रिपोर्ट देते हुए बोला.

हाँ चलो, मोती मस्जिद की तरफ से पॉइंट चेक करते हुए इसे कोतवाली छोड़ देंगे

बिठाओ इस @#$%## को और हाँ 109 कर देना, दो चार दिन उधर की हवा खा लेगा तो समझ आयेगा इसे. [पंद्रह मिनट बाद कोतवाली थाना में]

चार दिन तो नहीं दो दिन बाद उसी कोतवाली थाने में ........ सर एक रिपोर्ट करनी है. [दो घबराए से युवक मुंशी के सामने आकर कहने लगे]

बोलो ! मुंशी ने नहीं उसके मददगार ने कहा

सर हम अपने एक रिश्तेदारी में तीन दिन पहले महराजपुर गए थे. पिताजी की तबियत कुछ ठीक नहीं होने से वो यहाँ घर में रुक गए थे. आज सुबह जब हम लौटे तो पिताजी घर पर नहीं मिले...

अरे आस-पड़ोस से पूछा, जान-पहचान वालों से तस्दीक की.....आखिर कहाँ जायेंगे इस उम्र में. वाक्य पूरा होने से पहले ही मुंशी लड़कों की उम्र का अंदाज लगाकर समझाने लगे.

जी साहब पूछ लिया. कहीं से कोई खबर नहीं मिली. हमें बहुत डर लग रहा है सर.

अरे ऐसा करो घनश्याम ! गुम इंसान कायम कर लो - मुंशी जी ने अपने मददगार से रूटीन अंदाज में कहा.

हाँ क्या नाम है तुम्हारे पिताजी का, उम्र, पता, हुलिया, कपडे क्या पहने थे, कहाँ-कहाँ रिश्तेदारी है सब बताते जाओ. हाँ अभी-अभी का एक फोटो भी लगेगा.

जी साहब फोटो है...ये लीजिये. फोटो हाथ में लेकर मुंशी एक बार गौर से देखता है.

सर एक और बात है, घर मे बाक़ी सब तो ठीक है लेकिन पिताजी के कमरे से पूरा साउंड सिस्टम ही गायब है. हमें ये समझ नहीं आ रहा है कि पिताजी उस टेप रिकार्डर को लेकर आखिर कहाँ और क्यों जायेंगे, इसीलिए डर भी लग रहा है. घबराये हुए दोनों बेटे लगातार अपनी आशंका को जाहिर करने की कोशिश करने लगे.....

अरे कुछ नहीं हुआ है तुम्हारे पिताजी को, घबराओ नहीं बैठो. अभी पता लगाते हैं......कहते कहते मुंशीजी ने फटाक से 109  के रजिस्टर से गुम इंसान का रिकार्ड सरसरी तौर पर मिलान करते हुए कनखियों से मालखाने में रखे टेप रिकार्डर का जायजा भी ले लिया. फिर धीरे से मददगार घनश्याम से कहा - "जा बाहर ले जाकर इन्हें बता, कोर्ट से जमानत करा ले, रंगरेलियां मनाते पकड़े गए अपने बाप की..."


साहब ....... ! रिपोर्ट लिखानी है



हेलो...... !  
ये सोचते हुए फ़ोन कान से लगा लेता है कि नाम देखे बगैर फ़ोन उठा लो तो "हेलो" कहना ही रह जाता है 

नमस्कार सर ! शंखवार निवेदन कर रहा हूँ सर ..!
दूसरी ओर से ऐसी आवाज आने पर वह सहज हो जाता है. 

अरे टी.आई.साहब, "महिलाओं एवं कमजोर वर्ग के प्रति संवेदनशीलता" वाली कार्यशाला से कब लौट आये. कार्यशाला के "सब्जेक्ट" को जानबूझकर चबाकर बोलते हैं.  
अबकी तीसरी बार थी न सर, इसलिए दो बजे ही लौट आया था.... बिना लंच पेकेट लिए. फिर थाने से बार-बार फोन आ रहा था, एक 376 की रिपोर्ट आई है, इसलिए सीधे थाने ही आ गया था.  
अरे किसकी रिपोर्ट है ?  क्या हुआ ? ..... चेहरे से सहजता जाने लगी.
बडकुवाँ गाँव की है सर, एक महिला आई है अपने पति के साथ. सर आसपास लोकेशन हो तो थोड़ा आप भी आ जाइए न थाना तक.... ठीक रहेगा.
कैसे, कुछ सीरियस है क्या ?
नहीं सर, लेकिन मामला थोड़ा देखना पड़ेगा.
ओके ..... मैं पहुँचता हूँ.

[विशेष - थाने पर टिपिकल बॉलीवुड मूवी जैसा कोई माहौल नहीं है.]
हाँ बताओ !  - टी.आई. ने पति से पूछा 
ये मेरी पत्नी है इसके साथ गलत काम हुआ है.
कब ? टी आई की निगाहें अब उस महिला की तरफ थी. 
साहब, कल मैं तो घर पर था नहीं.......
तो फिर ....पति को बीच में रोकते हुए टी.आई. ने झुंझलाकर कहा - तुम बताओ बाई ???
लम्बी चुप्पी.............!
घबराओ नहीं ...बताओ ! पति ने भरोसा देने के अंदाज से जोर दिया 
हाँ साहब...! "कल दोपहर बाद जब हम जेवन कर अकेले घर में थे, तभी हमारे जेठजी आये और हमारे साथ जबरदस्ती गलत काम किया." महिला निगाहें फ़र्श पर गड़ाये बुदबुदाने लगी. 
टीआई, डी.एस.पी. और डे ऑफिसर तीनों की निगाह एक साथ मिली, चमकी, फिर पूछताछ शुरू .... 

कल क्यों नहीं रिपोर्ट किया ? 
साहब ये छतरपुर गए थे, रात में आये फिर हमने सबकुछ इनको बताया. रात गहरा गयी थी सो आज रिपोर्ट करने आये 
जेठ कहाँ रहता है ??
वहीँ पड़ोस में साहब - पति ने जवाब दिया 
और सास ससुर ...?
वो जेठ के साथ रहते हैं.
पहले कभी इस तरह की कोई निगाह या हरकत की थी उसने ?
समझ में नहीं आया साहब.... क्या पूछे ?
अरे, मतलब ये कि पहले कोई झगड़ा, विवाद तो नहीं हुआ था उससे ?
ना साहब !   
भाईयों में बंटवारा कब हुआ, शादी कब हुई, कितने बच्चे हैं, बंटवारे में जमीन-जायदाद का कुछ विवाद है क्या, चुनाव में कौन जीता, तुमने किसको वोट दिया था, गाँव में पार्टीबाजी है ?  उसमें तुम किस तरफ हो....?
सवाल कभी पीड़ित महिला तो अधिकांशतया पति समरथ सिंह से पूछा जाने लगा. 

अरे समरथ सिंह तुम्हारे जमीन का मामला तो कोर्ट में चल रहा है न !
जी साहब ! वो तो गजब दिन हो गए. समरथ सिंह खिसककर पत्नी के ओट में होने की कोशिश करता है.
कल तुम्हारे गाँव के फग्गन ठाकुर के यहाँ कोई कार्यक्रम था, सुना है बड़ी दूर दूर से जात-समाज के लोग आये थे जी हुजूर ! 
तेरी ससुराल कहाँ है, मतलब तेरी पत्नी कौन गाँव से आई है ?
कुदारी कलाँ, थाना महराजपुर के शम्भू सिंह की लड़की है.. साहब

इस बीच टी.आई. थाने के दीवान और एम्.एल.सी. कराने के लिए तैनात कांस्टेबल को बुलाकर कान में कुछ कहता है और इसके थोड़ी देर बाद कुदारी कलाँ गाँव  का रहने वाला कांस्टेबल विजय सिंह धीरे से पूछताछ का मुआयना कर रहे डी.एस.पी. को सेल्यूट कर निवेदन करता है - सर, शम्भू सिंह एक रिश्तेदारी में कल से बडकुवाँ गाँव आया हुआ है. कोटवार को ताक़ीद कर दिया है, उसको लेकर थोड़ी देर में वह थाने पहुँच जाएगा.  

करीब एक घंटे बाद ....
अब टी.आई. के कक्ष में हो रही पूछताछ में एक व्यक्ति और बढ़ गया, वह था ... शम्भू सिंह 
पूछताछ महिला से शुरू होती है और वह पीड़ित महिला पहले वाली ही बात को .............ठिठक-ठिठक कर दोहरा की कोशिश करती है...... "साहब.......... बुरा काम किया" 
यह सुनकर वहाँ मौजूद एक व्यक्ति अवाक हुआ, वह था शम्भू सिंह. बाक़ी तो पहले ही सुन चुके थे.
वह तुरंत बोल पड़ा - क्या बोल रही हो ? मैं कल से फग्गन के घर हूँ. समरथ तुमने कुछ बताया ही नहीं और शामलाती [पीड़ित का जेठ] तो कल दोपहर से शाम तक वहीँ कार्यक्रम में मौजूद था. तभी तो समझ ही न आये कि पुलिस आखिर मुझे क्यों बुला रही भला. अब घरबार की इज्जत को इस तरह थाना-कचहरी तक लाओगे तो क्या रह जाएगा. एक सुर में बोलते हुए शम्भू पीड़ित महिला की तरफ घुम गया - "अगर ये सच है तो बोल बेटी ! बड़ी बात है ....!
 फिर एकटक अपनी बेटी को देखता दीवार से घिसटकर जमीन पर बैठ गया शम्भू सिंह.


टी आई के कमरे में कुछ देर लम्बी चुप्पी.....................पसरी रही   !
एक तरफ पुलिस वाले निगाहों से इशारे कर रहे थे, तो दूसरी तरफ आँखे चुराने का खेल सा हो रहा था. जो थोड़ी देर में आंसुओं से डबडबाने लगी.
"बाबूजी.......... तुम्हारे सामने झूठ न कह सकेंगे" - वह बिना आँसू पोछे बोलने लगी 
तुम्हारी सों ... इन्होने कहा हमसे, जो जमीन बचानी है तो केस में समझौता करानी जरुरी है... तो उसके लिए एक मुकदमा हमारी तरफ से दरज करानी होगी.... इसी खातिर हमसे ये रिपोर्ट कराने लाये हैं. हमने मना किया था, नहीं माने.

अब उसकी निगाह पिता से पुलिस की तरफ हुई.. 
साहब.....! रिपोर्ट लिखानी है, हाँ लिखानी है हमें, पर हमारे पति के खिलाफ. वैसे तो हम थाने कभी न आते, पर ये ले आये हैं तो लिखिए..... कितना जुर्म करते हैं ये हम पर, हमारे बच्चों पर, सब बरबाद कर दिया पी-पीकर, न कमाना न कोई उदम करना, न जमीन रही न इज्जत, अब ये धत करम ही रह गया था सो ...... लिखानी है रिपोर्ट.
पति सरककर दरवाजे से बाहर खड़ा हो जाता है और बेटी पिता के गले लगकर रो रही है.

Tuesday, July 30, 2013

जा कुलच्छनी........! सब बरी हो गए





















तुम क्यों आये रिपोर्ट करने ...?
फुसफुस..फुसफुस.....
हाँ कारण ही कान में बताता है.
ऐसी रिपोर्ट हुई तो गुम इंसान ही कायम होना था, लिखा नाम, पता, हुलिया, अंतिम बार कब, कहाँ, किसके साथ देखी गयी.

खोजबीन हुई ........ हाँ भई सच में हुई
न वो मिली, न उसकी लाश ! [ओह इतनी जल्दी लाश क्यों लिख दिया]  

अब जिद से थाने में पहले कान में फुसफुसा कर बतायी गयी कहानी जोर से खुले में सबके सामने सुनाई गयी.
मामला ही ऐसा था कि.......
केस में मर्डर की धारा बढ़ाई गयी [हाँ ठीक सोच रहे हैं अजूबा ! डेड बॉडी मिले बिना]

फिर खोजबीन हुई....... हाँ भई ठीक से हुई 
नहीं मिली, मिलनी भी नहीं थी  
रामपुर बन्नौदा जिला शहडोल से बहती नदी की तेज बलखाती धार से गुम हुई थी वह, ज़िंदा.
सुनते हैं वह तो धकेले जाने से पहले ही मर सी गयी थी. हाँ कारण बताया गया था उसे पहले.

समय गया, बातें रह गयी.... लाश तक नहीं मिली.
हाँ ठीक सोचा आपने, सुराग.... वो भी नहीं मिले.

फिर भी पुलिस ने गवाह, सबूत जुटाया और न्यायालय में चालान [चार्जशीट] किया....... उंची कुल-जात की लड़की को गाँव के चमरापारा के लड़के से कुजात-पियार हो गया. लोक-लाज का लिहाज न रखी. धत ! कितना चेताया, कोई ऐसा सोचे भी न, मिसाल रहे. घर से निकाला चोटी पकड़कर, कपड़े थे बदन पर, बेटी थी आखिर, सब अपनों की भीड़ भी थी इसलिए बस चप्पल-जूते की चपत लगाते, कानों में शीशा घोलते, घसीटते... उफनती नदी के किनारे लाये, धकेल दिया...... जा कुलच्छनी !!!

पुलिस भी न ....पक्का केस बनाकर....ये सब न्यायालय में पेश किया था 
हाँ साहब, पियार था दोनों में, मिलते थे, एक दूसरे को देखकर हँसते भी थे
हाँ साहब, महराज के घर में झगड़ा हुआ था
जी साहब, बहुत भीड़ थी, सब चिल्ला रहे थे मारो-मारो....
हाँ साहब, वहाँ गिरने के बाद किसी को दिखी नहीं
इन बयानों के साथ पुलिस ने चप्पल, चूड़ी के टूटे टुकड़े, एक मोबाइल, चुनरी भी जप्त किया था.

पर मानिए उसके घर देर है अंधेर थोड़े, आखिरकार छह साल बाद न्याय मिल गया.
ऐसे कोई जांच होती है भला. लाश नहीं, जप्ती कुछ ख़ास नहीं, ऊपर से गवाह बोलते नहीं.
फैसला दिया-
"गवाह और सबूतों के अभाव में मामले के सभी आरोपियों को [हाँ माँ-बाप-भाई-चाचा सहित] बा-इज्जत बरी किया जाता है."   

Thursday, March 7, 2013

बन्दूक चल गयी



हल्की बूंदा-बांदी से सड़क गीली हो गयी थी. ठिकाने पर पहुँचने से पहले शहर पार करना ही था. 
दौलत सिंह से मिलते हुए चलेंगे, शादी में नहीं आ सके थे न 
हाँ ! पर ज्यादा टाईम नहीं लगाना.... कंधे पर सीलिंग बेल्ट से फंसी बन्दूक को दायें से बायीं ओर करते हुए कहा उसने 
ओहो..हो..! खड़..र....र.. धडाक ..!! 
लाईट में कुछ दिखा नहीं.... ये ट्रक वाले भी न ..डीप्पर....तो देते ही नहीं 
यार, बन्दूक चल गयी 
सड़क के दूसरी ओर जमीन पर पड़े लड़के को आने जाने वाले देख कर रुकने लगे
दोनों उठे .... अब उनकी मोटरसाइकल कोतवाली थाने की तरफ गयी और ..
थाना पहुँचकर रिपोर्ट लिखाने लगे .....

साहब, मैं ....................पिता............... उम्र करीब पैतीस साल निवासी ............ खेती-किसानी का काम करता हूँ. मैं अपने साथी ............ के साथ मोटरसाइकल से ........................ गाँव के दौलत सिंह के यहाँ शादी में शामिल होने जा रहा था. ............गाँव के स्कूल वाले मोड़ पर पहुँचते ही.................................... !!!!!


अधूरा नहीं है ये.... दरअसल रिपोर्ट तो पूरी लिखाई गयी, लेकिन क्या लिखाई गयी होगी ? 


रिपोर्ट जो लिखाई गयी____________



साहब, मैं ....................पिता ............... उम्र करीब पैतीस साल निवासी ............ खेती-किसानी का काम करता हूँ. मैं अपने साथी ............ के साथ मोटरसाइकल से ........................ गाँव के दौलत सिंह के यहाँ शादी में शामिल होने जा रहा था . ............गाँव के स्कूल वाले मोड़ पर पहुँचते ही सामने से ट्रक आने पर मैं मोटरसाइकल धीमी करके सड़क किनारे रोकने लगा तभी मैंने बांयी तरफ हरपालपुर के रामबीर सिंह को वहाँ बन्दूक लिए खड़े देखा. उसने बन्दूक से मेरी ओर निशाना लेकर मुझे जान से मारने की नियत से गोली चलाई. घबराकर सड़क किनारे कीचड़ में हम गिर गए. राजबीर सिंह से जमीन के मामले को लेकर मेरी पुरानी रंजिश है. मैं और मेरे साथी ............. ने वहाँ राजबीर सिंह को देखा है, सामने आने पर पहचान लूँगा. रिपोर्ट करता हूँ कार्यवाही की जाए 



Sunday, March 3, 2013

उसी तरह बारिश पर भी ....

















बातचीत ........... क्या हुआ था ! तुम्हे पता ?

दृश्य एक .......

पहला - हर गुरूवार का तमाशा है यार ! दिन ब दिन भीड़ बढ़ती जा रही है
दूसरा - हाँ ! उधर दमोह, टीकमगढ़, सागर और छतरपुर तरफ से ज्यादा लोग आ रहे हैं
तीसरा - अरे क्या बात कर रहे हैं अपने जबलपुर से कोई कम है. क्या जज, नेता, बड़े अफसर सब आ रहे हैं
पहला - अब इसे क्या माने आस्था या इलाज न मिलने की दिक्कत
तीसरा - वो जो होता है न, जिसका कोई अंत नहीं....  वही है ये
पहला - पर इस बार चौकी "बाबाजी" [ सरौते वाले ] के घर के बजाय किसी खुली जगह पर लगवाना होगा
दूसरा - बिलकुल अब तक तो पुलिस के दम से चल गया
तीसरा - फिर बारिश का भी अंदेशा है, कुछ इधर-उधर हो गया तो स्टेमपीड [ भगदड़ ] हुआ मानो

दृश्य दो ..............

दूसरा - सारा अरेंजमेंट धरा रह गया.....
तीसरा - बारिश से पंडाल गिर गए और खेतों में पानी भरने से कीचड़ अलग हो गया
दूसरा - उधर चार बजे से उसी जगह चौकी भी शुरू हो गयी, किसको समझाए
पहला - व्यवस्था तो लगी है न ?
दूसरा - उसी के कारण तो अब तक चालीस हजार की भीड़ निकल गयी....

अचानक बारिश ...........
बचने के लिए गाँव की गलियों में बाबाजी के आशीर्वाद के लिए अपनी बारी का इन्तजार कर रहे बीमार बूढ़े, महिलायें, बच्चे और उनके साथ लगे सब भागे ......
बारिश बंद ...........
वही सब लोग वापस भागे ..........साथ ही "लंच" के बाद बाबाजी का सिद्ध जल छिड़काव ....
...........................................भगदड़...................................

दृश्य तीन ...........

पहला - ओह ! कम से कम तीन दर्जन लोगों को तो मैंने गाड़ी में डालकर रवाना किया
दूसरा- डालकर मतलब.... !
तीसरा - मतलब ...इन बिखरे चप्पल जूतों से समझ लो
चौथा - फिर भी कितने लोग मर गए .....?
पहला - अभी तो दस मान लें ....
चौथा - कुछ ज्यादा नहीं हो गए ......!!!
फिर से चौथा - हमारी व्यवस्था लगी थी, देखिये...... जिस प्रकार आस्था पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता ................उसी तरह बारिश पर भी.

Sunday, February 24, 2013

"मर्जी" शिफ्ट होकर केवल लड़के की तरफ हो गयी

पालीटेक्निक कालेज की ओर जाने वाली उस रास्ते में ढलान गजब की थी. चाहे तो इंजिन बंद करके भी ढुलकते हुए वहाँ तक पहुँचा जा सकता था लेकिन उसके दोनों टांगों के बीच फंसी 250 सी.सी. बाइक की इंजिन वहाँ पहुँचने से पहले इतना शोर करती कि वो जहाँ जैसी हो दौड़कर खिड़की पर ऐसे बैठ जाती जैसे कोई राजकुमार एयरक्राफ्ट लिए आँगन में ही लैंड कर रहा है. अब आठवें स्टैण्डर्ड की इच्छाएं ऐसे ही नरम-नरम मखमली होती हैं, जो कभी केफे काफी डे की रौशनी तो कभी नदी किनारे के झुरमुट, खंडहर के पीछे अँधेरे में मुकम्मल होती हैं. दूसरे महीने के पांचवे रोज उसकी बाइक स्पीड ब्रेकर पर फिसलने से गिरी थी, उसे चोट लगी और जख्मों के भरने के पहले ही वो दोनों सपने सुहाने लड़कपन पूरे करने घर से चले गए.......
जाहिर है, तलाश हुई ...

रिपोर्ट हुई .... खोजबीन मची 

मिल गए .....

पूछा तो कहा ..... मर्जी से गए, साथ रहे, मुहब्बत की है...

फिर बयान दर्ज होने तक "मर्जी" शिफ्ट होकर केवल लड़के की तरफ हो गयी
 मुकदमा कायम हुआ.....

लड़के को चारदीवारी वाले जेल और .....लड़की उसी घर में ले जायी गयी जिसमें वो खिड़की अब हमेशा बंद रहती थी.

अरे ..! क्या सोच रहे हैं आप सब ख़तम....समाज, मर्यादा, नैतिकता .... कानून जैसी भी कोई चीज होती है कि नहीं

उसे भी मालूम ये पुलिस की गाड़ी है

गाड़ी के पहुंचते-पहुंचते सिग्नल पर बत्ती लाल हो गयी. वह धीरे से शीशा नीचे कर अगल-बगल देखने लगा. करीब डेढ़ साल के बच्चे को जैसे तैसे से गोद उठाये वह बच्ची स्कार्पियो, वेगन-आर, स्विफ्ट के पास से हाथ जोड़े उसके ठीक बगल वाली सफारी के बंद शीशे पर ठक-ठक करती मांगने लगी. अगला नंबर अपना मानकर उसने डिक्की की तरफ एक नजर घुमाते हुए जेब से ही सिक्का टटोल लिया.
 
वह घूमी तो....फिर उसके बाजू से गुजरकर पिछली गाड़ी पर दस्तक देने लगी...बाबूजी ... बाबूजी...! 

सिक्का मसलते हुए वह सोचने लगा....... उसे भी मालूम ये पुलिस की गाड़ी है

Friday, February 17, 2012

मानसी ये तुमने क्या किया ......?


पुलिस स्टेशन इंचार्ज का कमरा 

एक कानूनन बालिग़ युवती सहज होने की कोशिश में अस्थिर आँखों को उठाती गिराती मोल्डेड कुर्सी के कभी आगे तो कभी पीछे खिसकती जल्दी से उस पल के गुजर जाने की दुआ कर रही है. उसके बाईं ओर उसी के पिता, दाहिनी ओर पखवाड़े भर पहले ही उसके आर्य समाज मंदिर में बने पति के पिता और सबसे बायें दोनों परिवार के शुभचिंतक बैठे थे. सामने कुर्सी पर सिविल कपड़ों में एक पुलिस अधिकारी. इन सबके बीच लड़का एक किनारे खड़ा सिर फर्श पर लगे नए टाईल्स की तरफ किये उसमें नजर आ रही धुंधली सी तस्वीर में मन ही मन कुछ बना बिगाड़ रहा था.


शुभचिंतक - चलिए इतनी मुश्किल के बाद दोनों आ तो गये साहब.... अब बयान हो जाये.


लड़की का पिता - तुम्हे २० साल पूरे नाजो-नजाकत, लाड़ प्यार से हमने पाला. जो जानते थे वो संस्कार दिया. हमसे क्या गलती हो गयी जो तुमने हमें ये दिन दिखाया. अब भी उसे छोड़कर आ जाओ, मैं तुम्हें घर में जगह दूंगा...नहीं तो तुम हमारे लिए मर गयी समझो. झुकी आँखों के भीगे कोर पोंछ कर दबे सीने को सामान्य करते हुए शुभचिंतकों की ओर देखने लगा.


लड़के का पिता - साहब, लड़के ने जो कदम उठाया उसकी हमें ज़रा भी जानकारी नहीं थी. हम उसके इस काम से सहमत भी नहीं हैं पर अब इसने ऐसा कर लिया है तो हमें लड़की को घर में तो रखना पड़ेगा. वाक्य पूरा होते ही सामने से निगाह हटाकर निर्विकार भाव से शुभचिंतकों की ओर देखने लगा.


पुलिस अधिकारी ने जैसे ही लड़के की तरफ निगाह की वहाँ बैठे कई लोगों ने एक साथ कहा - अर्चित, साहब तुमसे कुछ पूछ रहे हैं.
लड़का - हडबडाते हुए .. सर अभी एन.आई.आई.टी. से डिप्लोमा कोर्स कर रहा हूँ और जॉब के लिए प्रयास भी.


पुलिस अधिकारी - लड़की की तरफ बिना देखे ..तुम्हारा क्या कहना है मानसी ? 


लड़की याने मानसी - पुलिस अधिकारी की ओर बिना देखे.. पापा, आप हमें इसी तरह अपना लो न, मैं जानती थी आप लोग नहीं मानेंगे इसलिए ये कदम उठाया. मैं अर्चित को छोड़कर नहीं आ सकती इसी के साथ रहूंगी. दृढ़ता से हुई शुरुआत रुवांसे गले में फंसकर दो वाक्यों में खतम हो गयी.


पुलिस अधिकारी - तुमने कहाँ तक पढाई की है मानसी


आर्ट्स ग्रेजुअट हूँ सर...  


जीवन कैसे चलेगा तुम दोनों का ...प्रेक्टिकल जवाब देना.
पुलिस अधिकारी की भंगिमा में बातचीत को अधिक लंबा न खीचने का साफ़ संकेत था.


सब एक दूसरे की तरफ देखते है फिर गहरी चुप्पी छा जाती है 


ये तो लड़का है इसे तो समाज ने ही प्रमाण पत्र दे रखा है. कितने ही प्यार करे .. शादियाँ करे ..गलतियां करे. पर मानसी का क्या ? रहेगी तो इसके साथ, जैसा वो रखे, या अर्चित के पिता के हिसाब से जैसा उसे पड़े. वैसे घर से निकले तो दोनों साथ ही थे पर अब .....!  इतनी मशक्कत के बाद .... अर्चित , अर्चित के पिता, खुद उसके पिता और क़ानून के मौजूद होते हुए भी क्या मानसी का भविष्य सुखमय होना तय है ?
या फिर बार-बार ये सुनते हुए कि "मानसी ये तुमने क्या किया ?" मानसी का संघर्ष जारी रहेगा ...