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Tuesday, May 24, 2011

"गाँव कहाँ सोरियावत हे" भाग- 6

सुकवि बुधराम यादव की लम्बी कविता "गाँव कहाँ सोरियावत हे" की अगली कड़ी भाग- 6 के रूप में प्रस्तुत है....चाल चरित म कढ़े रहंय. इन पंक्तियों में सुकवि गाँव के परिवेश में धर्म, नीति, न्याय और फैशन के बदलते और दिखावटी रूप पर कटाक्ष करते हुए .. 


चाल चरित म कढ़े रहंय

होये बर होथे गाँव गाँव
की रतन अउ नवाधा रमायन!
सतसंग भागवत कथा  घलव
पन बाहिर कुकुर कटायेन*!
बात बात म ओरझत फिरथें
बिरथा रार बढ़ाथें!
छिन भर म जुग भर के  जोरे
नता ल होम चढ़ाथें !
नेम धेम मनवइया ओकर ले
दिन दिन दुरिहावत हें!

भले रहंय अड़हा तइहा पन
कइ ठन गुन ल पढ़े रहंय!
कदर करंय जइसन के  तइसन
चाल चरित म कढ़े रहंय!
पर के  खातिर सरबस देवंय
बोलंय मधुरस कस बानी!
आज सरावत हें घुरूवा म
लाज सरम सब बिन पानी!
काल परो दिन अउ का  होही
अंतस सोच सतावत हे!

पढ़ंता गुनवंता मन के
आज हे घलव जमाना!
उद्दिम करके  बुध बल आँछत*
जोरत हावंय खजाना!
गुन के  पीछू राज राज अउ
देस बिदेस पूजाथें!
अपन नाव के  संग राज के
नाव ल जबर जगाथें!
अवगुन के  संग के  जमाना
गुन ल घलव बढ़ावत हें!

चटनी नून बासी झड़कइया
दार बिना नइ खावंय!
गुटका  पान मसाला माखुर
मुंह भरके  पगुरावंय!
भिनसरहा जागब बिसरागंय
आठ बजे तक  सोथें!
अधकचरा पढ़वइया घर न
घाट घलव के  होथें!
तइहा के  बइहा ले गय अब
कलजुग रंग देखावत हे!

किसिम किसिम के  ओनहा कपड़ा
नवा समे के  फैसन!
पुरती खातिर उदिम करत हें
जेकर लखारस* जइसन!
गाँव गली गुंडी घर अंगना
बैठक  चौरा भावय!
सरहा सरही के  कुरिया म
मन के  डाह बुतावय!
इस्‍नो पावडर साबुन सेंट
अउ का  का  अजब लगावत हें!

समे के  बलवंता चकिया म
एक दिन जमो पिसाथें!
दू कौड़ी म हरिश्चंद्र
राजा ल डोम बिसाथे!
गांव गौटिया तक  ल तइहा
सइकल चढ़े नइ आवय!
अउ दू आखर अंगरेजी का
हिन्‍दी न गोठियावय!
अब इंकरे नाती नतुरा मन
अंगरेजी फरमावत हें!

अमर बेल कस अतियाचारी
बिना मूर जगरत हें!
बिना जतन के  बेाम जइसे
इहाँ उहाँ बगरत* हें!
एक  हाथ खीरा के  लबरा
नौ हाथ बीज बतइया!
बिना गुड़ के  बस बातन म
लाड़ू सिरिफ बंनइया!
करम धरम के  सत्‍यानाशी
नीत न्‍याय समझावत हें!

हिंदी अरथ - कटायेन : आपस में बिना लिहाज के विवाद करना, आँछत : भरोसे में, लाखारस : सामर्थ, औकात, बगरत : फैलना, पसरना

Saturday, May 21, 2011

"गाँव कहाँ सोरियावत हे" भाग- 5

सुकवि बुधराम यादव की लम्बी कविता "गाँव कहाँ सोरियावत हे" की अगली कड़ी भाग- 5 के रूप में प्रस्तुत है. सबके  मुड़ पिरवाथें शीर्षक से आज के युवा, राजनीति और संस्कृति का गाँव के परिवेश में क्या स्थिति है..अद्भुत चित्रण.


सबके  मुड़ पिरवाथें

अब नवा जमाना के  लइका
सब नवा नवा भर गोठियाथें
हंसिया कुदरी घर खेत कती
जाये खातिर बर ओतियाथें*!
बाबू साहेब अउ हवलदार
पढ़ लिख के  कइ झन होवत हें!
कइयों झन के  करतूत देख
दाई ददा मन रोवत हें!
काम कमाई बिन कौड़ी भर
सूट बूट झड़कावत हें!

अब के  लइका  मन के  होथे
ऊंच पूर कद काठी।
पन नइ जानय अखरा का ये
अउ भांजे बर लाठी!
रतिहा भर म राजनीति के
होथें जबर जुवारी!
पंचपति, सरपंच पति बन
लक्ष्मीपति पुजारी!
होटल म खावब अउ मोटर म
बस चलब सुहावत हें।

राजनीति के  ओट म अइसन
नगरा नाचे लागिन!
तइहा के  सोये राक्वछस मन
लागत हे फेर जागिन!
पउवा बोतल कुकरा बोकरा
सौ पचास रूपिया म!
लुगरा पोलखा* घोतिया पटकू
अउ गहना-गुरिया म!
पैसा वाले मन गरीब के
नीयत घलव डोलावत हें!

नकटा बुचुवा मारे कूटे
चोर उचक्का डाकू  !
लोफड़ लंपट छल परपंची
लोभी  लुच्‍चा आगू!
भरे सभा म बइठे खुरसी
मच मच के  गोठियाथें!
चमचा भरंय हुंका रू ऊपर
ले ताली पिटवाथें!
अपन नफा के  सिरिफ गोठ ल
जानत अउ जनावत हें!

पंच कउन सरपंच कउन
जनपद जिला पंचाइत!
गांव ठाँव के  हित सेती* बर
एक  ठन जबर सिका इत!
नोट म बोट सके ले खातिर
घर पहली सिरवाथें!
जीत गइन तौ पांच बरिा ले
सबके  मुंड़ पिरवाथें!
मरहा-खुरहा-दुबरहा के
हक  ल सक ल पचावत हें!

गली गुड़ी अऊ हाट बाट म
गंजहा भंगहा घूमय!
गहना गुरिया भड़वा बरतन
के  कीमत म झूमय !
मंदिर स्कूल पंचइत भवन म
जुआ सट्टा खेंलंय !
अपन सब सिरवाके  लइकन
मन बर पाप सके लंय !
असली सपूत हें गिने चुने
जे गाँव के  लाज बचावत हें!

आगी खाके  अंगरा उगलंय
अउ उधम मचावंय घूम घूम!
चिमटी भर ओनहा कपड़ा म
इन नाचंय गावंय झूम झूम!
घर घर म टी.व्ही.टेप देख सुन
एक  एक  ले अनहोनी!
टूरा टनका  के  का  कहिबे
बिगड़त हें मोटियारी नोनी!
चोंगा डब्‍वा तो ठौर ठौर
अनसुरहा कस बोरियावत* हें!

जेकर हाथ लगाम थमायेन
घोड़ा नइ कबूवावंय!
न काठी ले ऐंड़ लगावंय
न कोड़ा चमकावंय!
अंधवा कनवा खोरवा* लुलुवा
अउ डोकरा डोकरी के !
सुख सुविधा ल हवंय डकारत
जइसे सब पोगरी के !
अपन भितिया खदर-कुरिया*
काया कलप करावत हें!

बदनाम घलव हें नाव बिचारी
मितानिन संगवारी के !
पंचाइत अउ का  सुसाइटी
स्कूल का  आंगन बारी के !
कु छ सढ़वा बन कुछ हरहा* कस
मौका  पाके  ओसरावत* हें!
कुछ रूप रंग म बउराये
कुछ चारा चर पगुरावत हें!
बइठे जउने डारा अड़हा
निरदइ असन बोंगियावत* हें!

लखनउ दिल्‍ली का  कानपुर अब
खोर-गिंजरा* मन बर पारा!
जकला भकला मन रहिन कहाँ
निच्‍चट सिधवा अउ बिचारा!
राज राज म किंजर बुलके
सीख गइन दुनियादारी!
खपरा ले लेंटरहा खातिर
बेचत हावंय कोला बारी!
दू चार आना मनो लगथें
बांचे  कइ नाव धरावत हें!


Friday, April 29, 2011

गाँव कहाँ सोरियावत हें..भाग-3

इस अंक में गाँव कहाँ सोरियावत हें से सुकवि बुधराम यादव की लम्बी कविता का प्रथम भाग प्रस्तुत है. छत्तीसगढ़ी के सुधि पाठकों के लिए कुछ शब्दों के हिंदी अर्थ को भी इस भाग के अंत में स्थान दिया गया है ताकि कविता का पूरे भाव से रसास्वादन किया जाए.


गठरी सब छरियावत हें

देखते देखत अब गांव गियाँ
सब शहर कती ओरियावत हें!
कलपत कोयली बिलपत मैना
मोर गाँव कहाँ सोरियावत हें!
ओ सुवा ददरिया करमा अउ
फागुन के  फाग नंदावत हे
ओ चंदैनी ढोला-मारू
भरथरी भजन बिसरांवत हे!


 डोकरी दाई के  जनउला*
कहनी किस्सा आनी बानी!
ओ सुखवंतिन के  चौरा अउ
आल्हा रमायन पंडवानी!
तरिया नदिया कुंवाँ बवली के
पानी असन अटावत हें!

सुकुवा* ऊवत नींद भर रतिहा
अउ कुकरा बासत भिनसरहा
अब पनिहारिन गगरी* मांजय
न बहरी बाजय मुंधियरहा*!
उठ नवा बहुरिया घर लीपय
 न गोबर हेरंय लछमैतीन !
ढेंकी* मूसर के  आरो तो
बिन सूने गुजर गय कइयो दिन!
अब खोर गली छर्रा-छिटका*
न अंगना गोबर लिपावत हे!

अमली-चटनी आमा-चानी
भाटा-खोइला* सुकसा-भाजी*!
बंडी पोलखा के  लेन देन
ओ हाट-बाट खउवा-खाजी!
बर पीपर पिकरी* चार जाम
बन बोइर तेंदू अउ औंरा!
चर्रा गिल्ली डंडा फुगड़ी
सब बिसरागंय बांटी भौंरा!
अब नवा जिनिस मन ऊपरागंय
जुन्ना* जमो तरियावत* हें!

अब अधरतिहा दौंरी फांदय
न पंगपंगात* नागर साजंय
जतवा* कहुं बाजय घरर घरर
न दही मथावय घमर घमर!
पहुना परमेसर नइ मानय
गीता रमायन नइ जानय!
न किंजरय फेरी गली गली
न सरेखंय अब हली भली !
जुग भर के  जोरे मया पिरीत
के  गठरी सब छरियावत हे!

ओ खेतवरिया के  रूखुवा म
रेरा चिरइया के  खोंधरा*!
रूंधे बांधे बारी बखरी
पाके  सुार जोंधरी जोंधरा!
ओ हरेली के  गेंड़ी अउ
पोरा के  नंदी जंतुलिया!
बिहाव के  सिंघहा-झांपी* अउ
नोनी के  नानुक  झंपुलिया*
करसा करी के  लाड़ू संग
अब बतासा बिसरावत हें!

ओ तरिया तीर नदिया खंड़ म
कुहक त फुदकत बइठे कोयली!
ओ घाघर तितुर के  तुर तुर
अउ मैना के  अइंठे बोली!
पड़की  के  घुटरब* घुटुर घुटुर
अउ कठखोलवा के  खटर खटर!
खंचवा* कस आँखी खुसरा के
घुवा के  बड़का  बटर बटर!
ओसरी पारी सब गाँव छोड़
डोंगरी पहरी बर जावत हें!

भूखन घर बाबू के  छट्ठी
दुखिया घर के  ओ अतमैती* !
बर पीपर अउ लीम छइहाँ तरि
गुड़ी म बइठे पंचयती!
उन पंच कहाँ परमेसर कस
अब तो बछवा कस अदरा* हें।
कहे बर छांटे-निमेरे
पन सिरतो बदरा-बदरा हें!
लरहा मरहा तक  पद पाके
रतिहा भर म हरियावत हें!

अब मरघटिया अउ गौचर का
धरसा* म धांन बोवावत हे!
गउठान बिना कोठा भीतर
गरूवा बछरू बोमियावत* हें!
जेती देखव बेजा कब्‍जा
रस्ता अउ डगर छेंकाये हें।
सब पाप पोटारे बइठे हें
पुन कौंड़ी असन फेंकाये हें!
लोटा धर बाहिर जाये बर
माई मन बड़ सकुचावत हें!

जुन्ना दइहनही म जब ले
दारूभट्ठी होटल खुलगे!
टूरा टनका  मन बहकत हें
सब चाल चरित्‍तर  ल भुलगें!
मुख दरवाजा म लिखाये
हावय पंचयती राज जिहाँ।
चतवारे* खातिर चतुरा मन
नइ आवत हावंय बाज उहाँ!
गुरतुर भाखा सपना हो गय
सब कॉंव कॉंव नरियावत हें!

*हिन्‍दी अरथ - जनउला : पहेली बुझाना,  सुकुवा : शुक्रतारा,  गघरी : पानी का घड़ा,  मुंधरिहा : भोर का  समय,  ढेंकी : पैर से अनाज कूटने हेतु लकड़ी का  उपकरण,  छर्रा-छिटका : छिड़कना,  भांटा-खोइला : धूप में सुखाए गए कटे हुए भटे के  टुकड़े,  सुकसा-भाजी : धूप में सुखाई गई चना,तिवरा,गोभी आदि की  भाजी,  पिकरी : पीपल का  फल, जुन्‍ना : पुराना, तरियावत : नीचे होना, पंगपगांत : सूर्योदय पूर्व, जतवा : कोदो दलने हेतु मिट्टी की बड़ी चकिया,  खोंधरा : घोंसला,  झांपी : शादी में कन्‍या पक्ष की  ओर से वर पक्ष को सगुन के  सामान भरकर दिये जाने वाला बाँस से निर्मित ढक्कन सहित बड़ा टोकना,  झपुलिया : ढक्‍कन वाली बाँस की विशिष्ट टोकरी,  घुटरब : आवाज निकालना,   खंचवा : गड्ढा,  अतमैती : मृत्‍युभोज, अदरा : नवसिखिया, धरसा : गाँव में निस्तार हेतु बैल गाडिय़ों एवं जानवरों के आने-जाने के  लिए छोड़ा गया चौड़ा रास्ता,  बोमियावत : अधीरता से आवाज निकालना,  चतवारे : साफ करना

Wednesday, April 27, 2011

गॉंव कहॉं सोरियावत हें

छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यकार सुकवि बुधराम यादव जी  की नयी कृति जिसे विद्वानों ने सिर्फ लम्बी कविता न मानते हुए गाँव पर विरचित खंड काव्य ... की संज्ञा दी है. 

 "गाँव कहाँ सोरियावत हें "..को एक श्रृंखला के रूप में यहाँ पोस्ट करने की कोशिश है. इस किताब का विमोचन विगत दिवस प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मलेन दूधाधारी मठ रायपुर में हुआ. समारोह के अतिथि अशोक शर्मा,अध्यक्ष छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम, महंत रामसुंदर दास, विधायक जैजैपुर, राजीव श्रीवास्तव आयुक्त संस्कृति अवं पुरातत्व, महादेव प्रसाद पाण्डेय, दानेश्वर शर्मा, लक्षमण मस्तुरिहा थे. 

आज पहली कड़ी में खंडकाव्य का परिचय और डॉ चित रंजन कर प्रोफ़ेसर, साहित्य एवं भाषा अध्ययन शाला रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय- रायपुर की समीक्षा प्रस्तुत है.


गॉंव रहे ले दुनिया रइही

माँ अउ मातृभूमि ल सरग ले घलव महान कहे गये हे । मैं ह एम मातृभाषा ल घलव जोड़िहौं, काबर के हमन जइसन अउ जतका अपन बोली या भाखा म कहे सकत हन, ओइसन अउ ओतका आने भाखा या बोली म नइ कहे सकन । `गाँव कहाँ सोरियावत हें' बुधराम यादव जी के अइसन किताब आय, जउन ह उँकर मातृभाखा-परेम ल उजागर करत हे । कहे बर हमन सब गाँव-गंवई म जनमे-पले-बढ़े हन, फेर सहर के परभाव म आ के गाँव ल जानौ-मानौ भुलाइच डारे हन । `जुग भर के जोरे मया-पिरीत के गठरी सब छरियाव हें '।

मनखे ह आने जीव-जन्तु मन ले कउन रूप म अगुवाए हे ? जिए बर सबो ल हवा-पानी-अन्न के जरूरत होथे, फेर मनखेपन के अतकेच कहनी नो हय - हमर सभ्यता अउ संसकिरति के नाँव खा-पी के, जीके नइ धराय गय हे । ओ ह सब के सुख म सुखी अउ सबके दुख म दुखी होय के नाँव आय । हमर सुवा, ददरिया, करमा,भरथरी, चंदैनी, पँडवानी, ढोला-मारू, आल्हा, रमायन के जउन रिवाज रहिस हे, ओ ह सोझे देखाए-सुनाए बर नई रहिस - ओ मन हमर सुख-दुख के, मया-पिरीत के समुंदर हें, जउन आज `तरिया, नदिया, कुवाँ,बवली के पानी असन अटावत हें ।'

`गाँव कहाँ सोरियावत हें' के कउनो छंद ल पढ़ौ अउ देखौ कि गाँव म काली कइसन सुमता-मया रहिस अउ आज का हो गे हवय । बुधराम जी अपन हिरदे के पीरा ल कहत नइ अघावत हें के

``जुन्ना दइहनहीं म जब ले
दारू भट्ठी होटल खुलगे
टूरा टनका मन बहकत हें
सब चाल चरित्तर ल भुलगें
मुख दरवाजा म लिखाये
हावय पंचयती राज जिहाँ
चतवारे खातिर चतुरा मन
नइ आवत हावंय बाज उहाँ
गुरतुर भाखा सपना हो गय
सब काँव-काँव नरियाव हें ।''

पूरा किताब ह एकेच ठन कविता म पूर गे हे । `गठरी सब छरियावत हें', घंघरा -घुंघरू, घुम्मर-घांटी, `सबके मुड़ पिरवाथें', चाल चरित म कढ़े रहँय, दुबराज चाँउर के महमहाब, `बिन-पानी', `सारंगी जब बाजय', `नाचा-गम्मत', `मातर-जागँय',`महँगा जमो बेचावत हें', `अँखमुंदा भागत हें',- ए बारा ठन सिरसक मन म गाँव के तइहा के बरनन अउ आज के हालत ल कवि ह जइसन देखिस तइसनेच उद्गारे हवय, जउन म हमर गाँव के परकिरति अउ संसकिरति ह परगट झलकत हे ।

आधुनिक सभ्यता के आए म हमन का सिरतोन अगवाए हन ? जउन ह पहिली समस्या नइ रहिस, ओ ह आज अइसन बिकराल रूप धरत जात हे के कउन जनी, दस-बारा बछर के बाद ए धरती के का होही ? पानी ल जीवन कहे गय हे - बिन पानी सब सून । आज पानी के समस्या गाँव-गाँव, सहर-सहर म बियापे हे । एकर का उपाय हे ? आवव देखी-

`रतनपुर जइसन कइ गढ़ के, छै-छै कोरी तरिया
बिना मरम्मत खंती माटी, परे निचट हें परिया
बरहों महीना बिलमय पानी, सोच उदिम करवइया
जोगी डबरा टारबाँध, स्टापडेम बनवइया ।
मिनरल वाटर अउ कोल्डड्रिंक फेंटा पीके गोरियावत हें ।'

हमन रूख-राई ल काट के जंगल के सइतानास कर डारेन अउ नवा-नवा , किसिम-किसिम के पेंड़-पौधा ल रोपे के नाटक करत हन - पानी कहाँ ले बरसही एकरे सेती आज `भादो महीना रोवय', कहे म का अचरज हे ।

नवा जमाना म आके जइसे हमन अपन पुरखा मन के नाव घलव ल बिसर डारेन अउ जिहाँ देखौ, उहां टी.व्ही., वीडियो फिलिम, सीरियल के नकली चरित्तर ल देख सुन के नवा पीढ़ी के लइका मन फेसन के आड़ म अपन बेवहार म लावत हें, अउ जिनगी ल स्वाहा करत हें । धरम-करम के जइसे जानव नाव ह नंदा गे हे -

`पुतरी अउ ओ रहस लीला के
दिन जानव दुरिहागंय
टी.व्ही. विडियो फिल्मी एलबम
ठौर म इंकर समागंय
ब्रह्मा बिसनू पारबती सिव
संग राधा गिरधारी
बिसर के चारोंधाम करावत
हें सीरियल म चारी ।'

कवि के धियान छतीसगढ़ के गाँव-गाँव के अंगना बारी, गली-खोर, खेत-खार, जंगल-पहार, नदिया-नरवा, तरिया-डबरी - सबके उपर जाथे अउ ओखर आँखी- देखे हाल ल बतावत नइ अघाय , फेर बस्तर के संसो घलव ह ओ ल अब्बड़ घालथे । जउन बस्तर ल कभु सांती के टापू कहत रहिन हे जिहाँ जंगल म मंगल रहिस हे उहाँ अब-

`बघवा भलुवा चितवा तेुदवा सांभर अउ बन भंइसा
रातदिना बिचरंय जंगल में बिन डर भय दू पइसा
नक्सलवादी अब इंकर बीच डारत हांवय डेरा
गरीब दुबर के घर उजार के अपन करंय बसेरा
तीर चलइया ल गोली-बारूद भाखा ओरखावत हें ।'

ए किताब म कवि के भाखा के कमाल देखत बनथे । छत्तीसगढ़ी के गुरतुर सेवाद कहूं-कहूं पं. सुन्दरलाल शर्मा के `दानलीला' के सुरता कराथे, त कहूं-कहूं पं. मुकुटधर पांडेय के `मेघदूत' (अनुवाद) के । विसय-वस्तु के बरनन अर सैली म पं. गोपाल मिश्र के `खूबतमाशा' के सुरता देवइया ए किताब ह छत्तीसगढ़ी बोलइया मन के अंतस ल तो जुड़वाबेच करही, हिंदी अउ आने बोली बोलइया मन ल छत्तीसगढ़ी सीखे बर मददगार साबित होही । छत्तीसगढ़ी भाखा के छत्तीसगढ़ीपन ल जाने बर नमूना खातिर खाल्हे लिखे परयोग ल देखौ -

`आनी-बानी,बारी-बखरी, छर्रा-छिटका, हाट-बाट,देवता-धामी, पितर-गोतर, साग-पान, घर-कुरिया, कद-काठी, नाती-नतुरा,खोर-गली, गहना-गुरिया, नकटा-बुचुवा, मारे-कूटे, मरहा-खुरहा, भड़वा-बरतन, खेत-खार,मिसे-कुटे, धान-पान, गाय-गरू, भाजी-भांटा,गाँव-गँवई, मेला-मड़ई, बर-बिहाव, अन-धन, चिरइ-चिरगुन,डोंगरी -पहरी, दूध-दही, बरा-सोंहारी, चुल्हा-चौकी जइसन द्विरूक्तिमूलक सबद मन म छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी संसकिरति के साँस अउ आस रचे-बसे हें । जउन मन छत्तीसगढ़ी के हाना-जनउला ल नइ जानंय, ओ मन बिन पानी के दू असाढ़ (दुब्बर ल दु असाढ़),गर म छुरी चलावन, अलख जगावन,राग मिलावन, करम ठठावन, कदम मिलावन, सरग म गोड़ लमावन, कलकुत, कर-कइया, कुकुर-कटायन जइसन परयोग ल ए किताब म जगा-जगा देखे सकत हें ।

छत्तीसगढ़ी के गुरतुरपन ल बढ़ाय म घुटुर-घुटुर, घरर-घरर, घमर-घमर, खटर-खटर, बटर-बटर,टपटप-टपटप, लकर-धकर, जइसन ध्वन्यात्मक सबद मन के का कहना ।

जमो मिलाके बुधराम यादव के किताब ह अपन माटी महतारी के महिमा के बखान करे म कउनो कसर नइ छोड़े हे, जउन म अपन भाखा और संसकिरति के अंजोर ह मनखे पन ल उजागर करथे, काबर के -

` गाँव रहे ले दुनिया रइही, पाँव रहे ले पनही
आँखी समुहें सबो सिराये ले पाछू का बनही
दया-मया के ठाँव उजरही, घमहा मन के छइहाँ
निराधार के ढेखरा कोलवा, लुलुवा मन के बइहाँ ।

गणेश चतुर्थी, भादो, सन्' 2010

(डॉ. चितरंजन कर)
प्रोफेसर (सेवानिवृत्त)
साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय
रायपुर


गॉंव कहॉं सोरियावत हे
छत्तीसगढ़ी कविता
बुधराम यादव
पहली संस्करन : 2010
मूल्य : एक सौ रुपए
कृति स्वामी : बुधराम यादव
प्रकाशक :  छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति, जिला शाखा, बिलासपुर (छ.ग.)
आखर संयोजन : योगेन्द्र कुमार यादव
छापाखाना : योगी प्रिन्टर्स, डी-1, सुपरमार्केट, अग्रसेन चौक, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मोबाइल : 094252 22806

सम्पर्क : बुधराम यादव `मनोरथ', एमआईजी-ए/8, चंदेला नगर रिंग रोड नं.2, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मोबाइल : 097551 41676

समरपन...

सौ बरिख ले ऊपर के पूज्यवर पिता
श्री भोंदूराम यादव जी
ल सादर समरपित...

ओर-छोर के बिवरन

1. गठरी सब छरियावत हें
2. घंघरा-घुंघरु, घुम्मर-घांटी
3. सबके मुंह पिरवाथें
4. चाल चरित म कढ़े रहंय
5. दुबराज चांउर के महमहाब
6. बिन पानी
7. सारंगी जब बाजय
8. नाचा-गम्मत
9. मातर जागंय
10. तैहा के सब बैहा ले गयं
11. महंगा जमो बेचावंत हें
12. अंखमुंदा भागत हें

नवा जमाना अउ समे के परभाव ले
गाँव-गँवई के असल सरूप सिरावत हें,
चाल-चरित्तर नंदावत हें अउ गुन ह जनव गंवावत हें ।
गाँव दिनों दिन शहर कति सरकत जाथे,
ये सबके पीरा ले सरोकार खग-पंछी ल
मनखे ले जनव जादा हावय ।
तभे तो ये सगरी कविता कोइली के कलपब
अउ मैना के बिलपब ले सराबोर हे