Sunday, March 8, 2015












गुरुत्वाकर्षण- आकर्षण-शारीरिक विवशता
(दम लगा के हईशा)
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सिनेमा एक गज़ब की विधा है, अपनी बात कहने के सबसे प्रभावी माध्यमों में से एक. दर्शक के सभी इन्द्रियों को गूंथकर धीमी आंच में दिल-दिमाग को सेंक लेने वाली. मुकेश, मोहिंदर-हरेन्द्र भाई ने सब कह दिया, वैसे अब कुछ शेष रहा नहीं. मगर उसी "शाखा" में दिए वचन निभाने के लिए मेरा लिखना कदाचित आवश्यक है.

मध्य वर्ग के लिए जहाँ टिकिट से कई गुना भारी पॉपकॉर्न और समोसे के रेट पड़ते हों और कॉफ़ी का बड़ा कागजी कप मेरे जैसे प्राणी के लिए दो तीन के हिसाब का हो, वहाँ मुकेश-हरेन्द्र भाई की स्पॉन्सरशिप में मोहिंदर भाई का कॉफ़ी में हिस्सेदारी कर लेना, जाहिर है मेरे लिए फिल्म के मजे को कुछ स्टार बढाने जैसा है.
अपनी ख्वाहिशों को मसोसकर, कर्ज लेकर उपभोग किये जा रहे उपकरणों के मद्देनज़र मध्यवर्ग का दायरा भले ही बढ़ा लिया गया हो मगर भारत का असल और मूल मध्यवर्ग यही है जो जीवन में हर दिन करता है "दम के लगा के हईशा..."
कहानी तो आप जान ही चुके हैं. उस वय, और इस वर्ग की चिर चाहत से अलग मोटी युवती के किरदार में "भूमि पेंदनेकर" अपने भारतीय नाक-नक्श और सहज अभिनय से हीरो "आयुष्मान खुराना" को दम लगाने में सच में बेलेंस करती है. संजय मिश्रा [नायक के पिता की भूमिका में] और अन्य पात्र बोनस की तरह हैं जो जब स्क्रीन पर आते हैं दर्शकों को कुछ न कुछ दे जाते हैं.
निर्देशक की बुनाई में कहानी, स्क्रीन प्ले, पात्रों की कास्टिंग, देशकाल सब अपने ठिकाने पर हैं, उसी में खुबसूरत टिपकियों की तरह संवाद को भी बुना गया है. आजकल फिल्मों में सप्रयास शहर को एक पात्र की भूमिका निर्वाह कराया जा रहा है, जिसे निर्माता आदित्य चोपड़ा और निर्देशक/सिनेमेटोग्राफर " शरद कटारिया की टीम ने बखूबी निभाया है.
गीत-संगीत फिल्म के लय में हैं. हाँ पात्रों की भाषा के मसले पर हरेन्द्र भाई से सहमत.
और ख़ास बात ..... पूरी फिल्म देखते हुए एक बात यह कौंधती रही कि "शाखा" परिवार अब तक इसका "संज्ञान" क्यों नहीं ले सकी कि उसके "क्रांतिवीर" यहाँ वन्देमातरम के इतर मद्यपान, मुख अतिचार करते दिखाए गए हैं. खैर.... हईशा को दम भी तो उनके चर्चित ब्रह्मचर्य "शाखाई व्यायाम" से ही प्राप्य होना जो दर्शाया गया है. 

फिल्म देखना हो तो पति-पत्नी अनिवार्य और जो संयुक्त परिवार के साथ है, वे सभी जिम्मेदार सदस्यों के साथ देखें. रिश्तों के सारे मंज़र चुपचाप देखने के बजाय.....

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समीर

बातचीत में मौसम के आने के पहले

बिना शीर्षक
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अरे अरे संभालो उसे...
तुम भी न, ज़रा भी ध्यान नहीं रखती. अभी टूट जाता फिर यूँ ही नंगे पाँव.......! माउन्ट आबू के शेल्टर इन होटल के आधुनिक लिफ्ट से बाहर आते हुए लगभग चीख ही उठा था वो. फिर निकल आये दोनों.
हूँ ! पिछली सर्दी में महाबलेश्वर जाते हुए पंचगनी से लिया था. याद है तुम्हें, कितनी ऊँची नीची, फिसलन भरी राहों में साथ रहा, बच गया, शायद अब इजाज़त मांग रहा. मुस्करायी वो बहुत देर बाद.
वह जहाँ है उसे यही करना भी है... “चप्पल कहीं का” हँसी को पॉज किया उसने.
जब हम खुश होते है तो किसी बात पर यूँ ही फ़िलासफ़ी झाड़ लेते हैं. कहते हुए उसने भी मुस्कराहट को पॉज कर दिया.
हाँ, यही मैं भी सोच रहा था. वैसे ही जैसे किसी से जब अनमने बात करनी हो तो थोड़ी देर में मौसम का हाल पूछना ही रह जाता है.
“ऐसा कितनी बार हुआ हमारे बीच”... अनायास पूछ ली वो.
इतनी बातें होटल के लम्बे कॉरिडोर में रूम नंबर पढ़ते पढ़ते हो रही थी.
“शायद कभी नहीं, तुमसे जब मिला, जैसे मिला पूरी तरह डूबकर”. रूम अटेंडेंट के जाने के कुछ देर बाद डोर नॉब पर उँगलियाँ फिराते हुए कहा उसने.
“अच्छा बताओ आज रात बर्फ गिरेगी....” बहुत देर से बदन सीधा करने की इच्छा होने के बावजूद बिस्तर पर पसरने के बजाय वह सोफे पर रखे कुशन को दोनों हाथों से भींचें खिड़की पर आ गयी.
क्या ??  हँस दिया उसने अबकी बार.
उसके पास भी हँसी थी सो उसने भी हँस दिया.
वो लोग क्यों कह रहे थे कि माउंट पर रातें सुनसान सी हो जाती हैं. रात के ग्यारह बज रहे हैं, लगता तो नहीं. वापस सोफे पर आकर बैठ गयी.
तुम भी न !! न्यू ईयर पर आई हो, रात भर जश्न होगा. साथ में लाये बेग से कुछ जरुरी सामान निकालते हुए वह झुका रहा.
अच्छा बताओ ! मैं न कहती, तो तुम शायद यहाँ फिर न आते.
सोचना पड़ेगा...!
सोचना पड़ेगा ...... क्यों ? अरे 400 किलोमीटर इनोवा से चलकर यहाँ आते समय इसके अलावा और कुछ सोचते रहे क्या ? आबादी, जंगल, वादी, रास्ते सब क्या ख़याल कराते रहे.
वह सीधा हुआ और उसके नज़दीक आ गया मगर चुप रहा.
सच में सलिल !! तुमसे फिर से मुहब्बत करने का मन होने लगा है.
ओह !! क्या मैं अब बेहतर ड्राइव करने लगा हूँ... शायद मुस्कराया था वह.
हाँ बेहतर ड्राइव करने लगे हो ...... गाड़ी भी.
चलो नीचे चलते हैं, बहुत से इवेंट्स हो रहे हैं आज की रात.
रहने दो ठण्ड होगी.
अरे नीचे अलाव लगे हैं देखो...
देखा न, चारों ओर इतनी भीड़ भी तो हो गयी है.
रूम हीटर ऑन था, कमरा धीरे धीरे सामान्य तापमान पर आ रहा था. टीवी ऑन करने का उसका मन था नहीं. बस एक बार वाशरूम से आकर उस हेरिटेज होटल के शाही पलंगनुमा बिस्तर पर.......!! सोच ही रही थी वह.
“कुछ पीना है” उसके आगे का ख़याल सलिल की आवाज़ से टूट गया.
नहीं अब सोने की इच्छा है.
इतनी जल्दी, हाँ थक गयी होगी. पर नया साल तो आने ही वाला है.
हाँ पिछला जो गुजर गया न...!
आज की ये बातचीत वैसी नहीं थी जैसी उनके बीच अक्सर होती थी.
ये लो इसे ओढ़ लो, इसे पहन लो, और इसे बिछा लो. सलिल उसे वह सब एक-एक कर देता रहा, जो उसने अपने बेग से कुछ देर पहले निकाला था. इस बीच खामोशी से करीब दस मिनट का वक़्त गुज़र गया.
वह भी खामोश ही थी इस दरमियान.
एक शाल, एक नथनी, और दो बाँहे फैलाए सलिल को कुछ इंच की दूरी पर महसूस कर वसुधा खिल कर सकुच गयी.
उठी, झुकी, और उसके आगोश में यह कहते हुए खो गयी कि “आने वाला हर वक़्त मुबारक़ हो.”
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[ सलिल ने ऑफिस से लौटते हुए उसे देखने कि रस्म निभायी और घरवालों ने मिलकर पूरी जिद और रस्मोरिवाज से शादी कर दी. शादी के बाद दोनों की बातचीत में अक्सर मौसम नहीं आता था.... फिर पता नहीं क्यों आने लगा..... कब से ....??]
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ये है complicated कहानी का पहला टुकड़ा... smile emoticon
शेष आगे .......



बातचीत में मौसम के आने के पहले...
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कम मुलाकातें, कम बातें, कम उम्र कुछ हदें तय कर देती हैं. प्यार शब्द के मायने पता नहीं कितने लेवल क्रॉस करने के बाद समझ आये. शादी क्या एक उम्र में आकर कर लेनी चाहिए ? पता नहीं !! इच्छायें इनका क्या ? रूप, गंध, शरीर किस तरह से व्यक्त होती होंगी. वह दुविधा में था, कभी उम्र, उसके साथ जुड़ी ज़िन्दगी की इमेजिनरी प्लानिंग, कभी एक जिस्म, तो कभीकभार एक विपरीत लिंग वाले साथी की जरुरत बस. यह सब अक्सर सोचता ही रहता, तो उसे ऐसा लगा कि शादी के लिए हाँ कर देनी चाहिए, सो कर दिया.
वसुधा का रिश्ता कई दिनों से उसके घर पेंडिंग पड़ा था. पिछले साल उसके परिवार में किसी की शादी वाली एलबम से निकाल भेजी गयी तस्वीरों में वह घाघरा-चोली में कॉमन फेस सही, उसे ठीक लगी.
हाँ कर दी उसने.
वसुधा आ गयी, पापा के घर और उसके जीवन में .....
पिछले सात दिनों में उसकी दो तरह से पहचान बनी. भिण्डी की सब्जी बढ़िया बनाती और घर में भी साड़ी बड़े सलीके से पहनती थी. अब इतनी बड़ी फैमिली में तन्हाई मिले तो कुछ और पहचान हासिल हो.
हर उम्र की अपनी जरुरत होती है मगर यह व्यक्तिगत तौर पर अलग अलग होती है. शायद इनकी तीव्रता और पुनरावृत्ति कई बार प्रेम को अपनी तरह से परिभाषित कर लेती है. इसका सच या झूठ होना बाद में तिलिस्म टूटने पर पता चलता है. पता नहीं कहीं पढ़ा है, गुजरा है या फिर खुद ही सोचता है.
कुछ दिनों के लिए बाहर निकले तो उसके तराशे हुए देह से भी पहचान हुई.
समुन्दर की शोर मचाती लहरें किनारों पर फुहारें बनकर उसे भिगोती, भीगे कपड़ों में वापस होटल आकर फिर शॉवर में एक साथ भीगते, शूटिंग वाले स्पॉट को देखने अधूरी सीढ़ियों पर ही बिन बुलाये आ गयी बारिश से भीगते, भरी दोपहरी नर्मदा पर रेंगती स्टीमर के डेक पर खड़ी, मचलते लहरों को देखते पसीने से भीगते, नाईट शो के बाद उंगलियाँ फँसाये लौटते हुए स्लीवलेस कुरते में भीतर तक आ गए ठिठुरन वाले वक़्त में भी उनकी बातचीत में मौसम नहीं आया.

तुमने मुझमें ऐसा क्या देखा जो पसंद कर लिया....! उस दिन की बातचीत ऐसे ही शुरू हुई.
यूँ ही बस शादी करनी थी एक अदद लड़की से, सो कर लिया. उमर हो रही थी न .....! अपनी बात पूरी करने वाली लाईन जानबूझकर थोड़ा रूककर कहा उसने.
“और कोई लड़की देखी कभी” बात आगे बढ़ाने के लिहाज से था ये अगला सवाल.
हाँ ! मगर प्लान करके नहीं.
उत्सुकता से भरे सवालों का सपाट स्वर में जवाब. फिर भी वसुधा पूछती रही.
तुम्हारी लाइफ में पहले कभी कोई रही, याने कॉलेज में किसी को पसंद किया हो.
क्या करोगी यह सब जानकर. छोड़ो रहने दो. अच्छा तुमने कभी किसी को पसंद किया, वो क्रश टाइप वाला नहीं न. सवाल टालने के लिए सवाल ही कर लो, यही सोचा था शायद उसने.
हाँ पड़ोस का एक लड़का पसंद करता था, एक दिन मुझे अकेले देखकर कहा भी था उसने. वो टीनएज का अट्रेक्शन जैसा था..... मेरी तरफ़ से ना ही था. उसका जवाब उसी टीनएज की मासूमियत से लबालब था.
ऐसी बातें वसुधा को सलिल के नज़दीक ला रही थी. ये रेयर इनोसेंस उसे एक प्रकार की गारंटी के साथ भाने लगी थी, शायद यही न भुलाये जा रहे अतीत से वसुधा को दूर रखने में उसकी मदद कर रही थी. सलिल के सपाट जवाब वसुधा के लिए साफगोई बयान जैसे थे. अब तक बातचीत में मौसम नहीं आया है. उफ़ ! जिंदगी इतनी आसान होती.


गुदगुदी सिहरन में तब्दील हो जाती है, जी लगता नहीं, तस्वीरें निहारते वक़्त गुजरता है. उसकी बातें, किसी तरह हिस्सा बन जाना, बस तुम्हारा साथ रहे.
तुम भी न !
वो देखो गिलहरी गुलमोहर के बीच अठखेलियाँ कर रही है.
कहाँ ?
उधर देखो, उसने धीरे से अँगुली उसके बायें गाल पर रख इशारा किया.
अच्छा... ! ज़रा तुम भी उधर देखो सूरज क्षितिज के पार उतर रहा है... उसके कान के पीछे अपनी हथेली रखी.
वह धीरे से पीछे घुमा और उसकी हथेली पर एक चुम्बन रख दिया..... चलो धरती के किसी कोने का तो सूरज इस वक़्त क्षितिज के करीब जरुर पहुँच गया होगा. मुस्कुराते हुए उसने अब गाल को चूमा.
उसी तरह का “जवाब” बार-बार पूरी करने की इच्छा मसोसकर वह उसे कनखियों से देखती रही.
भरी दोपहरी में उस हॉस्टलनुमा कमरे में गिलहरी, गुलमोहर, क्षितिज, सूरज और पता नहीं क्या क्या ....?? सिर्फ सलिल और सखी ही देख रहे थे, जो उन्हें अक्सर दिखते भी थे. जाहिर है उनकी बातों में एक तो मौसम आता नहीं था और कभी आता भी था तो ऐसे नहीं. मगर यह तो एक ठिठका हुआ ख़याल ही था.

जैसे उस दिन सलिल और वसुधा के बीच बातचीत की शुरुआत इस तरह हुई.....
“मुझे किताबें पढ़ना पसंद है.” बहुत देर से किताब की एक पेज से आगे बढ़ने में नाकाम रहने की बोरियत दूर करने के लिए उसने टीवी सुन रही वसुधा की ओर बिना देखे ही बुदबुदाया.
“और मुझे किताबों से परे, जीना पसंद है.” अनजान वसुधा की मासूमियत बरकरार है.
मुझे कैरेक्टर्स के द्वन्द पसंद हैं. उसने उबासी लेते हुए आवाज का वॉल्यूम बढ़ाया.
और मुझे द्वन्द से ज्यादा कैरेक्टर्स अज़ीज़ हैं. वसुधा अभी भी उसी अंदाज़ से बात कर रही है. हाँ अब वह टीवी देखने लगी.
उन कैरेक्टर्स के “character” नहीं ? उसने “राइम” करने के लिहाज़ से पूछा.
तो द्वन्द में क्या होता होगा, एक दूसरे के कैरेक्टर के बरक्स नुक्ताचीनी ही न.
तुम मुझे ट्रैप कर रही हो ..... सलिल हँसने की कोशिश करने लगा.
न न ट्रैप होने से बच रही हूँ ... वसुधा अभी भी वैसी ही है.
वैसे किस किताब का कौन सा कैरेक्टर तुम्हें हर मूड में पसंद आता है. वसुधा ने बात बदलने के लिए कहा.
अब कोई एक हो तो कहूँ, बहरहाल मुझे हर “मेल कैरेक्टर” के लिए एक शब्द बहुत पसंद है.
क्या.. ?
“लम्पट”
किताबों या हकीक़त में... या फिर दोनों में !!! यह कहते हुए उसके चेहरे पर जानी पहचानी निश्छल हँसी तैरने लगी.
सलिल उस पेज को अबकी बार बिना पढ़े आगे बढ़ गया. वसुधा अभी भी वैसी ही थी. वह टीवी सुनने लगी. जाहिर है ऐसी बातचीत में मौसम का ज़िक्र अभी जरुरी नहीं.


सखी के ख़याल अक्सर उसे किताब के किसी एक पेज पर रोकने लगे थे. फिर उसके बाद सलिल के साथ जो गुजरती उसे वसुधा समझने लगी थी. टीवी ऑन होता था, मगर वह तो सुनती बस थी न. यही ख़याल सलिल को किताबों से मोबाइल और मोबाइल से सखी के “क्लोन्स” की ओर ले जाने लगे.
वह कहती न थी, हाँ सलिल की मोबाइल कन्वरसेशन के साथ-साथ उसके मिलने-जुलने वालों पर निगाह जरुर ठहरने लगी.
विवाह की सामान्य नैतिक बाध्यताओं के इतर वह अपने पुराने दोस्तों, जिनमें खासतौर पर अंजलि, रुखसार भी थीं, से कांटेक्ट में रहना जरुरी मानकर चलता था. कोई कहे तो इसे वह जस्टिफाई भी करता, जैसे वसुधा से.
वसुधा का ध्यान इस तरह के मोबाइल कन्वरसेशन भटकाने लगे थे.. ”देखो तुमने जीना शुरू ही नहीं किया, मेरी मानो थोड़ी सी बिगड़ भी जाओ. अपने लिए वक़्त निकालो, तुम्हारे लिए हमेशा पहले प्रद्युम्न, फिर बच्चे फिर घर जरुरी रहे. लादी गयी जिम्मेदारियों को खुद की इच्छाओं पर तवज्जो देकर ढोना कहाँ तक ठीक है. अपनी काबिलियत को किचन, बच्चों की टिफिन, ट्यूशन, हसबेंड की फरमाईश, कामवाली बाईयों के मेनेजमेंट, ऑफिस के टास्क क्लीयरेंस और कलिग्स के साथ किच-किच में खपा दिया है. वो स्ट्रेटफॉरवर्ड, जुनूनी लड़की कहाँ खो गयी. उसे निकालो अपने भीतर से. जियो खूब जियो....अपने मन का करो, थोड़ी बिगड़ जाओ.”
वह समझने लगी... यह मैं नहीं हूँ, न हो सकती हूँ. इसकी फ्रीक्वेंसी मोबाइल के थ्रू ही मैच करती होगी इसलिए यह उसी नेटवर्क के कम्युनिकेशन में कही-सुनी और अमल में लायी जाती है.
उनकी बातचीत में मौसम कभी-कभार आने लगा था. कई रात वह भीगने लगी थी.

फिर भी ज़िन्दगी उसी “इमेजिनरी प्लानिंग” के हिसाब से चल रही थी, जैसा सलिल ने सोचा था. जाहिर है इन अवसरों पर वसुधा की बातों का इशारा समझकर अपनी जिद पर अब वह सपाटबयानी नहीं करता.

“वक़्त के साथ कम्युनिकेशन के मायने बदल जाते हैं.” इस आवाज से किसी मनपसंद गाने के बीच आये कॉल की तरह उसका हमसफ़र, बेसब्र ख़याल जैसे ब्रेक हुआ था.
और मीडियम भी न .....! उसने झट से सलिल के अधूरे से लग रहे वाक्य को पूरा किया.
तुम उसका अक्स ढूँढते रहते हो सलिल..
चुप्पी........ ###
हरेक शख्स में, जहाँ वो मिल ही नहीं सकती.
“ तुम्हें खाना बनाना पसंद नहीं है न..... वसु ” वह निःशब्द होने पर ही उचारता है.
अंजलि, रुखसार या “किसी”.... मतलब मुझमें में भी नहीं मिलेगी ... ज़रा मन को मना भी लो.
तुम ये बेवजह घर के सब कपड़े धोना कब बंद करोगी.
“ तुम भी कम से कम मुझसे बेवज़ह ही सही बात तो कर लिया करो..सलिल ” यह भी चरम क्षण का संबोधन ही था.
तुम देर रात तक टीवी देखना बंद करो
सहसा दोनों टीवी की तरफ देखने लगे, डिस्कवरी पर साउथ पोल पर कोई डाक्यूमेंट्री चल रहा था. सतही चुप्पी के बाद बातचीत डाइवर्ट होने लगी.
देखो आज मौसम कैसा अजीब सा हो गया है, ठण्ड भी ज्यादा है.
हाँ आसपास कहीं बारिश हुई होगी.
चलो, जिंदगी में लास्ट एपिसोड का रिपीट टेलीकास्ट देखना है.
हूँ.......! मुझे भी कल सुबह जल्दी उठना है. मोबाइल में चार्जर का पिन खोंसते हुए... उनके बीच लास्ट डायलाग डिलीवरी होती है.
इस रिश्ते में मौसमी ठण्ड, ताप, बारिश घुसपैठिये की तरह कब आवाजाही करने लगे. पता ही न चला. अनमनी सी पेंच फंसी रहने लगी वसुधा, सलिल, सखी और उसके क्लोन्स के बीच.


आप क्रिसमस के लिए जा रहे हैं न सर ! थोड़ा अधीर लग रहा सलिल अपनी बात रखता है.
हाँ, इस बार और भी कुछ ख़ास है डियर.... अरुण सिंह बॉस की तरह ही मुस्कुराते हैं.
अरे हाँ, याद आया सर, आपकी शादी...है न ! सलिल संभलकर मुस्कुराता है.
यस पार्टनर शादी ! तुम तो आओगे नहीं. चलो लौटकर तुम्हारी फरमाईश पर मेरी तरफ से पार्टी डन रही.
राईट सर !!!
और बताओ !!!
सर सोच रहा हूँ.. न्यू इयर पर इस बार मैं भी कहीं हो आऊँ.
अरे जरुर.. राजस्थान गए हो कभी.
हाँ सर !
तो जाओ, माउंट आबू घूम आओ. बता रहे हैं वहाँ मौसम भी अच्छा है, न्यू इयर पर कई बार टेम्परेचर माइनस में चला जाता है. मज़ा आएगा.
जरुर सर ! वैसे भी वसुधा बहुत दिनों से इसी की ज़िद कर रही है.
गुड, बीवी की इच्छा का सम्मान भी हो जाएगा. “लाइक फूल्स पैराडाइस...” कहते हुए आँख मारते हैं. और हाँ कोई जरूरत हो तो बताना मुझे.
थैंक्स सर .... दुविधा में हँस भी नहीं सका वह.


शायद इस बातचीत में मौसम नहीं आया था....
“तुम्हारे बर्थडे का गिफ्ट लेना तो रह गया न इस बार..” बहुत देर की कोशिश के बाद बातचीत की शुरुआत के लिए उसे यही लाइन ठीक लगती है, तो कह देता है.
हाँ जैसे पिछली बार तुमने टाइम पर दिया था न ! ..... वसुधा अब टीवी देखने लगी है.
थोड़ी चाय मिलेगी ??
हाँ क्यों नहीं... यदाकदा तो मांगते हो. अभी लायी.
“चलो इस बार राजस्थान से कुछ लेते हैं तुम्हारे लिए.”
चाय की चुस्की से शायद बातों में मिठास आ जाती है, मुस्कुराते हुए वसुधा सोचती है. फिर कहती है “एक स्मार्टफोन ही दिलवा दो.” बात पूरी करते करते जोर से खिलखिला उठती है. सलिल फिर भी सोचता रहता है.
“आज ही निकलेंगे... गरम कपड़े ठीक से रख लेना, मैं गाड़ी तैयार करवाता हूँ.” सलिल कामकाजी बातचीत के सहारे खुद को असहज सवालों से दूर रखने की कोशिश करता है.
हूँ, कितनी बार मिन्नतें की हैं तुम एक बार मेरे साथ कुछ लम्हें जियो तो....!!!
दो घंटे बाद....
नयागांव बैरियर क्रॉस कर इनोवा अब राजस्थान के फोरलेन पर थी. स्पीडोमीटर का कांटा 120 के आसपास देर से बना हुआ है. सलिल ड्राइविंग सीट पर ही है और वसुधा अपना सीट बेल्ट खोले मोटर व्हीकल एक्ट की अधिकाँश वैधानिक चेतावनियों की लगातार अवहेलना कर रही है.
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समीर .....

Saturday, February 21, 2015

बदलाPUR ने बदला बदला लेने का अंदाज़

                                       
अपना बॉलीवुड बदला/revenge पर खाँटी मूवी बनाने और #टैग लाइन रखने का आदी रहा है. हमारी टिपिकल बदला लेने वाली फिल्मों में खालिस अनैतिकता, अन्याय और सिस्टम के खिलाफ उतने ही अभिनव ढंग से बदला लेने वाला नायक कभी-कभार विलेन से तो ज्यादातर महँगे टिकिट और बेशकीमती टाइम खोटी करने वाले दर्शकों से हिसाब बराबर करता है. क्या "बदलाPUR" का बदला भी उतने ही शिद्दत से श्रीराम राघवन [एजेंट विनोद फेम] ने रचा है ? यह जानने के लिए फिलिम देखना तो बनता है.

फ़िल्म दर्शक की नब्ज़ को पहले ही मिनिट से मैच कर लेती है फिर उसे थामे, दबाये, बढाए, रोके चलती रहती है. गाने बैकग्राउंड स्कोर की तरह हैं जो सूफियाना अंदाज़ में में स्टोरी को सपोर्ट करती हैं, गुटखा थूकने, कश लगाने या फिर उबासी दूर करने के लिए वॉशरूम तक जाने की इजाज़त नहीं देती.  ये सोचना मज़ेदार है कि जब श्रीराम राघवन ने इसके कलाकारों को पहली बार story narrate किया होगा तब उनका रिएक्शन कैसा-कैसा रहा होगा. कुछ को समझ आया होगा तो कुछ ने इस रिस्क के साथ फिल्म साइन कर लिया होगा कि फिल्म के प्रीमियर शो में राघवन से ही पूछ लेंगे.

दर्शक को सबकुछ  दिखाकर उसे स्टोरी के क्लाइमेक्स पर अटकल लगाते रहने पर मजबूर करना ही इस "थ्रिलर" का असली "थ्रिल" है.

यामिनी गौतम, दिव्या दत्ता, राधिका आप्टे, विनय पाठक, हुमा कुरैशी एक तरफ अपने करैक्टर में डूबे हुए "irreplaceable" हैं, तो दूसरी तरफ "तीन प्रमोशन और दो बाईपास" वाला पुलिस ऑफिसर, "पुराने चाँवल में कीड़े न निकाल" की सलाहियत वाली माँ, पुलिस थाना, जेल, पुलिस/जेल लाइन के साथ सिनेमेटोग्राफी सब फिल्म के मूड और फ्रीक्वेंसी को ऊपर वाले लेवल पर ले जाते हैं.

वरुण धवन चौंकाते हुए उठते हैं, तो नवाजुद्दीन की एक्टिंग सभी रसों का पान कराती यह तय करती है कि वो स्टोरी टेलिंग की विधा के साथ इस फिल्म के असल हीरो हैं. बहरहाल अब बॉलीवुड एक्सपेरिमेंट, सेक्स को लॉजिकली यूज करना सीख रहा है.

धोनी की तरह फिल्म की फिनिशिंग भी नवाजुद्दीन ने अपने ही बिग शॉट अंदाज़ में किया है. क्या किसी अन्याय/गलत कार्य का बदला उसी तरह लिया जाना कंसर्न्स को न्याय दिलाने का सही इंसानी तरीका है या नहीं ? इस प्रश्न को ऑडियंस के दिमाग में खलबली मचाने के लिए छोड़ते हुए.


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#समीर