Wednesday, June 1, 2011

"गाँव कहाँ सोरियावत हे" भाग- 7


सुकवि बुधराम यादव की लम्बी कविता "गाँव कहाँ सोरियावत हे" की अगली कड़ी भाग- 7 के रूप में प्रस्तुत है..
दुबराज चांउर के  महमहाब..
इन पंक्तियों में सुकवि गाँव के परिवेश में कृषि, फसल. विश्वास और परम्परा के लोप होते परिदृश्य पर बयान करते हुए .. 

दुबराज चांउर के  महमहाब
बेरा कुबेरा नगरिहा अउ
गड़हा गाड़ी जोतंय!
मसमोटी* म हांक त बैला
गजब ददरिया सोंटय!
पारय टेही संगवारी ह
अउ जुवाब म गावय!
हिरदे के  जमो जियान ल
चतुरा जनव घटावय!
खेतखार का  डगर डगर अब
ट्रक  ट्रेक्‍टर टर्रावत हें!

मिसे कूटे धान पान अउ
ओन्‍हारी संझके रहा!
दौंरी बेलन दूरिहागंय
आ गय ट्रेक्‍टर टेर टेरहा!
मुठिया* डाँड़ी धुरखिल्ली*
सुमेला* सूपा कलारी* !
बावन बख्‍खर कुड़ी* कोपर*
दतरी* नागर जुवाँरी!
नहना* जोता* बरही* का
परचाली* नाव भुलावत हे!

घी राहर दार के  संग सुघ्‍घर
दुबराज चाउँर के  महमहाब!
धनिया मेथी संग नइ रहि गय
गोभी के  तइहा कस रूआब!
भुइंयाँ भर म जहर मिलावत
हे रसायन खातू
साग पान ल घलव चढ़ाथे
सूजी दवाई नाथू !
मनखे बैरी बन गंय अपने
मौत ल अपन बिसावत हें!

गाँव जगावंय बड़कू  बैगा
बरिख दिन म आके  !
ठाकुर दइया महमाई म
बस्ती संग जूरियाके !
पंडऱा बोकरा कर्रा कुकरा
उल्टा पाँख के  कुकरी!
सबके  सेती चाऊँर चबावय
बड़कू  बैगा पोगरी* !
पितर-गोतर देव-धामी अब
वइसन कहाँ मनावत हें।

असली जमो सिरावत हावंय
नकली पाँव पसारंय!
भीतर बगरत हे अंधियारी
ऊपर दियना बारंय !
राचर* फइका  ओठगाके* तब
जहां चहंय चल देवंय !
सुन्ना घर कुरिया के  सरबस
सोर परोसी लेवंय !
आपुस के  बिस्वास जनव अब
पंछी बन उडिय़ावत हें !

घर घुसरके  मारंय पीटंय
जबरन लूटंय खजाना !
बेरा कुबेरा रस्ता बाट के
कहिबे काय ठिकाना !
निचट पराये के  हितवा बन
जाके  तलुवा चाटंय !
भाई भाई ले दुरमत कर
अपने बांह ल काटंय !
जांघ ठोंक  के  बैरी जइसन
अपने ल हुरियावत* हें !

हिंदी अरथ – मुठिया- हल को हथेली से दबाने हेतु लकड़ी का हैंडल, धुरखिल्ली- हल या गाड़ी की मुय डंडी के  सामने सिरे में लगी लकड़ी की कील जिससे हल जुँवारी और गाड़ी डांड़ी बँधी होती है , सुमेला- गाड़ी की  डाँड़ी से जानवर को बाँधने हेतु प्रयुक्त लकड़ी का डंडा, कलारी- फसल की  मिसाई के  समय उलट-पलट,सींचने हेतु लोहा या लकड़ी का उपकरण,  बक्खर- गन्ने की खेत को जोतने वाला बड़ा हल, कुड़ी- गेहँ,चना, मसूर आदि को  कतारबद्घ बोनी क रने हल से जुड़ा भाग, कोपर- जूती गीली जमीन को समतल करने का उपकरण , दतरी- कोदो, अरहर की फसल की गुड़ाई करने लकड़ी का दांतो वाला उपकरण , नहना- हल और जुँवाड़ा को बाँधने वाली चमड़े की डोर, जोता- परचाली, सुमेला से बँधी रस्सी, बरही- चमड़े की  डोर , परचाली- हल की जँवारी में लगी चपटे आकार की लकड़ी, पोगरी- अकेले ही, स्वयं के , राचर- घरों में लगे लक ड़ी के  बत्तों  से बने दरवाजे, जो बोरे, पुराने कपड़े, टीन के  चद्ïदर से ढके  होतें हैं या सिर्फ बोरे से बने होते हैं , ओठगाके-सांकल व ताला के  बिना दरवाजा बंद करना या सटाकर रखना, हुरियावत- लड़ने के लिए ललकारना.


Tuesday, May 24, 2011

"गाँव कहाँ सोरियावत हे" भाग- 6

सुकवि बुधराम यादव की लम्बी कविता "गाँव कहाँ सोरियावत हे" की अगली कड़ी भाग- 6 के रूप में प्रस्तुत है....चाल चरित म कढ़े रहंय. इन पंक्तियों में सुकवि गाँव के परिवेश में धर्म, नीति, न्याय और फैशन के बदलते और दिखावटी रूप पर कटाक्ष करते हुए .. 


चाल चरित म कढ़े रहंय

होये बर होथे गाँव गाँव
की रतन अउ नवाधा रमायन!
सतसंग भागवत कथा  घलव
पन बाहिर कुकुर कटायेन*!
बात बात म ओरझत फिरथें
बिरथा रार बढ़ाथें!
छिन भर म जुग भर के  जोरे
नता ल होम चढ़ाथें !
नेम धेम मनवइया ओकर ले
दिन दिन दुरिहावत हें!

भले रहंय अड़हा तइहा पन
कइ ठन गुन ल पढ़े रहंय!
कदर करंय जइसन के  तइसन
चाल चरित म कढ़े रहंय!
पर के  खातिर सरबस देवंय
बोलंय मधुरस कस बानी!
आज सरावत हें घुरूवा म
लाज सरम सब बिन पानी!
काल परो दिन अउ का  होही
अंतस सोच सतावत हे!

पढ़ंता गुनवंता मन के
आज हे घलव जमाना!
उद्दिम करके  बुध बल आँछत*
जोरत हावंय खजाना!
गुन के  पीछू राज राज अउ
देस बिदेस पूजाथें!
अपन नाव के  संग राज के
नाव ल जबर जगाथें!
अवगुन के  संग के  जमाना
गुन ल घलव बढ़ावत हें!

चटनी नून बासी झड़कइया
दार बिना नइ खावंय!
गुटका  पान मसाला माखुर
मुंह भरके  पगुरावंय!
भिनसरहा जागब बिसरागंय
आठ बजे तक  सोथें!
अधकचरा पढ़वइया घर न
घाट घलव के  होथें!
तइहा के  बइहा ले गय अब
कलजुग रंग देखावत हे!

किसिम किसिम के  ओनहा कपड़ा
नवा समे के  फैसन!
पुरती खातिर उदिम करत हें
जेकर लखारस* जइसन!
गाँव गली गुंडी घर अंगना
बैठक  चौरा भावय!
सरहा सरही के  कुरिया म
मन के  डाह बुतावय!
इस्‍नो पावडर साबुन सेंट
अउ का  का  अजब लगावत हें!

समे के  बलवंता चकिया म
एक दिन जमो पिसाथें!
दू कौड़ी म हरिश्चंद्र
राजा ल डोम बिसाथे!
गांव गौटिया तक  ल तइहा
सइकल चढ़े नइ आवय!
अउ दू आखर अंगरेजी का
हिन्‍दी न गोठियावय!
अब इंकरे नाती नतुरा मन
अंगरेजी फरमावत हें!

अमर बेल कस अतियाचारी
बिना मूर जगरत हें!
बिना जतन के  बेाम जइसे
इहाँ उहाँ बगरत* हें!
एक  हाथ खीरा के  लबरा
नौ हाथ बीज बतइया!
बिना गुड़ के  बस बातन म
लाड़ू सिरिफ बंनइया!
करम धरम के  सत्‍यानाशी
नीत न्‍याय समझावत हें!

हिंदी अरथ - कटायेन : आपस में बिना लिहाज के विवाद करना, आँछत : भरोसे में, लाखारस : सामर्थ, औकात, बगरत : फैलना, पसरना

Saturday, May 21, 2011

"गाँव कहाँ सोरियावत हे" भाग- 5

सुकवि बुधराम यादव की लम्बी कविता "गाँव कहाँ सोरियावत हे" की अगली कड़ी भाग- 5 के रूप में प्रस्तुत है. सबके  मुड़ पिरवाथें शीर्षक से आज के युवा, राजनीति और संस्कृति का गाँव के परिवेश में क्या स्थिति है..अद्भुत चित्रण.


सबके  मुड़ पिरवाथें

अब नवा जमाना के  लइका
सब नवा नवा भर गोठियाथें
हंसिया कुदरी घर खेत कती
जाये खातिर बर ओतियाथें*!
बाबू साहेब अउ हवलदार
पढ़ लिख के  कइ झन होवत हें!
कइयों झन के  करतूत देख
दाई ददा मन रोवत हें!
काम कमाई बिन कौड़ी भर
सूट बूट झड़कावत हें!

अब के  लइका  मन के  होथे
ऊंच पूर कद काठी।
पन नइ जानय अखरा का ये
अउ भांजे बर लाठी!
रतिहा भर म राजनीति के
होथें जबर जुवारी!
पंचपति, सरपंच पति बन
लक्ष्मीपति पुजारी!
होटल म खावब अउ मोटर म
बस चलब सुहावत हें।

राजनीति के  ओट म अइसन
नगरा नाचे लागिन!
तइहा के  सोये राक्वछस मन
लागत हे फेर जागिन!
पउवा बोतल कुकरा बोकरा
सौ पचास रूपिया म!
लुगरा पोलखा* घोतिया पटकू
अउ गहना-गुरिया म!
पैसा वाले मन गरीब के
नीयत घलव डोलावत हें!

नकटा बुचुवा मारे कूटे
चोर उचक्का डाकू  !
लोफड़ लंपट छल परपंची
लोभी  लुच्‍चा आगू!
भरे सभा म बइठे खुरसी
मच मच के  गोठियाथें!
चमचा भरंय हुंका रू ऊपर
ले ताली पिटवाथें!
अपन नफा के  सिरिफ गोठ ल
जानत अउ जनावत हें!

पंच कउन सरपंच कउन
जनपद जिला पंचाइत!
गांव ठाँव के  हित सेती* बर
एक  ठन जबर सिका इत!
नोट म बोट सके ले खातिर
घर पहली सिरवाथें!
जीत गइन तौ पांच बरिा ले
सबके  मुंड़ पिरवाथें!
मरहा-खुरहा-दुबरहा के
हक  ल सक ल पचावत हें!

गली गुड़ी अऊ हाट बाट म
गंजहा भंगहा घूमय!
गहना गुरिया भड़वा बरतन
के  कीमत म झूमय !
मंदिर स्कूल पंचइत भवन म
जुआ सट्टा खेंलंय !
अपन सब सिरवाके  लइकन
मन बर पाप सके लंय !
असली सपूत हें गिने चुने
जे गाँव के  लाज बचावत हें!

आगी खाके  अंगरा उगलंय
अउ उधम मचावंय घूम घूम!
चिमटी भर ओनहा कपड़ा म
इन नाचंय गावंय झूम झूम!
घर घर म टी.व्ही.टेप देख सुन
एक  एक  ले अनहोनी!
टूरा टनका  के  का  कहिबे
बिगड़त हें मोटियारी नोनी!
चोंगा डब्‍वा तो ठौर ठौर
अनसुरहा कस बोरियावत* हें!

जेकर हाथ लगाम थमायेन
घोड़ा नइ कबूवावंय!
न काठी ले ऐंड़ लगावंय
न कोड़ा चमकावंय!
अंधवा कनवा खोरवा* लुलुवा
अउ डोकरा डोकरी के !
सुख सुविधा ल हवंय डकारत
जइसे सब पोगरी के !
अपन भितिया खदर-कुरिया*
काया कलप करावत हें!

बदनाम घलव हें नाव बिचारी
मितानिन संगवारी के !
पंचाइत अउ का  सुसाइटी
स्कूल का  आंगन बारी के !
कु छ सढ़वा बन कुछ हरहा* कस
मौका  पाके  ओसरावत* हें!
कुछ रूप रंग म बउराये
कुछ चारा चर पगुरावत हें!
बइठे जउने डारा अड़हा
निरदइ असन बोंगियावत* हें!

लखनउ दिल्‍ली का  कानपुर अब
खोर-गिंजरा* मन बर पारा!
जकला भकला मन रहिन कहाँ
निच्‍चट सिधवा अउ बिचारा!
राज राज म किंजर बुलके
सीख गइन दुनियादारी!
खपरा ले लेंटरहा खातिर
बेचत हावंय कोला बारी!
दू चार आना मनो लगथें
बांचे  कइ नाव धरावत हें!