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Monday, November 3, 2008

हेलो !!! कौन...! ...भावना दीदी ~~ !! भाग- 4

इन सभी संदिग्धों से अब पुलिस ने पूछताछ के टीम बनाकर सिलसिलेवार पूछताछ करना शुरू किया....सनत  शुक्ला, राजेश पाटन वाला, राजेश गढा वाला, अजय बवेले,  और कुछ गढा के लडके.  पूछताछ करने वाली टीम जल्दी ही निराश होने लगी..." सर ! इस तरह से तो कुछ नहीं हासिल होने वाला है, ये लोग शातिर बदमाश हैं और इनसे केवल पूछताछ .....इनका हौसला बढ़ा रही है....और हमारा....??? "  नहीं, नहीं ऐसी बात नहीं है ....टी आई साहब ...थोड़ा हौसला आप भी रखिये ....किसी भी आदमी को दोषी होने के बाद लगातार निगरानी में रखकर बातचीत करने से क्लूस जरुर मिलते हैं....!!  मैं थोड़ी देर में आपको अपने ओब्सेर्वेशन का नतीजा बताता हूँ.  DSP ने विवेचना में लगे स्क्वाड का धैर्य बनाये रखने के लिए पूरे जोश के साथ समझाने की जुगत किया. अपने विडियो रिकॉर्डिंग और मुखबिर से बात करने के थोड़ी देर बाद थाने की तरफ़ अपनी गाड़ी मोड़ते हुए, टी आई को वायरलेस सेट से पूछा...लोकेशन प्लीज..!  सर थाने पर...! टी आई ने "कैरी ऑन" की औपचारिकता को छोड़....तत्काल जवाब दिया. और चिंटू कहाँ हैं...? सर वह भी थाने पर ही मौजूद है.. ओके....मैं भी थाने आ रहा हूँ ओके , रोजर सर..! टी आई ने सेट पर जवाब देकर ड्यूटी ऑफिसर से दो बढ़िया चाय लाने के लिए कहा.


टी आई साहब आप ने सबसे इन्डिविसुअली बात कर ली !...सर..अब तक तो कई बार .! ..क्या कहना है आपका..! सर, मैं तो अब आपके आदेश का इंतजार कर रहा हूँ... टी आई जैसे रटे हुए संवाद बोल रहे थे.  DSP ने कहा तो ठीक है एक बन्दे को लेकर आइये...यहीं पर.....!!!  किसे सर...? .वही....हेलो  कौन  भावना दीदी वाले को...!!! किसको सर....समझा नहीं...?  अमित ठाकुर को.....DSP ने चमकती आँखों को ऊपर उठाते हुए अपनी उँगलियों में फंसे पेपरवेट को टेबल ग्लास पर घुमा घुमाकर उसका संतुलन सांधने की कोशिश करने लगे.



चिंटू उर्फ़ अमित ठाकुर को पूछताछ के लिए पहले ही थाने बुला लिया गया था....जो अभी तक इंटेरोगेशन में पूछे जा रहे..... उसके  मालगुजार से सम्बन्ध, घटना के दिन उसकी उपस्थिति, अन्य गतिविधियाँ और कार्य के बारे सभी सवालों के जवाब बड़े इत्मीनान और गंभीरता से दे रहा था.

DSP ने टी आई को इशारा किया कि अब चिंटू पर कुछ नजरें इनायत की जाये.... थोडी सी नफासत भरी सख्ती और अकाट्य तथ्यों के झंझावात के बीच चिंटू ने कुछ देर... न, नही, मुझे याद नहीं, मैं नहीं जानता, मुझे मालुम नही के सहारे अपना वजूद बनाये रखा....लेकिन खिलाफ होते माहौल में और अधिक देर तक टिक नहीं सका !......सूखी आँखों से आसमान की ओर निगाह करते हुए कहा...." क्या करता सर ! ..इसके सिवा मेरे पास कोई रास्ता भी नहीं था. " 

.................अमित ठाकुर उर्फ़ चिंटू जो कि तीन साल पहले ड्राईवर की हैसियत से मालगुजार ओंकार प्रसाद शुक्ला के संपर्क में आया...अपने दक्षता,  कौशल और विश्वास जीतने की कला से धीरे-धीरे पहले मुलाजिम फ़िर मालगुजार के कई व्यवसायिक के साथ निजी कामकाज का राजदार हो गया.  ओंकार प्रसाद भी उसके काम और निष्ठा को देखते हुए उसके हैसियत से ज्यादा सम्मान देने लगा. इन्हीं बातों से चिंटू ख़ुद को एक राजदार मुलाजिम से कहीं आगे मालगुजार का हिस्सेदार [ पार्टनर ] समझने लगा.  इस बीच होने वाले सभी सौदों में वह ख़ुद का हिस्सा मन ही मन जोड़ने लगा.  कुछ सौदों में उसने मालगुजार से अपने लिए हिस्सा देना भी कबुलवा लिया. लेकिन ओंकार प्रसाद शुक्ला की कई आदतें मालगुजारी जो से उपजी हुईं थीं...... पगार समय पर नहीं देना, हिस्से देने के वादे बस करना,  काम लेते हुए तारीफ करना और गुस्से में सब कुछ उतार देना,  शराबनोशी,  इस उम्र में भी नीयत ख़राब होने की कमजोरी... जा नहीं रही थीं.  धीरे धीरे चिंटू मालगुजार से बेजार होने लगा और फ़िर एक दिन उसने फैसला कर लिया कि.... इतनी मेहनत और समय जो उसने लगाया है, उसका जीवन के गणित में कोई तो हिसाब होता होगा.....ये तो करना पड़ेगा...!!!

................अपने साथियों के मिलकर उसने योजना बनायी कि पहले मालगुजार को फोन करके जमीन देखने बुलायेंगे और धमका कर पैसे वसूल लेंगे...नहीं मानने पर मौका भाँप कर काम करेंगे.
................इसी योजना के तहत उसने 16 जून की सुबह 9.13 बजे राजेश गढा वाले से मिले सिम से मालगुजार को फोन किया.  मालगुजार के नियत स्थान केशरवानी होटल पहुँचने पर अपने साथी....मोनू उम्र १८ वर्ष  निवासी गढा मोहल्ला,  भोलू उर्फ़ सचिन उम्र १९ वर्ष निवासी दशरथ नगर के साथ उसे जमीन दिखाने के बहाने अपने घर में लाकर एक कमरे में बिठा लिया.  घर वालों को समझा दिया कि जमीन के एक बड़े सौदे की बातचीत चल रही है...तुम लोग डिस्टर्ब नहीं करना.
...............पहले इधर-उधर की बातों में लगाये रखने के बाद चिंटू दोपहर तक कहीं मुद्दे पर आया.....तो बात समझते ही मालगुजार भी उसे बातों में ही उलझाये रखकर अपने बच निकलने का रास्ता तलाशने लगा... इस शह और मात के खेल में दोनों का समय निकलता रहा.  फ़िर शाम को करीब 6.55 बजे चिंटू ने अपने साथियों से मशविरा किए बगैर मालगुजार के अभी तक घर से बाहर रहने का कारण बताते हुए खैरियत देने के साथ ही थोड़े और समय की मोहलत पाने के लिए ......मालगुजार के घर पर उसकी बड़ी बेटी भावना पाण्डेय के फोन नंबर पर काल किया. अक्सर बातचीत के शुरुआत में होने वाले .....हेलो !  कौन..?  भावना दीदी...!!!  बोलकर ओंकार प्रसाद शुक्ला के जमीन के सौदे के सिलसिले में पाटन में होने और थोड़ी देर से आने की जानकारी देने की कोशिश की. लेकिन उसे क्या मालूम था कि ये " तीन शब्द " ही उसके सटीक योजना में सेंध लगाने के लिए काफी होंगे. 
..............रात लगभग 10.00 बजे तक सौदा,  वसूली,  फिरौती ...की बात तय नहीं होने पर, तीनो साथी मिलकर मालगुजार को बीयर पिलाकर एक ही स्कूटर की बीच वाली सीट पर बिठाकर भेड़ाघाट के निर्जन लम्हेटाघाट के किनारे ले गये ...वहाँ भी हिस्सेदारी के बकाया रुपये पाने के लिए खूब जोर मशक्कत की...लेकिन कुछ नतीजा न निकलते देख रात करीब 2.30 बजे ......वहीं पड़े पत्थर, स्कूटर में रखे राड से सर पर मारकर मालगुजार को पहले अधमरा कर दिया फ़िर उसका चेहरा विकृत कर पहचान छुपाने के लिए स्कूटर के पेट्रोल से गमछा भिगाकर जला दिया. लेकिन अपने इस अपराधिक कृत्य से चिंटू न तो अपनी,  न मालगुजार ओंकार प्रसाद शुक्ला की और न ही अपने कम उम्र साथियों की पहचान पुलिस की खोजी निगाहों से छुपा पाया..... बल्कि उम्र के 24 वें साल में ही...वह मालगुजार के अधजले चेहरे की भांति अपने साथ दो और नादान साथियों का आशियाना जरुर जला बैठा.  
-- समीर यादव 
नोट  -  अभियोजन की कानूनी बाध्यता हेतु कुछ व्यक्तियों के नाम परिवर्तित कर दिए गये हैं तथा सेल नंबर्स नहीं दर्शाए गये हैं.


Sunday, November 2, 2008

हेलो !!! कौन...! ...भावना दीदी ~~ !! भाग-3


दूसरे दिन याने 18 जून को सुबह पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आ गई, जिसमें चेहरे पर पेट्रोल जैसी ज्वलनशील पदार्थ डालकर जलाने और नुकीले, भोथरे हथियार से सर के पीछे और चेहरे पर गहरे जख्म पहुँचाकर हत्या किया जाना  लेख किया गया था. मृत्यु का कारण अधिक रक्तस्त्राव और शाक को बताया गया, जबकि समय 24 से 36 घंटे के पूर्व होना निश्चित किया गया था.

उधर मोबाइल नेटवर्क कंपनियों की मेहरबानियों से CDR  [ कॉल डिटेल्स रिपोर्ट ] लेकर कांस्टेबल उम्मीद से पहले ही DSP  के समक्ष उपस्थित हो गया. DSP ने उसे शाबास कहते हुए अभी तक लिए गये बयानों को एक बार फ़िर गंभीरता से पढ़ा, वे बयान जिसमें खास तौर से मृतक ओंकार प्रसाद शुक्ला के जानने वालों ने इस सनत शुक्ला की तरफ़ उंगली स्पष्ट रूप से उठाई थी. और फ़िर अपनी नोटिंग डायरी की कुछ ख़ास पेजेस को खोलकर, CDR  के साथ तरतीबवार विश्लेषण आरम्भ किया.  


सबसे पहले ओंकार प्रसाद शुक्ला के सेल नंबर के CDR अनालिसिस शुरू करते ही उनकी नजरें सुबह 9.13 बजे के इनकोमिंग कॉल पर जाकर टिक गई, जिसके आने पर मालगुजार बगैर ड्राईवर की प्रतीक्षा किए ही पैदल घर से निकल पड़ा था. इस नंबर के डिटेल्स नोट कर DSP ने हेड कांस्टेबल शिवनाथ को उस नंबर/सिम कार्ड के धारक व्यक्ति को फ़ौरन पता करने के टास्क पर लगा दिया. उसके बाद CDR विश्लेषण के अनुसार मृतक के मोबाइल से बेटी भावना एवं ड्राईवर अजय बवेले से हुए बातचीत की, बताये गये समय अनुसार पुष्टि हो रही थी. लेकिन लोकेशन का कालम कुछ अलग बंसी बजा रहा था, जो ध्यान देने का बिन्दु तो था..... किंतु मोबाइल के टावर्स के दूरी मेजरमेंट  की इतनी एडवांस तकनीक DSP के पास नहीं थी और विवेचना में अभी तक आए साक्ष्य भी पर्याप्त नहीं थे. की इसी आधार पर शक की थ्योरी पर काम करना शुरू कर दिया जाता. थोड़ी देर बाद हेड कांस्टेबल शिवनाथ ने फ़ोन से बताया कि सुबह 9.13 बजे कॉल वाले नंबर के सिम कार्ड होल्डर राजेश का एड्रेस पाटन है. और मालगुजार का ड्राईवर अजय बवेले दो राजेश को जानना बताता है....एक पाटन का और दूसरा गढा का ही. उधर टी आई भेडाघाट ने जानकारी दी कि ओंकार शुक्ला की बेटी भावना DSP साहब से कुछ बात करना चाहती है..!!
 


DSP स्वयं टीआई को लेकर देर शाम मालगुजार के घर पहुंचे . वहाँ मृतक के परिजनों ने सनत शुक्ला के व्यवहार और हरकतों के सम्बन्ध में खूब विस्तार से जानकारी दी. साथ ही घटना के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उस पर संदेह भी जाहिर कर दिया. इसी बीच हेड कांस्टेबल शिवनाथ दोनों राजेश को लेकर वहीं पहुँच गया. दोनों राजेश के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं जिसे देख रात के करीब 9 बजे का समय दिन के 12 जैसे लग रहा था. आखिर उनके चेहरे पर हवाइयाँ किस कारण से थीं...????
पाटन नामक कसबे में रहने वाले राजेश ने बताया कि वह मालगुजार मृतक ओंकार और उसके ड्राईवर अजय बवेले को जानता है लेकिन यह मोबाइल नंबर उसका नहीं है..वह तो दूसरा नंबर उपयोग करता है. जो अभी भी उसके पास है, चाहे तो चेक कर लें. दूसरी और गढा में निवास करने वाले राजेश ने बताया कि वह केवल ड्राईवर अजय बवेले को जानता है, क्योंकि वह पान मसाला खाने के लिए आता है तो कभी कभार पान दुकान पर उसकी बात -मुलाकात हो जाती है. गढा में ही काफी समय से रहने की वजह से वह मालगुजार को नाम और चेहरे से पहचानता जरुर है लेकिन उससे कभी कोई बातचीत नहीं हुई. सेल नंबर के बारे में पूछने पर उसने बताया कि करीब २ महीने पहले उसे मोहल्ले के ही अशोक नाम के सिम बेचने वाले ने यह सिम उसे 200/- रुपये में बिना कागजात के दी थी. जो बाद में उसने चिंटू को दे दिया..! इस पर DSP ने लगभग चौंकते हुए पूछा कौन चिंटू..???  तो उसने चेहरे पर बिना कोई भाव लाये जवाब दिया-  साहब ! चिंटू......याने यही अपना अमित जो गढा में रहता है.
इसी बीच भावना पाण्डेय सूजी हुई आँखे पोंछते हुए उसी कमरे में आई, जहाँ गवाह राजेश द्वय से पूछताछ चल रही थी......और भावावेश में बिना भूमिका के कहने लगी.....क्या बताऊँ सर !  मेरे ध्यान से उतर गई थी... जब 16 जून की शाम 6.55 बजे उसके मोबाइल पर घंटी बजी तो उसने फोन अटेंड करने के लिए जैसे ही नंबर देखा तो....वह पापा का कॉल था.  लेकिन फोन रिसीव करते ही उधर से आवाज आई.....हेलो...!  कौन ..? भावना दीदी..!!  यह सुनकर वह कुछ समझ नहीं पाई और बोली ....कौन..?  चिंटू तुम...!!  जवाब में उधर से बीच में ही थोडी लरजती लेकिन कड़क सी आवाज आई ...अरे नहीं नहीं ..!!!  मैं तो पाटन से बोल रहा हूँ.  तुम्हारे पिताजी को जमीन दिखाने लाया हूँ..... लो अपने पिताजी से बात करो.  थोडी देर बाद पापा ने फ़ोन पर आकर बताया कि वह जमीन देखने के लिए पाटन में है, वापस आने में लेट हो जायेंगे.  पूरी बात को ध्यान से सुन रहे पुलिस टीम में इस बार चौकाने की बारी टीआई की थी......उसने भावना से पूछा ....कौन चिंटू. ??  भावना ने आश्चर्य भाव से बताया ...सर ! यही अपना मुलाजिम अमित ठाकुर.

यहाँ प्रकरण फ़िर एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गई......सनत शुक्ला...?  राजेश...पाटन वाला  ??राजेश...गढावाला  ???   और फ़िर चिंटू उर्फ़ अमित ठाकुर ???? अशोक सिमवाला, भावना पाण्डेय, केशरवानी होटलवाला  या फ़िर कोई और ?????.  क्या देर रात को मालगुजार के घर बैठे DSP  जैसे इन कड़ियों को जोड़ने में अभी भी लगे हुए थे.......उसी तरह आप भी लगे हुए हैं......!!  या फ़िर आप किसी निष्कर्ष पर ही पहुँच गये....!!!

मैं तो DSP साहब के साथ हूँ, जो सूत्रों को करीने से जोड़कर ठोस तरीके से मामले की तह में पहुँचाना चाहते हैं और उसके पहले कुछ बताना...!!!!!  भी नहीं चाहते .

तो पढिये यह जानने के लिए......कि आखिर लाल हवेली के मालगुजार ओंकार प्रसाद शुक्ला के रहस्यमय ह्त्या का सूत्रधार, जिम्मेदार और हत्यारा कौन ???? पुलिस ने विवेचना में आगे क्या किया .....

चौथा और अन्तिम भाग.... कल दिनांक - 03.11.2008

Saturday, November 1, 2008

हेलो !!! कौन...! ...भावना दीदी ~~ !! भाग-2





गढा जबलपुर का मशहूर " लाल हवेली "  भेडाघाट-लम्हेटा घाट से लगभग 25 किलोमीटर दूरी पर है..और वहाँ के मालगुजार ओंकार प्रसाद शुक्ला जो एक संपन्न परिवार का मुखिया था, की ऐसे निर्जन स्थान पर निर्मम ह्त्या......!!!  मामले में हत्या और इसके तरीके के पीछे जितने भी सम्भव कारण...या सूत्र हो सकते थे ..बिना देरी किये पुलिस ने सोचना, जोड़ना और जुटाना शुरू किया.

मृतक ओंकार प्रसाद शुक्ला का एक भरा पूरा परिवार था. जिसमे गृहिणी पत्नी के अलावा दो पुत्रियाँ दोनों विवाहित, उनमे से एक घटना के कुछ दिनों ही पूर्व मायके माँ-पिता से मिलने आई थी.  मालगुजारी का काफी जमीन जायदाद होने के साथ, वह इस क्षेत्र में दिलचस्पी होने के कारण बहुत समय से प्रोपर्टी डीलिंग बिजिनेस में भी था. एक पुरानी लेकिन मेन्टेन फियेट कार और उस पर एक अदद ड्राईवर अजय बवेले था. घर में लैंड लाइन टेलीफोन के अलावा एक सेल फ़ोन भी व्यक्तिगत उपयोग के लिए ले रखा था. घर से ही अपने कारोबार का ऑफिसनुमा कार्य कुछ विश्वसनीय पुराने मुलाजिमों के माध्यम से चलाता था. अभी तक आई इस तरह की जानकारी को अनालिसिस की भट्टी में चढाये पुलिस कुछ और सूत्रों की प्रतीक्षा में वहीं तैनात...आने जाने वालों से बातचीत करती रही. इस समय तक ओंकार प्रसाद शुक्ला के स्थानीय परिजन एवं कारोबारी रूप से नजदीकी लोग मातमपुरसी के लिए घर पर आने लगे थे. पुलिस से अनौपचारिक बातचीत में घर वालों ने बताया कि मृतक ओंकार का अपने सगे छोटे भाई सनत शुक्ला से संपत्ति सम्बन्धी पुराना विवाद कई मामलों मुकदमों के साथ अदालत में चल रहा है....और इसीलिए उनके परिवार का आपस में किसी भी सुख-दुःख में आना जाना भी नहीं है. इसके अलावा अन्य किसी व्यक्ति से विवाद या अन्य कोई बात-अदावत न कभी बताई गई, न ही उनकी जानकारी में अब तक आई है. अधिकांश परिजनों एवं करीबियों ने इस बात को और पुष्ट भी किया.



अभी विवेचना की कोई एक दिशा तय करना मुमकिन नहीं था...इसलिए पुलिस हत्या के पीछे ....मृतक ओंकार प्रसाद शुक्ला का अपने सगे भाई सनत शुक्ला से चला आ रहा विवाद , अन्य किसी प्रोपर्टी डीलर से छुपा हुआ कोई विवाद , फिरौती के लिए अपहरण-हत्या,  अवैध सम्बन्ध, घरेलु विवाद---में कोई पारिवारिक कलह, संपत्ति सम्बन्धी विवाद, अन्य कोई तात्कालिक कारण या फ़िर सुपारी हत्या, में घटना से जुड़े साक्ष्य ढूंढ़ रही थी. लेकिन इसके साथ भेडाघाट पुलिस DSP के नेतृत्व में कुछ और कोणों पर भी सोच रही थी.  
                                   
16 जून को भी ओंकार प्रसाद शुक्ला अपने सामान्य दिनचर्या के मुताबिक सुबह उठे,  तैयार होकर हल्का फुल्का नाश्ता किया और अखबार पढ़ते-पढ़ते ड्राईवर का इंतजार करने लगे. तभी उसके मोबाइल पर एक कॉल आया कि  " गौतम जी के मढिया के पास केशरवानी होटल पर आओ,  एक जमीन देखने चलना है. "  मिलने के लिए बताया गया स्थान इतना नजदीक था कि मालगुजार घर से पैदल ही चले गये.  घरवालों ने भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि कभी कभार ड्राईवर के लेट होने पर मालगुजार स्वयं काम पर निकल जाते और जरुरत पड़ने पर उसे फ़ोन करके अपने पास बुला लेते थे. लेकिन सुबह आने वाला वह फ़ोन किसका था, यह अब भी कोई नही जानता था..जिसका कॉल उसे आखिरी बार घर से निकाल ले गया था. 
घरवालों और सभी मुलाजिमों के बयानों में कोई खास बात नहीं समझ में नहीं आई, सिवाय ओमकार प्रसाद की बड़ी बेटी भावना पाण्डेय के बयान में यह बताना कि.... 16 तारीख को पापा ने उसके मोबाइल पर एक बार सुबह जमीन देखने जाने की बात बताने, फ़िर दो बार ड्राईवर के आने पर मोबाइल से बात करने के लिए कहने और फ़िर एक बार शाम को जमीन देखने के कारोबारी सिलसिले में पाटन में होने और देर से घर लौटने की जानकारी देने के लिए फ़ोन किया था.  ड्राईवर अजय बवेले ने बताया कि उसे घर के काम से देरी हो जाने के कारण, करीब 12 बजे उसने एक बार फ़ोन पर मालगुजार से बात की तो मालगुजार ने उससे कहा कि- " ठीक है, मैं जमीन देखने जा रहा हूँ, तुमको कहाँ आना है.... थोडी देर से बताता हूँ."   मुलाजिम चिंटू उर्फ़ अमित ठाकुर जो 17 जून की शाम से मृतक ओंकार के घर पर मौजूद था, ने बताया कि उसका कोई भी काम होता था तो सेठ जी [ मालगुजार ] एक रात पहले या सुबह से फोन करके बता देते थे, कि वह आकर मिल ले या फलां काम कर ले.  लेकिन कल कोई बात ही नहीं हुई.  वह तो दोपहर तक तो अपने घर पर ही था.  वैसे भी उसका मोबाइल फोन आजकल रिचार्ज नहीं हो पाने के कारण बंद पड़ा है. और.......वह शाम को जैसे ही मालगुजार के बारे में सुना तुंरत घर चला आया. DSP ध्यान से इन बातों को सुनते रहे ...बयां लिखने और विडियो रिकॉर्डिंग करने के अलावा भी वो अपनी डायरी में कुछ-कुछ नोट करते जा रहे थे.

जानकारी में आये इन तथ्यों की तत्काल पुष्टि प्राथमिकता में था इसलिए क्रमशः ..... केशरवानी होटल के पास ओंकार प्रसाद के पहुँचने और वहाँ पर किसी से मिलने ....पाटन में ओंकार प्रसाद से व्यक्तिगत एवं कारोबारी रूप से जुड़े सभी लोगों की तसदीक कर ली गई. लेकिन किसी ने भी मालगुजार के पाटन आने, जाने, मिलने या देखने की जानकारी होने की बात में हामी नहीं भरी. DSP ने शांत भाव से इन सभी लोगों के सेल नंबर नोट किए और अपने एक कांस्टेबल रीडर को बुलाकर कुछ नम्बर्स को पृथक से नोट कराने लगे....शायद कॉल डिटेल्स रिपोर्ट [ CDR ] मँगाने के लिए.

अभी विवेचना की कोई एक दिशा तय करना मुमकिन नहीं था...इसलिए पुलिस हत्या के पीछे ....मृतक ओंकार प्रसाद शुक्ला का अपने सगे भाई सनत शुक्ला से चला आ रहा विवाद , अन्य किसी प्रोपर्टी डीलर से छुपा हुआ कोई विवाद , फिरौती के लिए अपहरण-हत्या,  अवैध सम्बन्ध, घरेलु विवाद---में कोई पारिवारिक कलह, संपत्ति सम्बन्धी विवाद, अन्य कोई तात्कालिक कारण या फ़िर सुपारी हत्या, में घटना से जुड़े साक्ष्य ढूंढ़ रही थी. लेकिन इसके साथ भेडाघाट पुलिस DSP के नेतृत्व में कुछ और कोणों पर भी सोच रही थी.


तो पढिये यह जानने के लिए......कि आखिर लाल हवेली के मालगुजार ओंकार प्रसाद शुक्ला के रहस्यमय ह्त्या का सूत्रधार, जिम्मेदार और हत्यारा कौन ???? पुलिस ने विवेचना में आगे क्या किया ....
.........तीसरा या  भाग..3 .कल 2-11-2008 को 

सूचना-  इस लेख में अभियोजन की आवश्यकता हेतु कुछ नाम परिवर्तित कर दिए गए हैं, साथ ही सेल नंबर्स नहीं दिये गये हैं...इस हेतु खेद है. उम्मीद है इस से रचना प्रवाह बाधित नहीं होगी.


Thursday, October 30, 2008

हेलो !!! कौन...! ...भावना दीदी ~~ !!

~~~~~~~~~~~~~~17 जून की सुबह भेड़ाघाट थाने में लम्हेटा गाँव का कोटवार दो तीन व्यक्तियों के साथ आया और मुंशी जी से को लम्हेटा घाट के पास एक लाश मिलने की सूचना देने लगा सुनकर थाने पर मौजूद थाना प्रभारी [ टीआई ] नरेश शर्मा ने उसे अपने कमरे में बुलाया जानकारी ली और सहायक स्टाफ के साथ वहां तत्काल रवाना होते हुए, वरिष्ठ अधिकारियों को फोन पर सूचित करते गए.

~~~~~~~~~~~~~~मौका-ये-वारदात का मुआइना करते हुए टी आई [ SHO] नरेश शर्मा ने अपने अनुभव से यह अंदाज लगा लिया कि नर्मदा नदी के इस कम आवाजाही वाले लम्हेटा घाट के, आश्रम वाले रोड के किनारे पड़ी हुई लाश अधिक पुरानी नहीं है. औंधे मुंह पड़ी हुई लाश का चेहरा जला हुआ था और सर के पीछे से आगे तक गहरे चोट थे..जिससे बहे खून के छींटे आस पास के पत्थरों पर भी दिख रहे थे. थोड़ी देर में DSP [ डीएसपी] भी घटनास्थल पर पहुंचे. घटनास्थल की बारीकी से निरीक्षण और निकटवर्ती क्षेत्र के सर्चिंग करने पर भी लाश के आसपास अपराध से सम्बंधित कोई भी साक्ष्य नहीं मिला था..सिवाय वहाँ मौजूद कुछ भौंचक चेहरे, माचिस की कुछ जली और अधजली तीलियों के.

~~~~~~~~~~~~~~DSP ने धुप के चश्में में आ गए धुल के कणों को साफ़ करते हुए टीआई से कहा- इसकी पहचान होना जरुरी है... ब्लाइंड मर्डर में लाश की शिनाख्तगी हो जाना ही मामले के आधे खुल जाने जैसा होता है. ठीक कहते हैं सर..! टीआई ने इत्मीनान के भाव चेहरे पर लाते हुए जवाब दिया. लाश को बारीकी से देखते हुये पंचनामा टीआई के निर्देशन में तैयार किया जा रहा था...एक अधेड़ उम्र का पुरूष जो करीब 50-55 साल का, गेंहुआ रंग, छरहरा बदन, औसत ऊंचाई..करीब 5.8 फ़ुट, बदन पर सफ़ेद बनियान जो खून और धूल-मिटटी से लाल मटमैले रंग का हो गया था, नीचे मेरून कलर का पेंट जिसमें काले रंग का पुराना सा बेल्ट बंधा था, शर्ट जो ग्रे कलर का था, बटन खुलकर चेहरा जलाने के उपक्रम में ऊपर का हिस्सा जल गया था, पहने हुआ था. अधजले बालों को देखने से स्पष्ट हो रहा था कि उसे मेहंदी से रंगा जाता रहा है..वो नीचे से सफ़ेद और ऊपर लाली लिये हुए अपनी कहानी ख़ुद बयाँ कर रहे थे.

~~~~~~~~~~~~~हालाँकि मौका-ए-वारदात लम्हेटा गाँव से कोई बहुत दूरी पर नहीं था, फ़िर भी यदि आसपास के किसी व्यक्ति की लाश होती तो वहाँ पर आये ग्रामीणों से से कोई न कोई, कुछ न कुछ पहचान का सूत्र दे देता. लाश और मौका-ए-वारदात पर ऐसे कोई निशानात भी नहीं थे, जिससे इस संदेह को बल मिलता कि हत्या कहीं और की जाकर लाश यहाँ डाल दी गई हो.. हाँ..! वहाँ पर किसी गाड़ी के टायर मार्क्स भी नजर नहीं आ रहे थे. जो इस बात को संदेह के घेरे में लाते. पंचायतनामा के साथ-साथ पहचान की कार्यवाही भी जारी रखी गई. जैसे पुलिस ने वहाँ पर अघोषित मुनादी करा दी थी कि जो कोई भी इस लाश के बारे जो कुछ भी जानता है बताने का कष्ट करें. DSP ने अज्ञात व्यक्ति के पंचनामा में विशेष सावधानी बरतने की हिदायत दी. फ़िर कहा -: शर्ट, पेंट, अंडरवियर की और बारीकी से तलाशी ली जाये. तलाशी में शर्ट की जेब से जले हुए कागजों के टुकड़े मिले, वही पेंट की जेब से कुछ सिक्के और करीब 200/- रुपये के करेंसी नोट मिले. पहचान के लिए कोई नाम, टेलीफोन नंबर, मोबाइल हैण्ड सेट नहीं मिल सका. शर्ट का उपरी हिस्से के जल जाने के कारण पेंट का टेलर मार्क [ आजकल निर्माता कंपनी का लेबल ] महत्वपूर्ण हो गया, उसे ध्यान से देखा गया. संयोग से पेंट में किसी स्थानीय निर्माता कंपनी "श्याम ट्रेडर्स" का लेबल लगा हुआ था. इसके बाद शरीर को भी बारीकी से देखने पर टेटू [गोदना] , पुरानी चोट का निशान, टीका, तिल या चेचक के दाग या निशान [ स्कार मार्क्स ] जैसे पहचान के सूत्र नहीं दिखे. सो पंचनामा में इन्हीं बातों का उल्लेख करते हुये, पहले डिस्ट्रिक्ट क्राइम ब्रांच और फ़िर शाम को निकलने वाले सारे अखबार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को जानकारी दी गई...जो शाम को शहर और आसपास की सुर्खी भी बन गई.

~~~~~~~~~~~~~डीएसपी ने टीआई, FSL [ फोरेंसिक साइंस लैब ] के वैज्ञानिक और कुछ वरिष्ठ पुलिस स्टाफ के साथ चर्चा कर कुछ बिन्दु तय किए.

~~~~~~~~~~~~~लाश को पोस्टमार्टम के बाद मेडिकल कॉलेज जबलपुर के वातानुकूलित मरचुरी में शिनाख्तगी तक के लिए सुरक्षित रखा गया. शाम करीब 6.30 बजे टीआई के पास गढा निवासी रमेश पाण्डेय नामक व्यक्ति का फोन आया और उसने लाश के हुलिया के सम्बन्ध में जानकारी लेते हुये, विशेष रूप से उसके पहने पेंट के टेलर मार्क्स के सम्बन्ध में पूछा फ़िर उसे देखने की इच्छा व्यक्त की. थोडी देर में ही रमेश पाण्डेय अन्य लोगों को साथ लेकर जब लाश देखने मरचुरी में आया तो जैसे ही लाश पर से कपड़ा हटाया गया दूर से ही भावना पाण्डेय "....ये तो पापा हैं....!!!.." कहकर चीख पड़ी.

~~~~~~~~~~~~वो लाश जबलपुर के घने बसे रहवासी क्षेत्र गढा में लाल हवेली के मशहूर मालगुजार ओंकार प्रसाद शुक्ला की थी. शिनाख्तगी के बाद ह्त्या का रहस्य और गहराने लगा.....! इसी बीच वहां मौजूद DSP और टीआई तुंरत एक कोने में जाकर गुफ्तगू करने लगे.....~~~~~!!!

शेष.पढिये....... भाग- 2 में ....शीघ्र ही.

Thursday, October 23, 2008

ब्रेन मेपिंग और नार्को टेस्ट....!!!

.............................देश के अग्रणी मानसिक स्वास्थ्य संस्थान "नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस" के निदेशक की अगुआई में बनी विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की छः सदस्यीय कमेटी ने ब्रेन मेपिंग के सन्दर्भ में अपने जिन निष्कर्षों का खुलासा किया है, वह काफी अहमियत रखते हैं......आइये देखते आज के समय में सर्वाधिक चर्चित टेस्ट की हकीक़त और फ़साना क्या है..!!!..............................उपरोक्त कमेटी में देश के अन्य अग्रणी संस्थानों के बिहेविरियल एंड कोगनिटिव साइंस, साइको फार्माकोलाजी, साइकिआत्री, फोरेंसिक साइंस जैसे अहम् विषयों के जानकार शामिल थे, जिन्होंने ब्रेन मेपिंग के बारे में अपने अध्ययन को अंजाम दिया. सभी जानते हैं कि आपराधिक घटनाओं में या आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्तता की पड़ताल करने के लिए इन दिनों नार्को परीक्षण के साथ-साथ ब्रेन मेपिंग परीक्षण का बोलबाला भी बढ़ा है. ब्रेन मेपिंग में अभियुक्त को कंप्यूटर से जुडा एक हेलमेट पहनाया जाता है. जिसमें कई सेंसर और इलेक्ट्रोनिक उपकरण लगे होते हैं. फ़िर जाँच अधिकारी एवम फोरेंसिक विशेषज्ञ की मौजूदगी में उसे अपराध से जुड़ी तस्वीरें दिखाई जाती है. इसे देखकर अभियुक्त के दिमाग में उठी हलचलों की इलेक्ट्रिकल फिजिओलाजिकल गतिविधियों का विश्लेषण किया जाता है. अपराध विज्ञान में उपकरण के तौर पर काम करने के लिए एक ऐसी प्रक्रिया की जरुरत होती है जिसमें ग़लत होने की संभावना समाहित हो. बंगलौर और गांधीनगर आदि स्थानों पर जहाँ यह परीक्षण किया जाता है, क्या वहाँ इस कारक को मद्देनजर रखा गया है ?
................................वैसे सिर्फ़ ब्रेन मेपिंग नहीं अपितु नार्को टेस्ट की वैज्ञानिकता पर भी बहुत पहले सवाल खड़े किए जा चुके है. यह जानना भी दिलचस्प है कि अपने यहाँ भले ही नार्को टेस्ट लोगों को नया नजर आता हो, विकसित देशों में तो वह वर्ष 1922 में मुख्यधारा का हिस्सा बना था जब राबर्ट हाउस नामक टेक्सास के डॉक्टर ने स्कोपोलामिन नामक ड्रग का दो कैदियों पर प्रयोग किया था. दरअसल नार्को एनालिसिस टेस्ट एक फोरेंसिक टेस्ट है, जिसे टेस्ट जाँच अधिकारी, मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर और फोरेंसिक एक्सपर्ट की मौजूदगी में अंजाम दिया जाता है. इसमे संदिग्ध व्यक्ति को सोडियम पेंताथेल नामक केमिकल का इंजेक्शन दिया जाता है. जिससे न केवल वह अर्ध बेहोशी की हालत में चला जाता है बल्कि उसकी तर्क बुद्धि / रिजिनिंग भी ख़तम हो जाती है. और फ़िर उससे सवाल पूछ कर जानकारी उगलवाई जाती है. वह व्यक्ति जो एक तरह से सम्मोहन अवस्था में चला जाता है वह अपनी तरफ़ से ज्यादा कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होता बल्कि पूछे गए कुछ सवालों के बारे में कुछ बता सकता है. जो लोग यह मानते है कि नार्को टेस्ट में व्यक्ति हमेशा सच ही उगलता है, दरअसल उस अवस्था में भी वह झूठ बोल सकता है, विशेषज्ञों को भरमा सकता है.
................................जहाँ विकसित दुनिया के बाकी हिस्सों ने ऐसे टेस्ट को इन्वेस्टीगेशन से मुख्य रूप से पृथक कर दिया हो, ज्यादातर डेमोक्रेट दुनिया जिनमे अमेरिका और ब्रिटेन भी शामिल हैं, वहाँ ऐसे टेस्ट कुछ समय से लुप्त प्राय जैसे हैं जबकि हमारे देश में ऐसे टेस्ट की लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है. किसी अपराध के संदिग्ध को पकड़ते ही लोग उसके नार्को टेस्ट की मांग करने लगते हैं कि इनका अगर नार्को टेस्ट हो जाए तो सच्चाई उगल ही देंगे. संविधान का एक अहम् तत्त्व है article - 20[3] जो कहता है कि "किसी व्यक्ति को जिस पर कोई आरोप लगे हैं, उसे अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा." अगर नार्को टेस्ट की बुनियादी अंतर्वस्तु को समझाने की कोशिश करेंगे तो इसके जरिये व्यक्ति को एक तरह से अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की संभावना रहती है. लेकिन विगत कुछ निर्णयों में माननीय न्यायालयों के द्वारा टेस्ट के पक्ष में मत दिया गया है.

.................................इसमें कोई दो राय नहीं कि नार्को टेस्ट में कोई व्यक्ति कुछ भी प्रलाप करे या कबूल करे. अपराध को साबित करने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता होती ही है . टेस्ट से प्राप्त जानकारी को विवेचना में अन्य सूत्रों से कोरोबोरेट करने और सुसंगत बनाने के लिए उपयोग किया जाता रहा है. अभियुक्त को दवा पिलाकर उससे जानकारी लेने की इस कोशिश को चेन्नई एवम मुंबई हाईकोर्ट ने "यातना के श्रेणी" में रखने से मना किया और ऐसा तर्क दिया कि अभियुक्त को भले ही उसकी इच्छा के विरुद्ध प्रयोगशाला में ले जाया जाए, लेकिन टेस्ट के दौरान वह जो बात प्रगट करे, वे स्वैच्छिक हो सकती है. .................................वर्ष 2000 में तत्कालीन सरकार की सदारत में आपराधिक न्याय प्रणाली को सुधारने के लिए जो मलिमथ कमेटी बनी थी उसके जरिये कानून में सकारात्मक परिवर्तन की यही कोशिश हम देख सकते है. दरअसल नार्को टेस्ट को लेकर अमेरिकी गुप्तचर एजेन्सी सीआईए, जिसने शीत युद्ध के दौर में इसे आजमाकर सच उगलवाने की खूब कोशिश की थी, के अनुभव बहुत उत्साहजनक नहीं थे. उपरोक्त कमेटी ने भी अपने अध्ययन में इन नार्को टेस्ट को लेकर अवैज्ञानिक और सबूतों के तौर पर इस्तेमाल पर रोक लगाने की अनुसंशा की है. अतएव मामला अब कानून निर्माता सरकार, इन्वेस्टीगेशन एजेन्सी और न्यायालय के बीच है.....कि इस चर्चित अपराध अनुसंधान परीक्षण को किस रूप में उपयोगी बनाये रखा जाये.

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Monday, October 20, 2008

डीएनए टेस्ट का राज [भाग - दो]


पिछले अंक में.....
जहाँ से आगे जाने पर भौंचक कर देने वाली बात सामने आने वाली है. क्या था राजू के गायब होने का राज ??, क्या भूरा भी गायब था ? या फरार ?? या फ़िर जिन्दा ही नहीं..??? भूरा ने क्या कहा अपने , राजू , प्रताप और तथाकथित प्रेयसी समलिया के बारे में. समलिया ने अभी तक क्या छुपाया था !! और क्या सही बताया था !!! क्या पुलिस विवेचना के अनसुलझे रहस्य से परदा हटाने के कगार पर थी या अभी तक रहस्य के बियाबान में ही विचरण कर रही थी. अब आगे ..

..........................कचनारी निवासी समलिया अपने ही पड़ोस में रहने वाले भूरा सिंह से पिछले तीन वर्षों से प्यार करती रही है. बालिग होने के बाद उसने अपनी और भूरा की शादी का प्रस्ताव पिता रूपसिंह के समक्ष रखा लेकिन उन्होंने गोत्र का मिलान न होने का बहाना करते हुए उसे खारिज कर दिया. समलिया ने यह बात भूरा सिंह से बताई तो उसने कहीं अन्यत्र जाकर शादी कर लेने की बात कही. पर समलिया का परिवार गाँव का प्रतिष्ठित परिवार होने और समलिया के छोटी बहिन और भाई की अभी शादी नहीं होने के कारण समलिया ने इंकार कर दिया.

............................समलिया और भूरा इस सब के बाद भी एक होने के लिए सोचने लगे और बहुत विचार करने के बाद एक संगीन योजना पर पहुंचे. योजना के अनुसार समलिया परिवार की सहमति से विवाह के लिए तैयार हो गई. और अब केवल शादी का इंतजार हो रहा था. कुछ माह बाद समलिया की शादी उचेहरा गाँव के राजू से हो गई और राजू उसे ब्याह कर ले गया. समलिया ससुराल पहुँची और उसने अपने सुहाग के साथ सपने संजोने के बजाय योजना के अमल की राह देखना शुरू कर दी. वह ससुराल में एकदम सामान्य थी, जो भी मांगलिक परम्पराएँ और औपचारिकताएं पूरी हो रही थीं, वह उसमें एक नव विवाहिता के रूप में सहर्ष सम्मिलित थी.

............................योजना की पहली कड़ी शुरू हुई 15 मई को, प्रताप के पहुँचने के साथ. भूरा ने अपनी योजना में प्रताप को भी साथ लिया था. मूलतः डिंडोरी जिले के शहपुरा थाना अंतर्गत स्थित ददर गाँव निवासी प्रताप सिंह के नाना-नानी कचनारी में रहते हैं और यहाँ आते-जाते उसकी दोस्ती भूरा से हो गई थी. प्रताप योजना के अनुसार समलिया के ससुराल कचनारी पहुँचा और वहाँ से लौटते हुए राजू को भी साथ ले लिया. दोनों कुंडम पहुंचकर एक होटल में चाय-नाश्ता किए फ़िर प्रताप ने राजू से अपने घर चलने का आग्रह किया. पहले तो राजू ने मना किया लेकिन प्रताप की बनावटी प्यार भरी जिद के कारण वह तैयार हो गया.

............................एक साइकिल पर सवार होकर दोनों कुंडम से गजरा टोला जाने वाले मार्ग पर स्थित सुपावारा तिराहा पहुंचे थे कि वहां भूरा खड़ा दिखाई दे गया. भूरा ने आवाज लगाई तो प्रताप ने साइकिल रोकी और भूरा का परिचय राजू से दोस्त के रूप में कराया. फ़िर तीनों एक ही साइकिल पर सवार होकर आगे चल पड़े. साइकिल को भूरा चलने लगा, राजू को आगे और प्रताप को पीछे बिठा लिया. साइकिल चलती गई और जैसे ही ग्राम सकरी के काराघाट के समीप पहुँची थी, तभी भूरा ने राजू के गले में एक फंदा [ accilarator वाइर का फंदा बनाया गया था ] डाल दिया. फंदा डालते ही राजू का गला दब गया और उसके छटपटाने से तीनो साइकिल सहित नीचे गिर गए. इसके बाद योजना के अनुसार भूरा और प्रताप ने राजू को संभलने का कोई मौका दिए बिना उसका गला घोंट दिया और वहीं मेड़ पर एक गड्ढा खोद कर उसे दफ़न कर दिया. इस समय रात के करीब 8 बज चुके थे. भूरा अपने योजना और मकसद की पहली किश्त में कामयाब हो गया था..और इसके बाद दोनों अलग-अलग अपने गाँव के लिए रवाना हो गए.

...........................पुलिस की हिरासत में आने के बाद भूरा सिंह, प्रताप सिंह और समलिया ने जिस तरह गुमराह करने की कोशिश की थी, इसलिए पुलिस ने उनके बताये तथ्यों की पुष्टि के लिए उस स्थान को भूरा और प्रताप की निशादेही पर उनसे ही खुदवाया. वहां से बरामद मानव हड्डियों, जो कि कथित रूप से राजू की थीं, को विज्ञान के सर्वाधिक विश्वसनीय परीक्षणों में से एक से सुनिश्चित करने के लिए जबलपुर जिले में पहली बार डीएनए परीक्षण कराने हेतु राजू की बहन रुकमणि का खून का नमूना [ सैम्पल ] लेकर CFSL हैदराबाद के CDFD UNIT को भेजा .जहाँ से प्राप्त रपट मानव हड्डी होना, उसके अस्थि मज्जा एवम दांतों के डीएनए की प्रोफाइलिंग रुकमणि के खून के प्रोफालिंग से एक ही रक्त जीन के वाहक होने के पुष्टि ने, जबलपुर पुलिस के सीने में सफलता का एक तमगा और जड़ दिया. तीनो आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध अभियोग पत्र न्यायलय में प्रस्तुत किया जा चुका है.


क्या है डीएनए टेस्ट....!
" जबलपुर जिले में यह पहला केस है, जिसमे अपराध की विवेचना में डीएनए [ डी आक्सी राइबो नुक्लिक असिड ] टेस्ट का सहारा लिया गया. पुलिस ने आरोपियों के निशादेही पर मौका ए वारदात से जप्त की गई मृतक राजू की हड्डियों की डीएनए प्रोफाइलिंग टेस्ट के लिए सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के अधीन CDFD हैदराबाद भेजा गया. पुलिस ने इसकी सैम्पल मेचिंग के लिए मृतक राजू की सगी बहन रुक्मणि के खून का नमूना लिया, जो हैदराबाद भेजा गया था. उच्च स्तर के तकनीक परिक्षण से गुजर कर जब डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट पाजिटिव आई तो जबलपुर पुलिस ने अपनी कार्यक्षमता के विस्तृत श्रंखला में सफलता की एक और कड़ी जोड़ ली. "

इस केस के अलहदा होने के कई कारण थे जिनमे प्रमुख रूप से ........

@. दुल्हन का विवाह के तत्काल बाद अपनी महत्वाकाँक्षा को अमलीजामा पहनाने की सोच. नई नवेली दुल्हन के रूप में अपनी पारंपरिक भूमिका को अद्भुत नाटकीय रूप में सहजता से निभाना.
@. प्रताप का चचेरे भाई के रूप में आना और सहजता से अपनी मूल पहचान छुपाते हुए दुल्हे को गाँव से बाहर निकाल ले जाना.
@. दुल्हन के द्वारा नाटकीय रूप से प्रताप को चचेरे भाई के रूप में नए ससुराल में स्वीकार करा लेना और पति का विश्वास भी हासिल कर लेना.
@. पुलिस को घटना के बाद की पूछताछ में समलिया द्वारा स्वयं को पीड़ित साबित करते हुए अधिकतम समय तक गुमराह करते रहना..इसके लिए उसने न केवल नव विवाहिता होने अपितु कई बार महिला होने को कवच के रूप में इस्तेमाल किया.
@. प्राथमिक विवेचना का कीमती समय और साक्ष्य को अपने मायके और आरोपियों के गाँव से पुलिस को दूर रखकर नष्ट करने की योजना में भी समलिया और प्रताप, भूरा सफल रहे थे.
@. मूल घटना स्थल पर पहुँचने से पहले न जाने कितने ठिकाने और कितने गड्ढे पुलिस को सर्च करने पड़े जो आरोपियों के शातिराना मिजाज का सबूत था.
@. मूल घटना स्थल पर पहुँचने के बाद भी जो साक्ष्य मिल रहे थे, उसके सम्बन्ध में भी पर्याप्त संदेह पैदा कर देना कि आखिर यह भी सत्य है अथवा नहीं. इसके लिए पुलिस ने ख़ुद को दूर रखकर आरोपियों से ही स्थान विशेष की खुदाई करवाई .उसका फोटोग्राफ एवम videograpy भी करायी. ताकि साक्ष्य के रूप में इस पूरी प्रक्रिया को न्यायालय के समक्ष लाया जा सके.

Saturday, October 18, 2008

डीएनए टेस्ट का राज ? [भाग - एक]


" यूँ तो बाबुल का घर छोड़ पिया के घर जाने वाली हर लड़की के ढेरों सपने होते हैं. और डोली में बैठते ही वह इन्हें साकार करने का ताना-बाना बुनने लगती है. पर समलिया इन लड़कियों से एकदम अलग निकली, उसने तो डोली में बैठते ही अपने सपने को साकार करने का नया ही तरीका अख़तियार करने का संकल्प ले लिया...!!!! "

डीएनए प्रोफाइलिंग विज्ञान के उन सबसे विश्वसनीय परीक्षणों में है, जिसकी सत्यता अरबों में एक त्रुटि ही होने की संभावना के कारण न्यायालय द्वारा विशेषज्ञ अभिमत के रूप में निर्विवाद स्वीकार किया जाता है. इसके लिए सेम्पलिंग, नमूना संरक्षण और परीक्षण कराना विवेचना एजेन्सी की कार्यदक्षता को पहले ही कड़े कसौटी से गुजारा जाना होता है.

..........................17 मई की सुबह कुंडम के उचेहरा गाँव निवासी कुशराम परिवार के लिए बड़ी ही परेशानी भरी थी. परिवार का इकलौता नौजवान और नव विवाहित युवक राजू बीते रोज से ही गायब हो गया था. आपसी रिश्तेदारों व अन्य परिवार वालों ने काफी पतासाजी की लेकिन उन्हें कहीं कोई सफलता हाथ नहीं लगी थी. परेशान होकर कुशराम परिवार के मुखिया फूलसिंह कुशराम तथा उसके छोटे भाई दलसिंह कुशराम ने कुंडम पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करायी. रिपोर्ट में फूलसिंह कुशराम ने कुंडम थाना प्रभारी [SHO] को बताया कि उसके पुत्र राजू सिंह कुशराम का विवाह 14 मई को मझगवां थाना के कचनारी गाँव के 19 वर्षीया समलिया के साथ हुआ था. शादी के दूसरे दिन 15 मई राजू के परिवार में सब कुछ सामान्य से हटकर था. चौतरफा खुशियों का दौर चल रहा था. गाँव के परिवेश में जैसा होता है, उससे कहीं बढ़-चढ़कर कुशराम परिवार में हो रहा था. शाम के वक्त एक अजनबी युवक वहाँ आया जिसने अपने आप को नई नवेली दुल्हन समलिया का चचेरा भाई प्रताप सिंह बताया. राजू के परिवार जनों ने उसे बैठाया, शादी वाले घर में सबके बीच समय गुजरते जैसे देर ही नहीं लगती, बातों ही बातों में रात हो गई और फ़िर भोजन का दौर शुरू हो गया. भोजन के बाद प्रताप वापस अपने गाँव जाने की कहने लगा लेकिन घरवालों के रात रुक जाने का अनुनय करने पर प्रताप ने चार पहर वहीं बिताया. दूसरे दिन यानि 16 मई को दोपहर बाद प्रताप को छोड़ने राजू भी साथ निकला था और तब से वह वापिस नहीं लौटा.


..........................पुलिस थाने में इस शिकायत को गुम इन्सान रजिस्टर में दर्ज कर समूचे जिले की पुलिस को वाइरलेस सेट से तत्काल सूचना दे दी गई. राजू का कहीं कोई पता नहीं चला, किसी थाने से कोई राहत की ख़बर न मिली. पुलिस ने पहले तो इसे एक सामान्य अनुक्रम की घटना मानकर तफ़्तीश शुरू की, जैसा कि अमूमन इस तरह कहीं अचानक काम आ जाने से चले जाने और रुकने वाले लोग दूसरे-तीसरे दिन वापस घर आ जाते है. लेकिन जब लगातार पाँच दिन तक उसका कोई पता नहीं चला तो पुलिस और राजू के परिजनों की चिंता बढ़ती चली गई. उप पुलिस अधीक्षक ने मामले की अपने स्तर पर समीक्षा की और केस में अभी तक के जाँच में आये तथ्यों को बारीकी से जोड़ना शुरू किया. केस के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र और व्यक्ति की भूमिका संदेह से परे नजर नहीं आती देख उन पर ही विवेचना को केंद्रित कर, मुखबिर भी पतासाजी के लिए लगा दिये गये. अलग टास्क देकर पुलिस की दो टीम बना दी गई. एक टीम राजू के परिजनों, दोस्तों और नई नवेली दुल्हन समलिया से पूछताछ में लग गई तो दूसरी टीम का ध्यान राजू के चचेरे साले प्रताप जो कि घटना क्रम का अन्तिम साक्षी था, पर केंद्रित था.


............................प्रताप के बारे में पता करने के लिए पुलिस टीम जब मझगवां थाने के गाँव कचनारी पहुँचा तो वहाँ बताया गया कि इस नाम का कोई व्यक्ति उस गाँव और आस पास है ही नहीं. प्रताप द्वारा अपना पता ग़लत बताये जाने को लेकर पुलिस के शक की सुई घुमने लगी. पुलिस ने समलिया से आकर उसके बारे में पूछताछ की, पर समलिया से भी प्रताप के बारे में कोई महत्वपूर्ण जानकारी हासिल नहीं हो सकी. DSP के निर्देशन में काम कर रही टीम ने अपना दायरा उचेहरा गाँव से लगे हुए आसपास के क्षेत्रों तक बढ़ा लिया और राजू, समलिया, प्रताप के जीवन चर्या का खाका खींचा जाने लगा. दूसरी टीम को ख़बर मिली कि कुछ लोगों ने राजू को एक नहीं दो आदमियों के साथ देखा था और दोनों आदमी बाहरी लग रहे थे. तीनो एक ही साइकिल पर सवार इत्मीनान से बातचीत करते ददर गाँव डिंडोरी रोड की तरफ़ जा रहे थे. पुलिस की पड़ताल में रोज एक नई जानकारी, तो कई शिगुफ़े जुड़ने लगे. इन्हें जरुरत के मुताबिक छंटाई की जाती रही.

...........................इसी बीच चरित्र सत्यापन में लगी टीम ने DSP को चौकाने वाली जानकारी दी कि दुल्हनिया समलिया का किसी भूरा नाम के लड़के के साथ लगाव होने की बात गाँव के लोग दबी छुपी कह रहे हैं. यह बात मुखबिरों ने तस्दीक भी कर दी. कहानी में आये नये पात्र को बिना देरी किए पुलिस ने पूछताछ के लिए बुला लिया, लेकिन इस कदम से पुलिस को भी यकीन नहीं था कि वह अब इस मामलें के उस छोर पर पहुँच गई. जहाँ से आगे जाने पर भौंचक कर देने वाली बात सामने आने वाली है.
क्या था राजू के गायब होने का राज ??, क्या प्रताप भी गायब था ? या फरार ?? या फ़िर जिन्दा ही नहीं..??? भूरा ने क्या कहा अपने , राजू , प्रताप और तथाकथित प्रेयसी समलिया के बारे में. समलिया ने अभी तक क्या छुपाया था !! और क्या सही बताया था !!! क्या पुलिस विवेचना के अनसुलझे रहस्य से परदा हटाने के कगार पर थी या अभी तक रहस्य के बियाबान में ही विचरण कर रही थी.
शेष "विवेचना लेख" पढ़ें आगामी अंक भाग - दो में.