Sunday, October 26, 2008

गीत तुम्हारे लिए मैं गा रहा हूँ ...

गीत तुम्हारे लिए मैं गा रहा हूँ
तुम सुनो या न सुनो मेरे साथी
मन की व्यथाएं तुम्हें सुना रहा हूँ

भावना की झोली में संजोयी हुई
उम्र भर की सारी उपलब्धियां
वेदनाएं शब्दों में ढलती हुई
पा रही हैं मुखर अभिव्यक्तियाँ
यूँ ठगे से क्यूँ खड़े हो राह में .....
चाहो तो बटोर लो लुटा रहा हूँ
गीत तुम्हारे लिए..........

चुरा गई उम्र का प्रभात कोई
शाम की सुनहरी सी लालिमा
यौवन की दहकती दोपहरी को
घेर रही निष्ठुर सी कालिमा
निशा का स्वरूप सच नहीं मालूम ......
घोर तिमिर को गले लगा रहा हूँ
गीत तुम्हारे लिए..........

कभी लगे गंभीर समुन्दर हूँ
ज्वार कामनाओं की चलती है
और कभी वह स्थिर तट बेबस
लहरें आकर जहाँ मचलती हैं
कब तक संवेदनाओं को पालूं ....
आहत हर पल होते जा रहा हूँ
गीत तुम्हारे लिए..........

कब तलक यूँ ही दर-बदर
अर्थहीन संज्ञा को पूजते
अपनी विवशता बयां करूँ साथी
हार रहा हूँ ख़ुद से जूझते
डर है मुझे तुम कहीं न खो जाओ ....
इसलिए अपना पता बता रहा हूँ
गीत तुम्हारे लिए..........

रचयिता .....
सुकवि बुधराम यादव

Thursday, October 23, 2008

ब्रेन मेपिंग और नार्को टेस्ट....!!!

.............................देश के अग्रणी मानसिक स्वास्थ्य संस्थान "नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस" के निदेशक की अगुआई में बनी विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की छः सदस्यीय कमेटी ने ब्रेन मेपिंग के सन्दर्भ में अपने जिन निष्कर्षों का खुलासा किया है, वह काफी अहमियत रखते हैं......आइये देखते आज के समय में सर्वाधिक चर्चित टेस्ट की हकीक़त और फ़साना क्या है..!!!..............................उपरोक्त कमेटी में देश के अन्य अग्रणी संस्थानों के बिहेविरियल एंड कोगनिटिव साइंस, साइको फार्माकोलाजी, साइकिआत्री, फोरेंसिक साइंस जैसे अहम् विषयों के जानकार शामिल थे, जिन्होंने ब्रेन मेपिंग के बारे में अपने अध्ययन को अंजाम दिया. सभी जानते हैं कि आपराधिक घटनाओं में या आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्तता की पड़ताल करने के लिए इन दिनों नार्को परीक्षण के साथ-साथ ब्रेन मेपिंग परीक्षण का बोलबाला भी बढ़ा है. ब्रेन मेपिंग में अभियुक्त को कंप्यूटर से जुडा एक हेलमेट पहनाया जाता है. जिसमें कई सेंसर और इलेक्ट्रोनिक उपकरण लगे होते हैं. फ़िर जाँच अधिकारी एवम फोरेंसिक विशेषज्ञ की मौजूदगी में उसे अपराध से जुड़ी तस्वीरें दिखाई जाती है. इसे देखकर अभियुक्त के दिमाग में उठी हलचलों की इलेक्ट्रिकल फिजिओलाजिकल गतिविधियों का विश्लेषण किया जाता है. अपराध विज्ञान में उपकरण के तौर पर काम करने के लिए एक ऐसी प्रक्रिया की जरुरत होती है जिसमें ग़लत होने की संभावना समाहित हो. बंगलौर और गांधीनगर आदि स्थानों पर जहाँ यह परीक्षण किया जाता है, क्या वहाँ इस कारक को मद्देनजर रखा गया है ?
................................वैसे सिर्फ़ ब्रेन मेपिंग नहीं अपितु नार्को टेस्ट की वैज्ञानिकता पर भी बहुत पहले सवाल खड़े किए जा चुके है. यह जानना भी दिलचस्प है कि अपने यहाँ भले ही नार्को टेस्ट लोगों को नया नजर आता हो, विकसित देशों में तो वह वर्ष 1922 में मुख्यधारा का हिस्सा बना था जब राबर्ट हाउस नामक टेक्सास के डॉक्टर ने स्कोपोलामिन नामक ड्रग का दो कैदियों पर प्रयोग किया था. दरअसल नार्को एनालिसिस टेस्ट एक फोरेंसिक टेस्ट है, जिसे टेस्ट जाँच अधिकारी, मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर और फोरेंसिक एक्सपर्ट की मौजूदगी में अंजाम दिया जाता है. इसमे संदिग्ध व्यक्ति को सोडियम पेंताथेल नामक केमिकल का इंजेक्शन दिया जाता है. जिससे न केवल वह अर्ध बेहोशी की हालत में चला जाता है बल्कि उसकी तर्क बुद्धि / रिजिनिंग भी ख़तम हो जाती है. और फ़िर उससे सवाल पूछ कर जानकारी उगलवाई जाती है. वह व्यक्ति जो एक तरह से सम्मोहन अवस्था में चला जाता है वह अपनी तरफ़ से ज्यादा कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होता बल्कि पूछे गए कुछ सवालों के बारे में कुछ बता सकता है. जो लोग यह मानते है कि नार्को टेस्ट में व्यक्ति हमेशा सच ही उगलता है, दरअसल उस अवस्था में भी वह झूठ बोल सकता है, विशेषज्ञों को भरमा सकता है.
................................जहाँ विकसित दुनिया के बाकी हिस्सों ने ऐसे टेस्ट को इन्वेस्टीगेशन से मुख्य रूप से पृथक कर दिया हो, ज्यादातर डेमोक्रेट दुनिया जिनमे अमेरिका और ब्रिटेन भी शामिल हैं, वहाँ ऐसे टेस्ट कुछ समय से लुप्त प्राय जैसे हैं जबकि हमारे देश में ऐसे टेस्ट की लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है. किसी अपराध के संदिग्ध को पकड़ते ही लोग उसके नार्को टेस्ट की मांग करने लगते हैं कि इनका अगर नार्को टेस्ट हो जाए तो सच्चाई उगल ही देंगे. संविधान का एक अहम् तत्त्व है article - 20[3] जो कहता है कि "किसी व्यक्ति को जिस पर कोई आरोप लगे हैं, उसे अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा." अगर नार्को टेस्ट की बुनियादी अंतर्वस्तु को समझाने की कोशिश करेंगे तो इसके जरिये व्यक्ति को एक तरह से अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की संभावना रहती है. लेकिन विगत कुछ निर्णयों में माननीय न्यायालयों के द्वारा टेस्ट के पक्ष में मत दिया गया है.

.................................इसमें कोई दो राय नहीं कि नार्को टेस्ट में कोई व्यक्ति कुछ भी प्रलाप करे या कबूल करे. अपराध को साबित करने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता होती ही है . टेस्ट से प्राप्त जानकारी को विवेचना में अन्य सूत्रों से कोरोबोरेट करने और सुसंगत बनाने के लिए उपयोग किया जाता रहा है. अभियुक्त को दवा पिलाकर उससे जानकारी लेने की इस कोशिश को चेन्नई एवम मुंबई हाईकोर्ट ने "यातना के श्रेणी" में रखने से मना किया और ऐसा तर्क दिया कि अभियुक्त को भले ही उसकी इच्छा के विरुद्ध प्रयोगशाला में ले जाया जाए, लेकिन टेस्ट के दौरान वह जो बात प्रगट करे, वे स्वैच्छिक हो सकती है. .................................वर्ष 2000 में तत्कालीन सरकार की सदारत में आपराधिक न्याय प्रणाली को सुधारने के लिए जो मलिमथ कमेटी बनी थी उसके जरिये कानून में सकारात्मक परिवर्तन की यही कोशिश हम देख सकते है. दरअसल नार्को टेस्ट को लेकर अमेरिकी गुप्तचर एजेन्सी सीआईए, जिसने शीत युद्ध के दौर में इसे आजमाकर सच उगलवाने की खूब कोशिश की थी, के अनुभव बहुत उत्साहजनक नहीं थे. उपरोक्त कमेटी ने भी अपने अध्ययन में इन नार्को टेस्ट को लेकर अवैज्ञानिक और सबूतों के तौर पर इस्तेमाल पर रोक लगाने की अनुसंशा की है. अतएव मामला अब कानून निर्माता सरकार, इन्वेस्टीगेशन एजेन्सी और न्यायालय के बीच है.....कि इस चर्चित अपराध अनुसंधान परीक्षण को किस रूप में उपयोगी बनाये रखा जाये.

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Tuesday, October 21, 2008

शहीद पुलिस

शायद शीर्षक पढ़कर अनेक लोगों को विश्वास ही नहीं होगा....होना भी नहीं चाहिए. ये तो 21 अक्टूबर "शहीद दिवस" हर साल मनाते हैं, इसलिए 'पुलिस' के साथ 'शहीद' लिख दिया.


पुलिस शहीद हो नहीं सकती, कैसे होगी जो समाज में व्याप्त सभी बुराइयों से वास्ता रखती है. उसके मृत्यु को शहीद का दर्जा दे भी तो कैसे.....???

@ जो भर्ती तो करती है ऊंचे आदर्शों और मानदंडों के साथ लेकिन यह छूट जातें हैं... प्रशिक्षण काल में ही.
@ जो अभी भी उन्हीं प्रशिक्षण तकनीक और उपकरणों को उपयोग कर जवान तैयार कर रही है जो वर्षों पहले [ जिसे तकियाकलाम में अंग्रेज जमाना या 1865 माडल कहतें हैं ] नकार दिए गये हैं.
@ जिस एजेन्सी की संख्या बल रोज बढती जनसंख्या और अपराध के अनुपात में हास्यास्पद अंक यथा नगण्य तक है. [ पुलिस में अक्सर इसे हौसला अफजाई के जुमले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है कि एक सिपाही पूरे गाँव को हड़का आएगा और एक थानेदार अपने इलाके का मालिक होता है ] पर अब हकीकत क्या है, चैतन्य होती जनता संग अपराधी समझने लगी है.
@ जो सूचना देने पर [ ख़ुद से पाने पर नहीं भई ] भी अपने आधुनिक वेशभूषा, वाहन, उपकरण और अस्त्र-शस्त्र के साथ घटना स्थल पर सायरन बजाते मुंबई फिल्मों की तरह नाटकीय रूप से कई घंटों बाद पहुंचती है.
@ जो बिना अपशब्द के बात और बिना तरलता के काम नहीं करती है.
@ जो आम से दूर होकर सदैव ख़ास के पास की ड्यूटी करती है.@ जो 24 घंटे में कोई काम के घंटे तय न होने पर भी लगातार ड्यूटी करती है.
@ जिसमें एक ही जवान सफ़ेद वस्त्रधारियों की सुरक्षा, अपराध विवेचना, पतासाजी, धर पकड़ से लेकर मण्डी-मेले और ट्रैफिक की व्यवस्था सब में पारंगत होने जैसे कर लेता हो.
@ जो भ्रष्टाचार के इंडेक्स में 17 वें क्रमांक पर है, [ पहले 16 के बारे में आपको मालुम होगा, शायद..? ]
@ जिसके काम करने पर कभी-कभार यह कह दिया जाता है, कि ठीक है !!! यह तो उसका काम ही है. और बिगड़ने पर दूसरों की अकर्मण्यता का ठीकरा भी अक्सर उस पर ही फूटता हो.
@ जिसके फील्ड पर ड्यूटी करने वाले 55-60 साल के कांस्टेबल/ हेड कांस्टेबल भी जवान कहलाते हैं. सो काम भी जवानों की तरह करने पड़ते हैं.
@ जिसके 80 प्रतिशत कार्यकारी एवं पर्यवेक्षण अधिकारी अभी भी कंप्यूटर निरक्षर हैं. इस पर अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रम और नए पुलिस उपयोगी सॉफ्टवेर उपयोग कर हार जाने के बाद.
@ जिससे हम अनुशासित भारतीय नागरिकों के बीच कार्य करते हुए सदभावना, सद्व्यहार और दयालुता की उम्मीद हमेशा पश्चिमी पुलिस की क्षमता और तत्परता के साथ की जाती है. [ एक प्रसंग : एक.....ट्रैफिक पुलिस ने एक बाइक सवार को वाहन के आवश्यक कागजात चेक करने को रोका, वह बड़ी हिकारत वाली मुद्रा बनाकर रुका क्योंकि अन्य लोग भी रोके जा रहे थे, फ़िर उसने आवश्यक जांच से पहले ही अपने सेल फोन से किसी को कॉल मिलाकर पुलिस को पकड़ा दिया,... पुलिस वाला खीसें निपोर कर तत्काल उसे जाने के लिए कहता है....| दूसरा....फ़िर भी दस्तावेज चेक कर 50/- रुपये जुर्माना राशि जमा करने कहता है, किंतु वह बाइक सवार विशेष नागरिक अपने सेल फोन का लगभग 100/- कई विशेषाधिकारियों को फोन लगाने में खर्च कर बिना जुर्माने की रकम अदा किए वहाँ से जाने में सफल हो जाता है.]
@ जिसके पास कानूनी अधिकार ही होता है, क्योंकि वह जिनके लिए काम करती है, केवल उनका मानव अधिकार होता है.

अरे कहाँ भूल-भुलैया में रह गया .........!!!!
फ़िर भी इस वर्ष- 2007-2008 के दौरान एक वर्ष की अवधि में 3000 से अधिक पुलिस जवान शहीद * हुए. जिनकी याद-सम्मान में आज 21 अक्टूबर को पुलिस शहीद दिवस मानती है. आखिर क्यों ? और क्यों ?......????
{ *शहीद-- याने की ड्यूटी के दौरान अपने कर्तव्य निभाते मृत्यु. }
उन सभी कर्तव्यनिष्ठ जांबांज शहीद पुलिस को मेरा सादर नमन....सेल्यूट .<