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Tuesday, November 11, 2008

फ़िर तुम आयी नहीं....

हीं रहते हो.......!....हूँ..,  मैं सोचती थी कोई हॉस्टल जैसा होगा.  यहाँ क्या अकेले...?   नहीं......गाँव से भाई साथ में है...... खाना बना देता है... और मैं बस खूब एक्सरसाईज और स्टडी...तुम्हारी याद से फुर्सत मिलते ही.....जल्दी से अधूरा सा लग रहा वाक्य पूरा किया....   हूँ...!  वो तो दिखता है.... ऊपर से नीचे तक देखने की मुद्रा बनाते हुये बोली.  लाओ गाड़ी मैं किनारे पार्क कर दूँ.   यहाँ से बड़ी गाड़ी निकलने पर दिक्कत होती है.   हाँ.......सलिल,  दिक्कत तो हो रही है .........  क्या कहा...?   कुछ नहीं.....!  ये गुलमोहर कैसे सूख रहे हैं..... फ़िर उत्तर सुने बिना बुदबुदाती हुई .... और भी बहुत कुछ सूख रहा है...!!!  ..बस यूँ ही नंदू ने पानी नहीं दिया होगा.  तुम्हारी फेवरिट..... ब्लेक टी बनाऊं   ..... पहली बार घर आयी हो.... पानी का गिलास सामने रख कर खड़ा हो गया.  कुछ नहीं, तुम बस यहाँ पास बैठो...... लो, बैठ गया. ....अरे ये क्या...!!!  पैरों के पास क्यों...??   हाँ सखी, .......कभी कभी ......तुम्हारी खुशबू से साँस भर जी लेने का मन करता है.... वो तो यहीं कहीं से गुजरती है.... साथ बैठता हूँ.... तो पता नहीं खो जाता हूँ.... यहीं रहने दो ना.... जीने दो ना......!   हूँ...... आज हम आखिरी बार मिल रहे हैं....... इसके बाद एक्जाम्स फ़िर पता नहीं क्या...?  जिंदगी और कैरियर के लिए कुछ सोच ही न सकी...... तुम एक झोंके की तरह आये..... सब कुछ उड़ता गया.... कहाँ से समेटना शुरू करूँ...... सोचती हूँ आज ही कुछ......चलूँ.. !  हूँ..  थोडी देर रुको ..... तुम्हारे काँधे पर सर रख लूँ......!......हूँ...!  तुम नहीं होगी तो तुम्हारे इस कंधे का भुलावा तो रहेगा...... आँसू....झर रहे आँखों को पोंछने को सही.  अच्छा तो अब चलूँ........सलिल.! ......उसकी आँखों में अभी से आँसू थे.  बाहर निकले तो देखा...... बड़ी गाड़ी से रास्ता जाम हो गया था.


................समीर यादव