Thursday, March 17, 2011

कद नहीं बढ़ता कभी परछाईयों के साथ



बढ़ गयी शोहरत मेरी, रुसवाइयों के साथ |
कद नहीं बढ़ता कभी, परछाईयों के साथ ||

लोग सुनते हैं मगर दिखता नहीं सबको 
अश्क़ शामिल हैं मेरे शहनाइयों के साथ 

ये नहीं उजड़ी फ़कत मैं भी तो उजड़ा हूँ 
एक रिश्ता है मेरा अमराइयों के साथ 

महफ़िलों में आपको ज़िल्लत उठानी है 
मैं तो जी लूँगा मेरी तनहाइयों के साथ 

मैं अजन्ता की रवायत देख लूं फिर से 
एक दिन आ जाइये अंगडाईयों के साथ 

प्रमोद रामावत "प्रमोद"

Wednesday, February 23, 2011

एक शातिर मुल्क़ भर का सब मुनाफ़ा खा गया

प्रमोद रामावत "प्रमोद"
परिचय.......
जन्म- 5 मई 1949     शिक्षा- विधि स्नातक  
सम्प्रति- उप सम्पादक "अमृत मंथन दैनिक", जन संपर्क अधिकारी
प्रकाशन- मेरी अधूरी अमरनाथ यात्रा[ यात्रा वृत्तांत ], सोने का पिंजरा [ गजल संग्रह ] 
संपर्क- 09424097155 
प्रमोद रामावत जी की "सोने का पिंजरा" ग़जल विधा पर अद्भुत संग्रह है. एक-एक शेर इतना पुरअसर लिये है कि बस लगता है इससे बेहतर क्या. कोई ऐसा मुद्दा नहीं जो प्रमोद जी ने अपने अनूठे अंदाज में छुआ न हो. उसी नायाब ख़जाने से एक ग़जल प्रस्तुत है. 




बस्तियां जिनमें अमीरों को ख़ुदा समझा गया 
क्यों ग़रीबों को वहाँ, एक बददुआ समझा गया |

आबरू के मोल पर जो बांटता था रोटियाँ 
बस वही भूखे शहर में, देवता समझा गया |

सब उसूलों को कुचलकर कुर्सियों तक जो गया 
इस सदी में बस उसी को, रास्ता समझा गया |

छोड़ कर सिक्के सुनहरे मैं बचा लाया ज़मीर 
लो मुझे अपने ही घर में सरफ़िरा समझा गया |

एक शातिर मुल्क़ भर का सब मुनाफ़ा खा गया 
क्या ग़जब है बस इसे इक हादसा समझा गया |

बह गई आसाईशें सब जन्मदर की बाढ़ में 
और इन पैदाइशों को ख़ुशनुमा समझा गया |

आदमी की ज़िन्दगी है , दर्द में डूबी ग़जल 
आसुओं को इस ग़जल का काफ़िया समझा गया |

Saturday, December 18, 2010

पंख होने से कुछ नहीं होता...



प्रमोद रामावत "प्रमोद"
परिचय.......
जन्म- 5 मई 1949     शिक्षा- विधि स्नातक  
सम्प्रति- उप सम्पादक "अमृत मंथन दैनिक", जन संपर्क अधिकारी
प्रकाशन- मेरी अधूरी अमरनाथ यात्रा[ यात्रा वृत्तांत ], सोने का पिंजरा [ गजल संग्रह ]
संपर्क- 09424097155
प्रमोद जी नीमच मालवा अंचल के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं और अपनी रचनाओं से न केवल साहित्य प्रेमियों अपितु आम जन को भी अपना रसिक बना लिया है. प्रमोद जी की पंक्तियाँ बिना किसी लाग लपेट के सीधे दिल से दिल को पहुँचती है. वे जितनी सहजता से कार्यक्रमों का संचालन करते हैं उतनी ही सरलता से सबसे घुलमिल भी जाते हैं. उनके स्नेह से अभिभूत मैं, उनकी कुछ मेरी पसंद की पंक्तियाँ आप सबसे बाँट रहा हूँ.  



 मुझको यही जमीं यही आसमान मिले
मरकर दोबारा आऊं तो हिंदी जुबां मिले
दुनिया बहुत बड़ी है, मगर मुझको इससे क्या ?
जब भी वतन मिले यही हिन्दोस्तां मिले |

उम्र भर एक दर्दों ग़म का सिलसिला चलता रहा
जिंदगी से कुछ कदम का फासला चलता रहा
साथ कुछ रिश्ते लिए हम थे सफ़र पर उम्र के
राह भर लुटते रहे, यूँ ही काफ़िला चलता रहा |

हंसते हैं न रोते हैं, ये सब बर्फ़ीले चेहरे हैं
इनकी मुस्काने गिरवी हैं, आँसू पर भी पहरे हैं
शंख, अजाने, कथा, नगाड़े, कितने वहम रिवाज़ों के
उनकी बस्ती का क्या होगा, जिनके आक़ा बहरे हैं

हर सुबह यह खून में भीगा हुआ अखबार क्यों ?
रौशनी के नाम पर अंधियारे का व्यापार क्यों ?
जिंदगी को लीलती बेदर्द आतिशबाजियां
यह ख़ुशी के नाम पर सहमा हुआ त्यौहार क्यों ?

मंजिले भी उन्ही को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है
पंख होने से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है
हम कोई भी पता लिखें उस पर, ख़त को कब ऐतराज होता है
अनलिखा ख़त ही मान लें उसको बेटी तो बेजुबान होती है |

और अंत में एक ....अशआर..
एक भाषा है जो सारे मुल्क़ को मंजूर है 
आप रिश्वत की जुबां में बात करके देखिये |