Monday, October 13, 2008

लाश ने दिया सुराग






जानकार बताते हैं कि आदमी अक्सर झूठ बोलते हैं, लेकिन मुर्दा कभी झूठ नहीं बोलता. यह बात कोई माने या न माने पुरवा गाँव के सैकंडों लोग मान चुके हैं. जैसा लोकार्दो कहते हैं...." शातिर अपराधी भी जहाँ अपराध करता है, उस स्थान पर कुछ न कुछ छोड़ता है या ले जाता है.." .जिसे कानून की भाषा में सबूत कहते हैं. लेकिन इस रहस्यमय कहानी में मुर्दा ही घटना स्थल से अपने हत्यारों का सुराग ले आया. बात है बरेला थाने जबलपुर से करीब २० किलोमीटर दूर स्थित पुरवा गाँव की जहाँ सडांध मारती एक लाश के पता चलते ही हड़कंप मच गया. पुलिस को लाश के कपड़ों में एक ऐसा सुराग हाथ लगा कि मात्र दो घंटे में ह्त्या के सभी आरोपी गिरफ्त में आ गए. वह सुराग था.......????










मौके पर क्या देखा ...पुलिस और फोरेंसिक विशेषज्ञ की टीम ने.

@ लाश के पश्चिम और करीब ५० मीटर दूरी पर खेत को बारबेट वायर से घेरा गया था, जहाँ दो खम्बों के बीच वायर कुछ उलझे हुए थे. उसी स्थान से खेतों के बीच एक पगडण्डी भी थी. मृतक के शर्ट का पिछला हिस्सा फटा था.
@ जमीन पर पड़े निशान और लाश को बारीकी से देखने पर समझ आ रहा था कि लाश को करीब ४० फीट खींच कर लाया गया था.
@ मृतक के गले में कुछ डोरियाँ सी उभरी थीं , जिससे लग रहा था कि उस पर कुछ दबाव डाला गया होगा.
@ मृतक के अंडरवियर में चने का भूसा लगा था, जबकि पास के खेत में गेहूं की फसल लगी थी और आसपास कही भी चने के भूसे का नामो-निशान नहीं था.
@ फोरेंसिक विशेषज्ञ ने बताया लाश "मेगेट्स स्टेज" में है जो मृत्यु के बाद लगभग 48-72 घंटे के बाद की स्थिति होती है.





बरेला थाने के गाँव पुरवा के बाहर एक फार्म हाउस से लगे बंजर भूमि पर एक अज्ञात लाश की सूचना थाने के फ़ोन पर मिलते ही थाना प्रभारी K.S. मलिक झुंझलायें और तत्काल अपने उप पुलिस अधीक्षक को इसकी ख़बर से अवगत कराया और थाने से गाँव की ओर रवाना होने के लिए फोर्स को क्लोस होने की हिदायत दिये. डी एस पी ने तात्कालिक जानकारी से पुलिस अधीक्षक मकरंद देउस्कर को सूचित कर उनके निर्देशानुसार फोरेंसिक विशेषज्ञ की टीम के साथ घटना स्थल के लिए रवानगी डाल दी.

उधर इंस्पेक्टर मलिक पुरवा के नजदीक पहुंचे ही थे कि उनके मोबाइल की घंटी बज उठी. गाँव के एक व्यक्ति ने बताया कि मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई है और स्थिति बिगड़ने वाली है. लोग तरह तरह कि बातें कर रहे हैं . ड्राईवर ने जीप की गति बढ़ाई और कुछ ही देर में इंस्पेक्टर मलिक मौके पर पहुँच गए. घटनास्थल पर गाँव वालों का हुजूम लगा हुआ था आशंका के कारण लोग आक्रोशित हो रहे थे. इंसपेक्टर मलिक ने गाँव के कुछ जिम्मेदार लोगों को पास बुलाया और उन्हें सहयोग करने का निवेदन किया तब कुछ लोगों ने पुलिस का अपने मतलब से साथ देने हेतु आक्रोशित लोगों को शांत कराने की कोशिश करने लगे. लाश से आ रही दुर्गन्ध के कारण कोई उसके करीब जाने का साहस नही कर पा रहे थे. पुलिस को देख कुछ भले लोगों का हौसला बढ़ा और लोग लाश को करीब जाकर देखने लगे.

लाश कि पहचान होते ही लोगों की ऑंखें फटी की फटी रह गई और कई असमय आए पसीना पोछने लगे. अचानक किसी ने कहा ......अरे ! ये तो गाँव का ही "गुड्डा" है. २१ साल के गबरू जवान का क्या हाल हो गया ? इसकी तो न किसी से दुश्मनी भी नहीं थी और न ही बेअदबी . कुछ ही देर में फोरेंसिक एक्सपर्ट्स के साथ DSP भी घटनास्थल पर पहुँच गए. दोनों टीम ने गुड्डा उर्फ़ सुमरत की लाश और घटनास्थल का बारीकी से मुआइना करना शुरू किया. फोरेंसिक एक्सपर्ट ने बताया लाश में जो कीड़े लगे हैं उसे विज्ञानं की भाषा में "मेगेट्स स्टेज" कहते हैं. जो मृत्यु के 48-72 घंटे में शरीर में लगते हैं. यानि लाश तीन-चार दिन पुरानी थी . पंचनामा तैयार कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

लाश में देखी गई बारीकियों को DSP और फोरेंसिक एक्सपर्ट्स ने विवेचना के बिन्दु तय कर विश्लेषण करना शुरू किया और इंस्पेक्टर मलिक ने निर्देश के मुताबिक आस पास के एरिया की सर्चिंग करनी शुरू की और वहां खड़े लोगों में सुमरत के करीबी लोगों से बिना देरी किए उसकी आदतों, रहन-सहन, उठक-बैठक, और घर-परिवार, रिश्तेदार के सम्बन्ध में जानकारी लेकर नोट कर लिया.

पतासाजी में जुट चुकी पुलिस टीम को कुछ अहम् सुरागों का कनेक्शन जुड़ने के साथ ही थाने से जानकारी लेने पर पता चला कि गुड्डा उर्फ़ सुमरत की पिछली शाम को ही गुमशुदगी दर्ज करायी गई है. और पूर्वा गाँव से ही करीब सप्ताह भर पहले किसी छेदीलाल ने खेत से नोजल और मोटर चोरी हो जाने की जाँच के लिए दरख्वास्त दिया था. पतासाज टीम को तीन अलग-अलग टास्क के लिए तीन दिशाओं में रवाना किया गया, जों क्रमशः पहली टीम फॉर्म हाउस जो घटना स्थल से लगा हुआ था, वहां पहुंचकर चने के भूसे का पता लगाये क्योंकि लाश के अंडरवियर में वही भूसा लगा हुआ था और पुलिस को कोटवार ने बताया कि फॉर्म हाउस के खलिहान में चने का भूसा भरा हुआ है. इसलिए फॉर्म हाउस जाने वाली टीम को हिदायत दी गई कि वह पहले उस स्थल को सुरक्षित करे, फ़िर वहाँ मौजूद लोगों को लेकर थाने आए., दूसरी टीम सालीबाडा गाँव, जहाँ फार्म हाउस का मालिक संजू उर्फ़ संजीव खत्री का मकान था. तीसरी टीम गुड्डा के घर की ओर चली गई. DSP स्वयं घटनास्थल पर भौतिक, रासायनिक और मौखिक साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद थाने के लिए रवाना हो गए.

पहली टीम ने फॉर्म हाउस में दबिश दी और वहाँ चने के भूसे को उठाकर अन्यत्र रखे जाने के साक्ष्य दिखने पर उसे सुरक्षित कर वहाँ मौजूद अस्सू उर्फ़ आशीष विश्वकर्मा और छेदीलाल गोंड़ को पूछताछ के लिए बरेला थाने ले आए. अस्सू और छेदीलाल फॉर्म हाउस में नौकरी करते थे. पूछताछ के दौरान दोनों ने सभी सवालों के जवाब बड़े साहस और विश्वास से देकर पुलिस की चिंता की लकीरें गहरी कर दी, दोनों बिना उलझे पुलिस के सभी सवालों का जवाब देते रहे. इस बीच DSP ने अस्सू से उसका सेल फ़ोन लेकर उसके डिटेल्स और पिछले एक हफ्ते के लोकेशंस के सम्बन्ध में जानकारी एकत्र करनी शुरू कर दी.

अधिकारियों ने अस्सू से पूछा कि संजू फॉर्म हाउस कब से नहीं आया...अस्सू जो कि फॉर्म हाउस का मेनेजर का काम देखता था, ने बताया करीब 3-4 दिनों से संजू नहीं आया है, न ही उससे कोई बात हुई है. लेकिन अस्सू की मोबाइल डिटेल्स से पता चल रहा था कि वह संजू से लगातार संपर्क में था. दो दिन पहले ही बरेला में देवी जागरण में संजू आया था, लेकिन अस्सू इससे पहले ही इनकार कर चुका था. पुलिस ने पासा फेंका और कहा कि उसके पास प्रमाण है कि संजू देवी जागरण में आया था बस फ़िर क्या था, अस्सू और छेदीलाल पसीना पसीना हो गए, कमरे का तापमान अचानक बढ़ा हुआ सा लगने लगा. पूछताछ में लगी टीम ने थोड़ी हिकमत अमली दिखाई तो अस्सू ने सब सच बताने का वचन दे दिया. इसी बीच, दूसरी टीम सालीबादा से संजू उर्फ़ संजीव खत्री को लेकर आ गई. आते ही DSP ने उसका मोबाइल अपने कब्जे में लेते हुए अभी तक आए डिटेल्स को सत्यापित करना शुरू किया ही था कि थाने में संजू ने जब अस्सू और छेदीलाल को देखा और नजरें मिलाते ही वह सूखे पत्ते की तरह कांपने लगा.

तीनो को बताया गया कि चने का भूसा अंडरवियर में लगा हुआ था और तुम्हारे फॉर्म हाउस के खलिहान में भी मिला है, लेकिन दोनों जगहों भूसे को एक ही तरह से साफ करने की असफल कोशिश की गई है. जों गेहूं के खेत से गिरते हुए लाश तक एक ट्रेक बना रही है. तीनो को बात समझ तो आ ही रही थी, उन्होंने राज उगलना शुरू किया तो उसकी सडांध लाश से भी ज्यादा आने लगी कि एक आदमी के जान की कीमत क्या 1500/- के "नोजल" [पानी सींचने के काम आने वाला छोटा सा उपकरण जो पीतल का बना होता है ] से भी कम है. तीनो की बातों से जो हत्या की कहानी निकलकर आई, वह कुछ इस तरह थी कि .............

"........ पिछले कुछ समय से सालीबाडा निवासी संजीव खत्री उर्फ़ संजू के पुरवा गाँव से लगे फॉर्म हाउस में चोरी की घटनाएँ होने लगी थी. इसके ईलाज के लिए फॉर्म हाउस के मालिक संजू और मेनेजर अस्सू ने ख़ुद की व्यवस्था बना ली और जब 7 अप्रैल की रात करीब दस बजे सुमरत शराब के नशे में फॉर्म हाउस के बाउंड्री के पास मिला, तो उन्हें उसी पर चोरी का संदेह हुआ. और उससे वे पूछताछ करने लगे. इधर संजू ने भी छूट दे रखी थी कि फॉर्म हाउस में चोरों पर नजर रखो और पकड़े जाने पर जम कर सबक सिखाओ....आखिर रईसी कहाँ जाकर छुपती और जों कहाँ से न निकलती. सुमरत से अजय यादव उर्फ़ कोकले , अस्सू उर्फ़ आशीष और छेदीलाल ने फॉर्म हाउस के पास घूमने का कारण पूछा . जवाब उनके माकूल न था. सुमरत भी जब निर्दोष था तो उसने जवाब न देकर पूछताछ पर ही सवाल उठाना शुरू कर दिया. यह बात अजय, "जो सुमरत की उमर का ही उसका साथी ही था..फर्क इतना की वह जी हुजूरी कर संजू का करीबी हो गया था और अक्सर संजू के साथ उसके ऐश्वर्य का जूठन झोकते जबलपुर, दिल्ली और मुंबई की सैर भी कर आता था." को नागवार गुजारी उसने सुमरत के गले में हाथ की जंजीर डाल दी और छेदी और अस्सू ने उसे पीटना शुरू कर दिया. कुछ ही देर में सुमरत लस्त पड़ गया. और तीनो ने उसे मार्च- अप्रैल की रात में फॉर्म हाउस में ही खुले आसमान के नीचे छोड़ दिया.

जब सुबह 4 बजे छेदी फसल में पानी दिलवाने के लिए उठा तो उसने देखा, सुमरत अभी वहीं पड़ा है. उसने पास जाकर देखा और दो लात मारकर उठाने की कोशिश की. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी ...सुमरत के बदन पर पानी और झिंझोड़ने का कोई असर न होते देख छेदी ने अस्सू को उठाया और सारी बात बताई. ख़बर मालिक संजू तक पहुंचाई गई जो तुंरत फॉर्म हाउस पर आया और लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाने लगे. " देखो अभी दिन में कुछ भी करना ठीक नहीं होगा जो होगा रात में, अभी इसे खलिहान में रखे चने की भूसे में दबाकर रख दो . मै रात में आता हूँ " ..कहकर संजू चला गया. रात हुई तो अस्सू और संजू के निर्देशन में अजय और छेदी सुमरत की लाश लेकर पैदल निकल पड़े. लाश लेकर चलते खौफ और सावधानी बरतने के कारण रौशनी का उपयोग नहीं कर रहे थे. जब कंधे पर जवान लाश हो तो अच्छे अच्छों की हिम्मत पस्त हो जाती है. आपाधापी में फॉर्म हाउस में लगे कंटीले तार इनमें से किसी को दिखा नहीं और सुमरत की मृत देह छेदी के कंधे से फिसलकर बारबेट वायर के दूसरी ओर जा गिरी. तार में फंसकर सुमरत की शर्ट भी फट गई. तीनो लाश को दूर ले जाकर ठिकाने लगाना चाहते थे लेकिन किस्मत और बारबेट के कन्टीलें तार में उलझ कर रही सही हिम्मत भी खो बैठे और वही से उलटे पैर फॉर्म हाउस लौट कर दुबक गए.

दूसरे दिन संजू फॉर्म हाउस फ़िर आया और उसने तीनो को डांटने लगा कि लाश इतनी नजदीक क्यों फेंका . उसे ठीक ढंग से ठिकाने लगाओ. उस रात अस्सू , अजय और छेदी फ़िर से हिम्मत जुटाकर निकल पड़े और लाश को किसी तरह बाउंड्री से 40 फीट दूर ही घसीट सके. लाश को दुबारा ठिकाने लगाने के बाद अजय दिल्ली का कोई काम निकालकर गाँव से भाग गया. और बाकी दो अपने काम में रमने का प्रयास करने लगे. लेकिन कहा है न खून सर चढ़कर बोलता है. लाश ख़राब हुई गंध फैली और उसमे मौजूद सबूत ने कानून के हाथ इनके गिरेबां तक पहुँचा दिए. चारो आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध चालान न्यायालय पेश किया जा चुका है....... "





Friday, October 10, 2008

चालान की प्रति और करोड़ों का खेल





जबलपुर ही नहीं वरन समूचे मध्यप्रदेश में "चालान" की प्रति के नाम पर लाखों- करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार का खुला खेल वर्षों से चल रहा है. किसी भी आपराधिक प्रकरण में जल्द न्याय हो इसके लिए न्यायालय में समय से चालान पेश होने की महत्ता अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है . कानून निर्माताओं ने दंड प्रक्रिया संहिता में ऐसे प्रावधान किये हैं कि आपराधिक प्रकरण में प्रत्येक आरोपी को चालान एवम उसमे संलग्न पुलिस के दस्तावेजों की निःशुल्क प्रतिलिपि अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाए. अनुशासन की दुहाई देने वाले पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस बात पर चुप्पी साधे बैठे हैं कि आरोपी को चालान की प्रतिलिपि उपलब्ध कराना किसकी जिम्मेदारी है. वहीं न्यायालय में चालान पेश करने की जिम्मेदारी का निर्वहन करने वाला पुलिस कर्मचारी नासूर बन चुकी ऐसी पीड़ा झेल रहा है जिसे वह खुलकर व्यक्त भी नहीं कर सकता. दरअसल विभाग के इन्हीं कर्मचारियों पर जिम्मेदारी थोप दी जाती है कि वे आरोपी को चालान व पुलिस के दस्तावेजों की प्रतिलिपि उपलब्ध कराये. मध्यप्रदेश शासन पुलिस विभाग को दस्तावेजों की फोटोकॉपी के लिए पृथक से कोई भी बजट उपलब्ध नहीं करता है और यदि ऐसे में समस्त दस्तावेजों की फोटोकॉपी के लिए पुलिस कर्मी आरोपी से रुपये की मांग करता है तो सीधे सीधे दंड प्रक्रिया की धारा 207 में बनाये गए कानून का उल्लंघन होता है. यदि ये पुलिस कर्मी कानून का पालन करता है तो फोटोकॉपी ले लिए उसे अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है जो अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण बनता है.






दृश्य एक


..........चोरी के एक मामले में पुलिस ने १० लोगों के खिलाफ विवेचना में सबूत जुटाये और प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत करने की स्थिति बनी. मामले की विवेचना करने वाले पुलिस कर्मी की धड़कने उस वक्त बढ़ने लगी जब आरोपियों को सैकड़ों पन्नों के दस्तावेजों की फोटोकॉपी देने का समय आया . पुलिस कर्मी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 का पालन नहीं किया और कानून का भय दिखाकर आरोपियों से फोटोकॉपी के पैसे वसूल लिए . खास बात यह है कि पुलिस कर्मी ने आरोपियों से फोटोकॉपी में खर्च होने वाली राशि की तुलना में कुछ ज्यादा ही पैसे वसूल लिए.



दृश्य दो


........... एक आपराधिक प्रकरण में नियम कानून जानने वाले कुछ आरोपी या कह ले रसूखदार आरोपी इस बात पर अड़ गये कि चालान की फोटोकॉपी के पैसे वे नहीं देंगे . चालान पेश करने वाला पुलिस कर्मी चिंता में पड़ गया कि तकरीबन दो हजार रुपयों का इंतजाम कहाँ से किया जाए . पुलिस कर्मी ने आधिकारियों से मदद मांगी तो उसे कोई राहत नहीं मिली, किसी तरह manage करने की बात कह कर टाल दिया गया. इस मामले में पुलिस कर्मी को अपनी जेब से ही फोटोकॉपी कराने कि नौबत आ गई, तो जाहिर है वह अपनी जेब से थोड़े ही फोटोकॉपी कराएगा.





क्या कहता है....पुलिस मेनुअल और CrPC

मध्यप्रदेश पुलिस मेनुअल एवम रेगुलेशन एक्ट कंडिका [ पेरा ] - 524 में न्यायालय अर्दली के कर्तव्यों को स्पष्ट किया गया है. रेगुलेशन के मुताबिक "तेज बुद्धि का आरक्षक" जो ठीक से लिखने और पढ़ने योग्य हो, दंडाधिकारी और उसके प्रत्येक सहायक के न्यायालय में अर्दली के रूप में पदस्थ किया जायेगा. वह दंडाधिकारी का व्यक्तिगत अर्दली नहीं है और न ही दंडाधिकारी के न्यायालय के लिपिकीय कार्य के स्टाफ को भारमुक्त करने के लिए आशयित है. वह पुलिस अभियोजक के नियंत्रण में है, जो यह देखने के लिए जिम्मेदार है कि वह [ अर्दली ] अपने कर्तव्यों को दक्षतापूर्वक करता है. वह कार्यालयीन समय में न्यायालय में उपस्थित होगा और उसके कर्तव्यों में निम्नलिखित समावेश होगा...

१. व्यवस्था बनाये रखना
२. अभियुक्त की सुरक्षित अभिरक्षा
३. हिन्दी समन्स एवम वारंट लिखना एवम जारी करना
४. न्यायालय में अपने बचत समय में मामलों की डायरी के बयानों की नक़ल करने में सहायता करना जो बचाव पक्ष के उपयोग के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 162 के अंतर्गत आवश्यक है.


..... दंड प्रक्रिया संहिता 1973

अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट या अन्य दस्तावेजों की नक़ल प्रतिलिपि देना
धारा 207 - किसी ऐसे मामले में जहाँ कारवाई पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संस्थित की गई है, मजिस्ट्रेट निम्लिखित में से प्रत्येक के एक प्रतिलिपि अभियुक्त को अविलम्ब निःशुल्क देगा

१. पुलिस रिपोर्ट
२. धारा 154 की अधीन लेखबद्ध की गई प्रथम इत्तिला रिपोर्ट [ FIR ]
३. धारा 161 की उपधारा [3] के अधीन अभिलिखित उन सभी व्यक्तियों के कथन , उनमें से किसी ऐसे भाग को छोड़कर जिनको ऐसे छोड़ने के लिए निवेदन की धारा 173 की उपधारा [6] के अधीन पुलिस अधिकारी द्वारा किया गया है.
४. धारा 164 के अधीन लेखबद्ध की गई संस्विकृतियाँ या कथन , यदि कोई हों .
५. कोई अन्य दस्तावेज या उसका सुसंगत उद्धरण जो धारा 173 की उपधारा [5] के अधीन पुलिस रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को भेजी गई है.




अभियोग पत्र या चार्ज शीट जिसे सामान्य भाषा में " चालान " कहा जाता है. पुलिस के द्वारा किसी भी अपराध की विवेचना में आरोप सिद्ध पाए जाने ऐ उपरांत आरोपियों के विरुद्ध विचारण हेतु न्यायालय में प्रस्तुत किया जाता है .

भारतीय कानून व्यवस्था में समस्त भारतीय नागरिकों को एक समान दर्जा दिया गया है. चाहे वह किसी मामले में आरोपी ही क्यों न हो..? और जब तक उसके विरुद्ध अपराध सिद्ध न हो जाये, उसे एक सामान्य नागरिक होने के रूप में समस्त अधिकार प्राप्त होते हैं. इसके लिए आरोपी जिसके विरुद्ध पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट [FIR] दर्ज करायी जाती है. उस अपराध की विवेचना में आरोप सिद्ध पाए पर साक्ष्य एकत्र कर विवेचक उसे गिरफ्तार करता है. जमानतीय मामलों में आरोपी को जमानत दे दी जाती है, तथा अजमानतीय मामलों में उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया जाता है. फ़िर विवेचना पूर्ण होने पर उसके खिलाफ अभियोग पत्र प्रस्तुत किया जाता है.

आरोपी के रूप में नामजद व्यक्ति के नैसर्गिक, संवैधानिक और कानूनी अधिकार का संरक्षण करने हेतु दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अंतर्गत उल्लेखित किया गया है कि किसी ऐसे मामलें में जहाँ कार्रवाई पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संस्थित की गई हो, उसे चालान की प्रतिलिपि निःशुल्क उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

जानकार कहते हैं कि कभी-कभी मध्यप्रदेश पुलिस मेनुअल एवं रेगुलेशन एक्ट पर 524 का हवाला दे दिया जाता है, जो कि ग़लत तर्क है. दरअसल पुलिस की तरफ़ से कार्य में लगे न्यायालय अर्दली को सामान्य व्यवस्था, अभियुक्त की सुरक्षित अभिरक्षा, हिन्दी समन्स, वारंट्स लिखने और जारी करने के कार्य से मिले बचत समय में जो मामलों की डायरी से बयानों की नक़ल करने में सहायता की , जो एक लाइन लिख दी गई है, उसके आधार पर पुलिस ने शायद अपना अधिकार ही मान लिया है. जबकि पुलिस रेगुलेशन में यह आदेश उस ज़माने का है जब न फोटोकॉपी मशीन थीं, न ही typewritter का चलन आम था.

पुलिस विभाग में इस प्रावधान को अलग-अलग लोगों ने अपनी तरह से परिभाषित कर लिया और नफा-नुकसान के खेल में लिप्त हो गए. चालान की कॉपी कराने का दर भी पृथक-पृथक तय किया गया है. स्वाभाविक है , न्यायालय अर्दली जैसी जगह जहाँ कुछ न हो, वहां लहरें तो गिनना पड़ेगा !!! इस सम्बन्ध में यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि पुलिस विभाग या शासन स्तर पर किसी अन्य माध्यम से चालान की कॉपी कराकर एक नक़ल प्रति मुलजिम [बचाव पक्ष] को देने के लिए कोई फंड की व्यवस्था नहीं है, न ही कोई बिल स्वीकृति करने का प्रावधान है, फ़िर भी चालान की कॉपियाँ तो हो रही हैं और काम भी चल रहा है. आख़िर ये कॉपियाँ हो कैसे रही हैं ? रुपये कहाँ से आते हैं ?? कितना खर्च हो रहा है ??? यह विचारणीय है.

इस क्षेत्र में जो होशियार है वो तो वर्षों से चालान ड्यूटी कर रहे हैं और जिन्हें कॉपी कराने का कार्य manage करना नहीं आता वो ड्यूटी लगते ही कहने लगते हैं, चालान कैसे पेश हो पायेगा ? मैं कहाँ से कराऊंगा कॉपियाँ , लेकिन परम्परा है तो निभानी पड़ेगी की तर्ज पर वह भी कार्य करता जाता है. शायद अपने वेतन के रुपयों से कॉपियाँ कराकर या फ़िर कोई और रास्ता अपनाने के लिए वह भी मजबूर हो जाता है. परिणाम स्वरुप भ्रष्टाचार का व्यवस्था के स्तर पर खुलेआम स्वीकृति देना और इस पर कोई स्पष्ट दिशा निर्देश जारी न कर , बढावा देने की बात साफ जाहिर होती है. पुलिस जिसकी छवि आमतौर पर ठीक नहीं कही जाती है, उसके विरुद्ध यह और भी नकारात्मक है और व्यवस्था भी इस न्याय-अन्याय कि लड़ाई में चालान की निशुल्क प्रति की तरफ़ बेसुध है. निशुल्क न्याय देना की नीति का हश्र इन गरीबों की कटती जेबों से दिखाई दे जाता है. यह एक ऐसा गोरखधंधा बन चुका है जिसमें लाखों-करोड़ों का खेल हर महीने हो रहा है और किसी के कानो में जूं तक नहीं रेंग रही है.



न्याय में विलंब


पुलिस की विवेचना और साक्ष्य जुटाने के तरीकों के बारे में वैसे भी अच्छी धारणा नहीं है. विवेचना के दौरान पुलिस अभियोजन के लिए यथासंभव साक्ष्य जुटा कर अनेक व्यक्तियों के खिलाफ न्यायालय में चालान प्रस्तुत करती है. तब ऐसे में वे व्यक्ति जो अपने को बेगुनाह साबित करना चाहते हैं, उनके लिए एक मात्र रास्ता न्यायालय से न्याय पाने का रह जाता है. जिसके लिए जरुरी है कि चालान समय पर न्यायालय में समय पर प्रस्तुत हो जाये, किंतु आर्थिक कारणों से यदि चालान की प्रतिलिपि के लिए वह पैसे नहीं जुटा पाता है तो चालान न्यायालय में समय से पेश नही हो पाता है. इस स्थिति में व्यक्ति को न्याय पाने के लिए पता नहीं और कितने दिन इंतजार करना पड़ता है. एक मामले में माननीय उच्चतम न्यायलय में साध्वी ऋतंभरा के खिलाफ दायर याचिका में सम्बंधित शासन [अभियोजन पक्ष] को साध्वी के आवेदन पर उस जनसभा के ऑडियो और विडियो केसेट की प्रतिलिपियाँ उपलब्ध कराने को मान्य किया था. और सम्बंधित न्याय के केसेट्स की प्रतिलिपियाँ तैयार करने के लिए अस्वीकृति को उचित नहीं माना था.

यह व्यवस्था जो किसी भी कारण से चल रही है, उसमें पुलिस के पास कोई निर्धारित फंड कि व्यवस्था नहीं जबकि वह अभियोजन पक्ष के रूप में है...? शासकीय अभियोजक जो न्याय के लिए अभियोजन पक्ष की और से पैरवी करता है. और जिसके नियंत्रण एवम मातहत जो अर्दली कार्यरत है उनकी भूमिका....? और व्यवस्था में इस तरह के अदृश्य रूप में चल रहे कार्यों पर नजर एवम अंकुश हेतु जो विजिलेंस गठित है, उसके कार्य विचारनीय है ???

और आप भी विचार कर सकते है !!!



जवाब किसी के पास नहीं ..?????


जानकारों का कहना है कि चालान की फोटोकॉपी के नाम पर समूचे मध्यप्रदेश में हर साल करोड़ों रुपये आरोपी या फरियादी की जेब से वसूल कर संबंधितों [ पुलिस एवम अन्य ] द्वारा करोड़ों खुलेआम भ्रष्टाचार किया जा रहा है . यदि उदाहरण के रूप में देखा जाए तो जबलपुर जिले में यदि साल भर में सिर्फ़ दस हजार आपराधिक प्रकरणों का दर्ज होना तथा प्रत्येक मामले में सिर्फ़ दो लोगों को आरोपी बनाया जाना मान लिया जाये तो करीब एक करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार आशंकित है. कई आपराधिक प्रकरणों में तो पुलिस दस्तावेजों व चालान की प्रतियाँ की संख्या सैकड़ों में होती है . फ़िर भी प्रत्येक चालान की प्रतिलिपि में सिर्फ़ पॉँच सौ रूपये का अनुमानित खर्च मान लिया जाये तो आंकड़ा करीब एक करोड़ रुपये तक पहुँच जाता है. बात यदि प्रत्येक जिले में इतने ही आपराधिक मामलों की जाए तो पैंतालिस जिलों के हिसाब से राशि ४५ करोड़ रपये हो जाती है. इतनी बड़ी रकम आती कहाँ से है इसका उत्तर किसी के पास नही है....?????

जानकारी साथी रामकृष्ण परमहंस पाण्डेय से साभार

Friday, October 3, 2008

और अधिक मौन न रहा जाये

आज के अवसर पर एक प्रासंगिक रचना प्रस्तुत है...



बात हटकर कोई कहा जाये
और अधिक मौन न रहा जाये


सार सच कह गये फकीरों ने
बाकी सब रह गये लकीरों में
खोलकर अब उन्हें पढ़ा जाए...
और अधिक न रहा जाये


कैसे अपना वतन सँवारोगे
जब ना ख़ुद की चलन सुधारोगे
गाँधी गौतम किसे गढा जाये...
और अधिक मौन न रहा जाये


अपना उस धर्म से सुदृढ़ नाता
विश्व बंधुत्व है जो सिखलाता
आओ उन सिरफिरों को समझायें ...
और अधिक मौन न रहा जाये


कहने से है अधिक सही सुनना
सुनने से है अधिक सही गुनना
यह मिथक कुछ यहाँ ढहा जाए...
और अधिक मौन न रहा जाये
बात हटकर कोई कहा जाये


रचियता.....
सुकवि बुधराम यादव
बिलासपुर