Tuesday, May 17, 2011

गाँव कहाँ सोरियावत हे .. भाग-4

सुकवि बुधराम यादव की लम्बी कविता "गाँव कहाँ सोरियावत हे" की अगली कड़ी भाग- 4 के रूप में प्रस्तुत है. घंघरा -घुघरू, घुम्‍मर-घांटी  को आधार बनाकर कवि ने गाँव को किस तरह स्मरण किया है..देखते ही बनता है.



घंघरा -घुघरू, घुम्‍मर-घांटी

सुरता आथे सुखरा डोकरा
सन के  गुढुवा* आँटत ढेरा*!
मचिया बइठे चोंगी पीयत
माखुर थैली धर पठेरा*!
दू आखर गावय बांस गीत
अउ चार आखर लोरिक  चंदा!

                                                               अइसन गावत नाती नतुरा ल
अरखावत सुार बीच बीच
हे मया मोह जवर फंदा!
कउन आज भुरियावत* हे!

आँखी समुंहे म आ जाथे
संझवती गरूवारी बेरा!
चिरइ चिरगुन के  चहचहाब
चर चहक त जावब बसेरा!
बेंदरा भलुवा संग मदारी
देवार भड्डरी के  डेरा!
झंपुली भर साँप धरे लहुटब
हंफरत गठरी धर सपेरा!
नंदी बैला डमरू धुन
अब कहाँ कहुं बौरावत हें !

घुघरू कौड़ी रिग बिग सोहय
गर म टिकली* अउ बलही* के !
रूनझुन बाजय पैरी खनकय
जइसे टूरी मलमलही* के !
गोड़ म गोड़ायत* गर लहंगर*
खडफ़ड़ी* बंधाये हरही* के !
तभो छिनभर न रीत* रहय
मुंह गोड़ ह जबर लपरही* के !
छइहाँ बिन अब तो बरदिहा*
बरदी ल नइ ठोरियावत* हें!

घंघरा  घुघरू घुम्‍मर घांटी
गरूवारी* बेरा जब बाजंय!
बंसुरी के  धुन म ,वाल बाल
जइसे सब लइका  मन नाचय!
बुड़ती बेरा ललहूं सुरूज के
लाल किरन जब धुर्रावय!
चरवाहा मन के  चेहरा चुपरे
राम राज जइसे भावय!
सिरमिट गिट्टी के  खोर गली
अब धुर्रा कहाँ उड़ावत हें!

रभावत दौडय़ रामबती अउ
हुंक रत आवय परबतिया!
गंगाजल भोजली के  संग म
तरिया बर जावय दुरपतिया!
लीपे पोते अंगना डेहरी म
चौक  पूरय जब क रमौतिन!
तुलसी चौरा अन्न के  कोठी
ल दीया देखावय अमरौतिन!
अब ऊवत अंगन बटोरब
बूड़त दीयना देब भुलावत हें!

अब हाथ हाथ भर के  मुनगा
अउ गज भर लमा परोड़ा!
देहे बर नइ आवय पूछत
दीदी मयारूक  मनटोरा!
गन्ना रस लोटा भर पीले
खाले जी भर गुड़ के  भेली!
अब अंतस ले  घनवारा* म
हे क उन कहइया बरपेली* !
अपरिधहा* होवत जावत हें
अउ मनमाने पगुरावत हें!

ओ हटवारा के  बर पीपर
अउ ठाकुर दइया के  गस्ती!
ओ तरिया पार के  बेल पेड़
डूमर बोहार बस्ती बस्ती!
बिही बगइचा सीता फल
अउ आम जाम कांदा बारी!
ओ धाप धाप* भर अमरइया
के  छाँव परागय संगवारी!
अमहा जमहा अउ पिपरहा
सब ठौर के  नाव नदावत* हें!


*हिन्‍दी अरथ - गुढुवा : लकड़ी में गूँथा हुआ रस्सी का ढेर, ढेरा : हाथ से गूँथे रस्सी के  ढीलेपन को बल देने हेतु लकड़ी या धातु का उपकरण, पठेरा : मिट्टी की दीवाल में छोटे-मोटे सामान रखने या दीया-चिमनी रखने हेतु बनाई गयी जगह, भुरियावत : लोरी गाकर सुनाया या पुचकारना, टिकली : माथे या शरीर के  अन्‍य भाग में मौलिक  रंग के अतिरिक्त छोटी-छोटी बिंदी जैसे छींटें,  बलही :  जिसका  हल्का  लाल-पीला रंग हो,  गोड़ायत : अत्‍यधिक चंचल युवती, गर लहंगर : भगेड़ू जानवर के  पैर में बाँधा जाने वाला लकड़ी का  टुकड़ा,  खडफ़ड़ी : अधिक  भगेड़ू जानवर के  गले में लटकाया गया लकड़ी का मोटा एवं चार-पांच फीट टुकड़ा,  हरही : जानवर के  गले में बाँधने लक ड़ी से बनी घंटी,   हरही :  नजर चुराकर खेत खलिहानो में बारंबार जाने वाली गाय, रीत : खाली या रिक्त,  लपरही :  मुँह मारने वाली, बरदिहा :  किसानों के  गाय-बैल चरवाहा,  ठोरियावत : इकट्ठा करना,  गरूवारी : गोधूलि बेला, घनवारा : गन्ने के  खेत में स्थापित गुड़ बनाने हेतु चरखे की  जगह, बरपेली : बरबस आग्रह,  अपरिधहा : अपने लिये सोचने वाले या स्‍त्री,    धाप :  लगभग मील भर की  दूरी, नंदावत : विलुप्त होना

कवि परिचय
बुधराम यादव
जनम : 3मई १९४६ 
जनम स्थान : ग्राम पंचायत -खैरवार खुर्द, जिला -बिलासपुर
माता : पूजनीय स्व. ढेलादेवी यादव
पिता : पूज्यवर श्री भोंदूराम यादव
शिक्षा : पत्रोपाधि सिविल अभियांत्रिकी
लेखन : सन् 1965 ले छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी म गीत, कविता अउ लेख
परसारन : आकाशवाणी रायपुर, बिलासपुर सहित दूरदर्शन बिलासपुर ले समे-समे म परसारन
डॉ. अजय पाठक के हिन्‍दी गीत संग्रह ‘बूढ़े हुए कबीर’ के छत्‍तीसगढ़ी अनुवाद ‘डोकरा भईन कबीर’
परकासित होवइया : हिन्दी `दोहा संग्रह' -` मन मतंग बूझे नहीं', हिन्दी -गीत-कविता संग्रह - `पाने को अमरत्व'
संपादन : छत्तीसगढ़ी इंटरनेट ब्लॉग पतरिका `गुरतुर गोठ' के वरिष्ठ संपादक, `छत्तीसगढ़ी चैनल' स्मारिका 2010 के संपादक
परकासित कृति : `अॅचरा के मया '' 2001
वर्तमान म : छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति जिला शाखा बिलासपुर के अध्यक्ष
सेवा निबरित सिविल अभियंता
संपरक : `मनोरथ' एमआईजी ए/8,चंदेलानगर, रिंगरोड नं.2, बिलासपुर (छ.ग.) मोबाइल : 09755141676  



Friday, April 29, 2011

गाँव कहाँ सोरियावत हें..भाग-3

इस अंक में गाँव कहाँ सोरियावत हें से सुकवि बुधराम यादव की लम्बी कविता का प्रथम भाग प्रस्तुत है. छत्तीसगढ़ी के सुधि पाठकों के लिए कुछ शब्दों के हिंदी अर्थ को भी इस भाग के अंत में स्थान दिया गया है ताकि कविता का पूरे भाव से रसास्वादन किया जाए.


गठरी सब छरियावत हें

देखते देखत अब गांव गियाँ
सब शहर कती ओरियावत हें!
कलपत कोयली बिलपत मैना
मोर गाँव कहाँ सोरियावत हें!
ओ सुवा ददरिया करमा अउ
फागुन के  फाग नंदावत हे
ओ चंदैनी ढोला-मारू
भरथरी भजन बिसरांवत हे!


 डोकरी दाई के  जनउला*
कहनी किस्सा आनी बानी!
ओ सुखवंतिन के  चौरा अउ
आल्हा रमायन पंडवानी!
तरिया नदिया कुंवाँ बवली के
पानी असन अटावत हें!

सुकुवा* ऊवत नींद भर रतिहा
अउ कुकरा बासत भिनसरहा
अब पनिहारिन गगरी* मांजय
न बहरी बाजय मुंधियरहा*!
उठ नवा बहुरिया घर लीपय
 न गोबर हेरंय लछमैतीन !
ढेंकी* मूसर के  आरो तो
बिन सूने गुजर गय कइयो दिन!
अब खोर गली छर्रा-छिटका*
न अंगना गोबर लिपावत हे!

अमली-चटनी आमा-चानी
भाटा-खोइला* सुकसा-भाजी*!
बंडी पोलखा के  लेन देन
ओ हाट-बाट खउवा-खाजी!
बर पीपर पिकरी* चार जाम
बन बोइर तेंदू अउ औंरा!
चर्रा गिल्ली डंडा फुगड़ी
सब बिसरागंय बांटी भौंरा!
अब नवा जिनिस मन ऊपरागंय
जुन्ना* जमो तरियावत* हें!

अब अधरतिहा दौंरी फांदय
न पंगपंगात* नागर साजंय
जतवा* कहुं बाजय घरर घरर
न दही मथावय घमर घमर!
पहुना परमेसर नइ मानय
गीता रमायन नइ जानय!
न किंजरय फेरी गली गली
न सरेखंय अब हली भली !
जुग भर के  जोरे मया पिरीत
के  गठरी सब छरियावत हे!

ओ खेतवरिया के  रूखुवा म
रेरा चिरइया के  खोंधरा*!
रूंधे बांधे बारी बखरी
पाके  सुार जोंधरी जोंधरा!
ओ हरेली के  गेंड़ी अउ
पोरा के  नंदी जंतुलिया!
बिहाव के  सिंघहा-झांपी* अउ
नोनी के  नानुक  झंपुलिया*
करसा करी के  लाड़ू संग
अब बतासा बिसरावत हें!

ओ तरिया तीर नदिया खंड़ म
कुहक त फुदकत बइठे कोयली!
ओ घाघर तितुर के  तुर तुर
अउ मैना के  अइंठे बोली!
पड़की  के  घुटरब* घुटुर घुटुर
अउ कठखोलवा के  खटर खटर!
खंचवा* कस आँखी खुसरा के
घुवा के  बड़का  बटर बटर!
ओसरी पारी सब गाँव छोड़
डोंगरी पहरी बर जावत हें!

भूखन घर बाबू के  छट्ठी
दुखिया घर के  ओ अतमैती* !
बर पीपर अउ लीम छइहाँ तरि
गुड़ी म बइठे पंचयती!
उन पंच कहाँ परमेसर कस
अब तो बछवा कस अदरा* हें।
कहे बर छांटे-निमेरे
पन सिरतो बदरा-बदरा हें!
लरहा मरहा तक  पद पाके
रतिहा भर म हरियावत हें!

अब मरघटिया अउ गौचर का
धरसा* म धांन बोवावत हे!
गउठान बिना कोठा भीतर
गरूवा बछरू बोमियावत* हें!
जेती देखव बेजा कब्‍जा
रस्ता अउ डगर छेंकाये हें।
सब पाप पोटारे बइठे हें
पुन कौंड़ी असन फेंकाये हें!
लोटा धर बाहिर जाये बर
माई मन बड़ सकुचावत हें!

जुन्ना दइहनही म जब ले
दारूभट्ठी होटल खुलगे!
टूरा टनका  मन बहकत हें
सब चाल चरित्‍तर  ल भुलगें!
मुख दरवाजा म लिखाये
हावय पंचयती राज जिहाँ।
चतवारे* खातिर चतुरा मन
नइ आवत हावंय बाज उहाँ!
गुरतुर भाखा सपना हो गय
सब कॉंव कॉंव नरियावत हें!

*हिन्‍दी अरथ - जनउला : पहेली बुझाना,  सुकुवा : शुक्रतारा,  गघरी : पानी का घड़ा,  मुंधरिहा : भोर का  समय,  ढेंकी : पैर से अनाज कूटने हेतु लकड़ी का  उपकरण,  छर्रा-छिटका : छिड़कना,  भांटा-खोइला : धूप में सुखाए गए कटे हुए भटे के  टुकड़े,  सुकसा-भाजी : धूप में सुखाई गई चना,तिवरा,गोभी आदि की  भाजी,  पिकरी : पीपल का  फल, जुन्‍ना : पुराना, तरियावत : नीचे होना, पंगपगांत : सूर्योदय पूर्व, जतवा : कोदो दलने हेतु मिट्टी की बड़ी चकिया,  खोंधरा : घोंसला,  झांपी : शादी में कन्‍या पक्ष की  ओर से वर पक्ष को सगुन के  सामान भरकर दिये जाने वाला बाँस से निर्मित ढक्कन सहित बड़ा टोकना,  झपुलिया : ढक्‍कन वाली बाँस की विशिष्ट टोकरी,  घुटरब : आवाज निकालना,   खंचवा : गड्ढा,  अतमैती : मृत्‍युभोज, अदरा : नवसिखिया, धरसा : गाँव में निस्तार हेतु बैल गाडिय़ों एवं जानवरों के आने-जाने के  लिए छोड़ा गया चौड़ा रास्ता,  बोमियावत : अधीरता से आवाज निकालना,  चतवारे : साफ करना

Thursday, April 28, 2011

गाँव कहाँ सोरियावत हें..भाग-२


खंडकाव्य "गाँव कहाँ सोरियावत हें"... के दूसरे भाग में प्रस्तुत है कृति के रचियता सुकवि बुधराम यादव का स्वयं इस इस कृति रचना पर विचार 

चार आखर

सत ले बड़े धरम, परमारथ ले बड़े करम, धरती बड़े सरग अउ मनुख ले बड़े चतुरा भला कउन हे । संसारी जमो जीव मन म सुख अउ सांति के सार मरम अउ जतन ल मनखे के अलावा समंगल कउनो आने नइ जानय । तभो ले बिरथा मिरिगतिस्ना म फंसे कइयन मनखे फोकटिहा ठग-फुसारी, चारी-चुगरी, झूठ-लबारी,लोभ-लंगड़, लूटा-पुदगी, भागा-भागी,मारा-मारी के पीछू हलाकान, हाँव-हाँव अउ काँव-काँव म जिनगी ल डारे कउआत रथें । सब जानत अउ सुनत हें संतोस ले बड़े दौलत अउ कउनो नइ हे, तभे तो निरजन बीहर, डोंगरी-पहरी म घलव रहिके मनखे डब-डब ले सुख अउ सांति म भरे रथें । दूसर कति महल अटारी,सोन-चांदी, घोड़ा-गाड़ी, सेज-सुपेती के बीच परे मनखे असकटावत अउ छटपटावत रथें ।

जब मनखे सिरिफ अपनेच बाहिर देस-दुनिया के बिस्तार करे के नाव म अपन असली जर अउ जमीन ले दुरिहाये लगथे ओला बिसराये लगथे अउ सरग बर गोड़ लमाये के जतन करे लगथे तव ये खचित जानव के ओ ह रावन कस अपन सोनहा लंका के बिनास कराय के उदिम करे लगथे । तभे तो ये ह सोरा आना सच लगथे के-

डार के चुके बेंदरा - मउका चुके किसान ।
मूर ले चुके जीव के -कहां भला कइलान ।

उत्तम साहित्य के सिरजइया न अगास म बसंय, न अगास के उन बात कहंय । येेही संसार म रहिके चारो कति बगरे जिनगी अउ दुनिया के संग ओकर नता-गोता के हियाव करथें । येकर खातिर उनला बरोबर लोकाचार,लोक -बेवहार अउ लोक के हिरदे के धड़कब घलव ल चेत लगा के सुने अउ जाने परथे । इंकर बिसय म कुछ लिखब घलव ह निचट सहज नोहय । ये ह कांटा-खुंटी, उरभट-खुरभट, चिखला-कांदो,पानी-पूरा अउ आगी-अंगरा म चलब कस जनव कठिन बुता आय ।

`गाँव कहाँ सोरियावत हें' सीरसक के कविता म कोइली के कलपब अउ मैना के बिलपब ह कवि के बिरथा सबदजाल गढ़ब नोहय । समे, समे के बदलाव ओकर सरूप अउ ओकर परभाव के अंदरोनी जियान के ये ह परगट परमान आय । `सोरियावब' सबद ह सफा-सफा कुछ भुलाये-बिसराये, लुकाये-छुपाये अउ नंदाये-गंवाये जिनिस के खोज खबर लेहे कति संकेत करथे । आज हमर सबके समुंहे ये सवाल खड़े हे के का गाँव सिरतों गंवावत हें ? बस ! ये सवाल के जवाब अउ निरनय के संग एकर असली समाधान सरेखे के परयास अउ उदिम करे के बिनती संग ए कविता किताब गुनवान, बिद्वान,पढ़इया, समझइया मन के हाथ सउंपत हावंव । ये आस म के इन चार लकीर के मरम खातिर घलव बिचार करहीं -

देस के जम्मो गांव म-जउन घटत हें रोज
अवइया दिन बर करहीं-चतुरा सबके खोज ।
रहब बसब करनी-कथनी- नेम-धेम अउ न्याव
सत-इमान मरजाद बिन- गाँव कहां के गाँव ?

संसार कागद के पुड़िया ये, माटी के ढेला ये, लइकन के घरघुंदिया ये अइसनहे अउ कतको पटंतर हवंय एकर सिरजब अउ बिनास बर, बनब अउ बदलाव बर । तभे तो घुरुवा ह मंदिर, मरघट ह महल अउ पहार घलव ह खोधरा म देखते देखत लहुट जाथे । येही ह तो ये दुनिया के परकीरति आय । कथें के -
जेकर जरय भांटा - तउन रितोवय पानी ।

किताब के भूमिका के `गाँव रहे ले दुनिया रइही' म परसिद्ध भासाबिग्यानी डॉ. चित्तरंजनकर जी लिखे हावंय के `हमर सभयता के नांव खा-पीके,जीके नइ धराय हे । ओ ह सबके सुख म सुखी अउ सबके दुख म दुखी होय के नाव आय ।' ऊपर लिखे हाना के सगरी मरम जनव उंकर ये गोठ म समाये हावय । हमर भारत भुंइया गांव-गंवई के देस आय, 75 ले 80 सैकड़ा तक मनखे 6 लाख 35  हजार ले जादा गांव बस्ती म रहिके बयपार,बनी-भुती कइ आने उदिम अउ खेती-खार करत जिनगी पहावत हें । पन नवा जमाना अउ देस दुनिया के परभाव म उन अपन असली जर ले दुरिहावत हें, ओला बिसरावत हें । अइसन काबर ? देखब म लगथे के अब-

गाँव रहंय न गाँव-जिहां - सुमता के डेरा होय
सत-इमान अउ रीत-नीत के - निसदिन फेरा होय ।

साहित्य के सबले बड़े बुता आय देस-दुनिया समाज अउ मनुख ल जगावब, चेतावब, बतावब अउ डहर देखावब । इहां बिलग-बिलग परसंग म आनी-बानी के बिसय अउ उंकर चरचा ल सबद म ढारे के बरोबर जतन होय हावय । तभो ले संपूरन अउ समंगल कहे के परमान देवब ह अपन कमती बुद्धि के बोध करावब होहय । `गाँव कहां सोरियावत हें' कविता के भीतर के जमो बात सिरतो कहंव तव मोर आंखी के परखे अउ कान के ओरखे कस लगथें । हां ! बिसयबस्तु अउ परसंग ल सफा-सफा कहे के बिबसता म कहंु कुछ कम जादा हो सकत हें । सब कुछ गुरतुरहा कहे के जतन म कुछ सिट्ठा,अम्मठ अउ करुकसा होवब घलव ह बिलकुल अकारन नोहय । सबके गुन अउ धरम ल जस के तस निमेर अउ पछिन के चतुरा मन सकेलहीं अउ समोखहीं अइसन पूरा बिसवास हावय ।

जमो साहित्यकार,सुधिजन, बुधिजन अउ गुनिजन मन ले सनमान सहित अनुनय अउ बिनय हावय के `गांव कहां सोरियावत हें ' पढ़ के अपन सोच अउ बिचार ल आसीरबाद के रुप म भेजे के जतन जरुर करहीं । परमहितवा भासाविग्यानी डॉ. चित्तरंजनकर जी के गजब अभारी हवंव जउन `गांव रहे ले दुनिया रइही' सीरसक ले किताब के `भूमिका' लिखे के किरपा करके येकर मोल ल बढ़ाये म सहजोग देवब के उपकार करे हावंय । छेवर म मोर जमो उन अतमा-परतमा, हित-मीत, संगी-जंवरिहा मनके संग बिद्वानन के घलव जबर अभारी हवंव जउन मन पीछू दू बरिख ले `गाँव कहां सोरियावत हें' के रचना बहुत मया अउ दुलार के संग सुनय सराहंय अउ आसीरबाद देवंय । आज किताब सबके हाथ म सउंपत घरी मया दुलार संग आसीरवाद के मन म अउ जादा लालसा बाढ़त हावय ।

एकादसी, कातिक सुक्ल, 2010  
बुधराम यादव