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Wednesday, August 10, 2011

हमें आज़ाद होने का अभी, मतलब नहीं आता





मेरे प्रिय ग़जलकार प्रमोद रामावत "प्रमोद" स्वाधीनता सन्दर्भ 
को लेकर क्या रचते हैं.. क्या ग़जब तेवर हैं आप भी देखिये तो सही... 

गुलामी में जो जज्बा था, नज़र वो अब नहीं आता 
हमें आज़ाद होने का अभी, मतलब नहीं आता 

गुलामों की तरह ही जी रहे हैं, लोग लानत है 
शहादत के लिए चाहें तो अवसर कब नहीं आता 

हम ही हाक़िम, हम ही मुंसिफ़ हम हैं चोर-डाकू भी 
करें हम ख़ुदकुशी तो फ़िर बचाने रब नहीं आता 

लड़ाने के लिए तो बीच में मज़हब ही आता है 
छुड़ाने को पुलिस आती है, तब मज़हब नहीं आता 

हमारी जातियाँ दीवार बन जाती है रिश्तों में 
मगर ज़ब खून चढ़ता है, ये मुद्दा तब नहीं आता 

Monday, March 28, 2011

आपके सब पुण्य चेहरे पर उभर कर आ गए

अब पुरानी शेखियां सब छोडिये सरपंच जी 
आदमी के गम से रिश्ता जोडीये सरपंच जी 
    
आपके बोये बबूलों की फसल तैयार है 
      दूसरों के आम तो मत तोडिये सरपंच जी 

  मानते है तुम तो कन्हैया हो तुम्हारे गाँव के 
आबरू की मटकियाँ मत फोडीये सरपंच जी 

           वह तो यूँ ही गिन रहा था आपके कुर्ते पे दाग़ 
         आप उसका हाथ तो मत मोड़िये सरपंच जी 

     हर किरण पीछा करेगी कल सुबह से आपका 
  रात भर जी चाहे जितना दौडिए सरपंच जी 

           आपके सब पुण्य चेहरे पर उभर कर आ गए 
      चाहे जैसी राम-नामी ओढीये सरपंच जी   

        
          ---------०००००००-----------

                                                                -२-

                                    आपकी हर योजना है निर्दोष भीलो के लिए 
                                    बाज को अधिकृत किया है अबाबीलों के लिए 

                                              ये बहुत मासूम हैं तो आप भी हैं न्यायप्रिय 
                                              क्यों कबूतर पालते हैं धूर्त चीलों के लिए 

                                    कोई संधि हो नहीं सकती हमारे बीच में 
                                    अपना सीना है तुम्हारी सख्त कीलों के लिए 

                                              उनका आना जिंदगी में क्या कहूं कैसा रहा 
                                              जैसे एक हंस का जोड़ा शांत झीलों के लिए 

                                    तुम लिए गंगा कलश  हो और यह तृष्णा अछूत 
                                    प्यास का लंबा सफ़र है इन सबीलों के लिए 

                                                          शायर - प्रमोद रामावत "प्रमोद" 

Thursday, March 17, 2011

कद नहीं बढ़ता कभी परछाईयों के साथ



बढ़ गयी शोहरत मेरी, रुसवाइयों के साथ |
कद नहीं बढ़ता कभी, परछाईयों के साथ ||

लोग सुनते हैं मगर दिखता नहीं सबको 
अश्क़ शामिल हैं मेरे शहनाइयों के साथ 

ये नहीं उजड़ी फ़कत मैं भी तो उजड़ा हूँ 
एक रिश्ता है मेरा अमराइयों के साथ 

महफ़िलों में आपको ज़िल्लत उठानी है 
मैं तो जी लूँगा मेरी तनहाइयों के साथ 

मैं अजन्ता की रवायत देख लूं फिर से 
एक दिन आ जाइये अंगडाईयों के साथ 

प्रमोद रामावत "प्रमोद"

Wednesday, February 23, 2011

एक शातिर मुल्क़ भर का सब मुनाफ़ा खा गया

प्रमोद रामावत "प्रमोद"
परिचय.......
जन्म- 5 मई 1949     शिक्षा- विधि स्नातक  
सम्प्रति- उप सम्पादक "अमृत मंथन दैनिक", जन संपर्क अधिकारी
प्रकाशन- मेरी अधूरी अमरनाथ यात्रा[ यात्रा वृत्तांत ], सोने का पिंजरा [ गजल संग्रह ] 
संपर्क- 09424097155 
प्रमोद रामावत जी की "सोने का पिंजरा" ग़जल विधा पर अद्भुत संग्रह है. एक-एक शेर इतना पुरअसर लिये है कि बस लगता है इससे बेहतर क्या. कोई ऐसा मुद्दा नहीं जो प्रमोद जी ने अपने अनूठे अंदाज में छुआ न हो. उसी नायाब ख़जाने से एक ग़जल प्रस्तुत है. 




बस्तियां जिनमें अमीरों को ख़ुदा समझा गया 
क्यों ग़रीबों को वहाँ, एक बददुआ समझा गया |

आबरू के मोल पर जो बांटता था रोटियाँ 
बस वही भूखे शहर में, देवता समझा गया |

सब उसूलों को कुचलकर कुर्सियों तक जो गया 
इस सदी में बस उसी को, रास्ता समझा गया |

छोड़ कर सिक्के सुनहरे मैं बचा लाया ज़मीर 
लो मुझे अपने ही घर में सरफ़िरा समझा गया |

एक शातिर मुल्क़ भर का सब मुनाफ़ा खा गया 
क्या ग़जब है बस इसे इक हादसा समझा गया |

बह गई आसाईशें सब जन्मदर की बाढ़ में 
और इन पैदाइशों को ख़ुशनुमा समझा गया |

आदमी की ज़िन्दगी है , दर्द में डूबी ग़जल 
आसुओं को इस ग़जल का काफ़िया समझा गया |