Sunday, March 8, 2015












गुरुत्वाकर्षण- आकर्षण-शारीरिक विवशता
(दम लगा के हईशा)
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सिनेमा एक गज़ब की विधा है, अपनी बात कहने के सबसे प्रभावी माध्यमों में से एक. दर्शक के सभी इन्द्रियों को गूंथकर धीमी आंच में दिल-दिमाग को सेंक लेने वाली. मुकेश, मोहिंदर-हरेन्द्र भाई ने सब कह दिया, वैसे अब कुछ शेष रहा नहीं. मगर उसी "शाखा" में दिए वचन निभाने के लिए मेरा लिखना कदाचित आवश्यक है.

मध्य वर्ग के लिए जहाँ टिकिट से कई गुना भारी पॉपकॉर्न और समोसे के रेट पड़ते हों और कॉफ़ी का बड़ा कागजी कप मेरे जैसे प्राणी के लिए दो तीन के हिसाब का हो, वहाँ मुकेश-हरेन्द्र भाई की स्पॉन्सरशिप में मोहिंदर भाई का कॉफ़ी में हिस्सेदारी कर लेना, जाहिर है मेरे लिए फिल्म के मजे को कुछ स्टार बढाने जैसा है.
अपनी ख्वाहिशों को मसोसकर, कर्ज लेकर उपभोग किये जा रहे उपकरणों के मद्देनज़र मध्यवर्ग का दायरा भले ही बढ़ा लिया गया हो मगर भारत का असल और मूल मध्यवर्ग यही है जो जीवन में हर दिन करता है "दम के लगा के हईशा..."
कहानी तो आप जान ही चुके हैं. उस वय, और इस वर्ग की चिर चाहत से अलग मोटी युवती के किरदार में "भूमि पेंदनेकर" अपने भारतीय नाक-नक्श और सहज अभिनय से हीरो "आयुष्मान खुराना" को दम लगाने में सच में बेलेंस करती है. संजय मिश्रा [नायक के पिता की भूमिका में] और अन्य पात्र बोनस की तरह हैं जो जब स्क्रीन पर आते हैं दर्शकों को कुछ न कुछ दे जाते हैं.
निर्देशक की बुनाई में कहानी, स्क्रीन प्ले, पात्रों की कास्टिंग, देशकाल सब अपने ठिकाने पर हैं, उसी में खुबसूरत टिपकियों की तरह संवाद को भी बुना गया है. आजकल फिल्मों में सप्रयास शहर को एक पात्र की भूमिका निर्वाह कराया जा रहा है, जिसे निर्माता आदित्य चोपड़ा और निर्देशक/सिनेमेटोग्राफर " शरद कटारिया की टीम ने बखूबी निभाया है.
गीत-संगीत फिल्म के लय में हैं. हाँ पात्रों की भाषा के मसले पर हरेन्द्र भाई से सहमत.
और ख़ास बात ..... पूरी फिल्म देखते हुए एक बात यह कौंधती रही कि "शाखा" परिवार अब तक इसका "संज्ञान" क्यों नहीं ले सकी कि उसके "क्रांतिवीर" यहाँ वन्देमातरम के इतर मद्यपान, मुख अतिचार करते दिखाए गए हैं. खैर.... हईशा को दम भी तो उनके चर्चित ब्रह्मचर्य "शाखाई व्यायाम" से ही प्राप्य होना जो दर्शाया गया है. 

फिल्म देखना हो तो पति-पत्नी अनिवार्य और जो संयुक्त परिवार के साथ है, वे सभी जिम्मेदार सदस्यों के साथ देखें. रिश्तों के सारे मंज़र चुपचाप देखने के बजाय.....

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समीर

बातचीत में मौसम के आने के पहले




कम मुलाकातें, कम बातें, कम उम्र कुछ हदें तय कर देती हैं. प्यार शब्द के मायने पता नहीं कितने लेवल क्रॉस करने के बाद समझ आये. शादी क्या एक उम्र में आकर कर लेनी चाहिए ? पता नहीं !! इच्छायें इनका क्या ? रूप, गंध, शरीर किस तरह से व्यक्त होती होंगी. वह दुविधा में था, कभी उम्र, उसके साथ जुड़ी ज़िन्दगी की इमेजिनरी प्लानिंग, कभी एक जिस्म, तो कभीकभार एक विपरीत लिंग वाले साथी की जरुरत बस. यह सब अक्सर सोचता ही रहता, तो उसे ऐसा लगा कि शादी के लिए हाँ कर देनी चाहिए, सो कर दिया.

वसुधा का रिश्ता कई दिनों से उसके घर पेंडिंग पड़ा था. पिछले साल उसके परिवार में किसी की शादी वाली एलबम से निकाल भेजी गयी तस्वीरों में वह घाघरा-चोली में कॉमन फेस सही, उसे ठीक लगी.
हाँ कर दी उसने.
अब तक अनजान रही वसुधा आ गयी, पापा के घर और उसके जीवन में .....
पिछले सात दिनों में उसकी दो तरह से पहचान बनी. भिण्डी की सब्जी बढ़िया बनाती और घर में भी साड़ी बड़े सलीके से पहनती थी. अब इतनी बड़ी फैमिली में तन्हाई मिले तो कुछ और पहचान हासिल हो.

हर उम्र की अपनी जरुरत होती है मगर यह व्यक्तिगत तौर पर अलग अलग होती है. शायद इनकी तीव्रता और पुनरावृत्ति कई बार प्रेम को अपनी तरह से परिभाषित कर लेती है. इसका सच या झूठ होना बाद में तिलिस्म टूटने पर पता चलता है. पता नहीं कहीं पढ़ा है, गुजरा है या फिर खुद ही सोचता है.

कुछ दिनों के लिए पापा के घर से बाहर निकले तो उसके तराशे हुए देह से भी पहचान हुई.
पहले समुन्दर की शोर मचाती लहरें किनारों पर फुहारें बनकर उन्हें भिगाती,  फिर भीगे कपड़ों में वापस होटल आकर शॉवर में एक साथ भीगते,  कभी पहाड़ी पर शूटिंग स्पॉट को देखते अधूरी सीढ़ियों पर अचानक आ गयी बारिश से भीगते, भरी दोपहरी झील पर रेंगती स्टीमर के डेक पर खड़े, मचलते लहरों को देखते पसीने से भीगते, नाईट शो के बाद उंगलियाँ फँसाये लौटते हुए स्लीवलेस कुरते में भीतर तक आ गयी  ठिठुरन के वक़्त भी उनकी बातचीत में मौसम नहीं आया.


तुमने मुझमें ऐसा क्या देखा जो पसंद कर लिया....! उस दिन की बातचीत ऐसे ही शुरू हुई.
यूँ ही बस शादी करनी थी एक अदद लड़की से, सो कर लिया. उमर हो रही थी न ..! अपनी बात पूरी करने वाली लाईन जानबूझकर थोड़ा रूककर कहा उसने. ऐसे प्रयास से वह वास्तविकता छिपा जाने में सफल रहा था
“और कोई लड़की देखी कभी” बात आगे बढ़ाने के लिहाज से था ये अगला सवाल.
हाँ ! मगर प्लान करके नहीं.
कैसे कहता जो सच था तो उत्सुकता से भरे सवालों का सपाट स्वर में जवाब देना ही उसे ठीक लगा .... फिर भी वसुधा पूछती रही.
तुम्हारी लाइफ में पहले कभी कोई रही, याने कॉलेज में किसी को पसंद किया हो.
क्या करोगी यह सब जानकर. छोड़ो रहने दो. अच्छा तुमने कभी किसी को पसंद किया ? .... वो क्रश टाइप वाला नहीं न...! सवाल टालने के लिए सवाल ही कर लो, यही सोचाकर उसने ये डिफेंसिव स्ट्रोक खेला था .
हाँ, पड़ोस का एक लड़का पसंद करता था, एक दिन मुझे अकेले देखकर प्रपोज भी किया था उसने. वो टीनएज का अट्रेक्शन जैसा था..... मेरी तरफ़ से ना ही था. उसका जवाब उसी टीनएज की मासूमियत से लबालब था.
ऐसी बातें वसुधा को हर्ष के नज़दीक ला रही थी. ये रेयर इनोसेंस उसे एक प्रकार की गारंटी के साथ भाने लगी थी, शायद यही न भुलाये जा रहे अतीत से वसुधा को दूर रखने में उसकी मदद कर रही थी. हर्ष के सपाट जवाब वसुधा के लिए साफगोई बयान जैसे थे. अब तक बातचीत में मौसम नहीं आया है. उफ़ ! काश !!जिंदगी इतनी आसान होती.


ज़िन्दगी की अपनी ही रिवायत है ..कुछ बेरहम सी ..तभी तो एक ख्याल से ही गुदगुदी सिहरन में तब्दील हो जाती है, जी लगता नहीं, तस्वीरें निहारते वक़्त गुजरता है. उसकी बातें, अहसास, किसी तरह हिस्सा बन जाना, बस तुम्हारा साथ रहे.
तुम भी न !
वो देखो गिलहरी गुलमोहर के बीच अठखेलियाँ कर रही है.
कहाँ ?
उधर देखो, उसने धीरे से अँगुली मिताली के बायें गाल पर रख इशारा किया.
अच्छा... ! ज़रा तुम भी उधर देखो सूरज क्षितिज के पार उतर रहा है... उसने हर्ष के कान के पीछे अपनी हथेली रखी.
वह धीरे से पीछे घुमा और उसकी हथेली पर एक चुम्बन रख दिया..... चलो धरती के किसी कोने का तो सूरज इस वक़्त क्षितिज के करीब जरुर पहुँच गया होगा. मुस्कुराते हुए उसने अब मिताली को चूम लिया.
हर सवाल का इस तरह “जवाब” बार-बार मिलने की इच्छा मसोसकर वह उसे कनखियों से बस देखती रही.
भरी दोपहरी में उस हॉस्टलनुमा कमरे में गिलहरी, गुलमोहर, क्षितिज, सूरज और पता नहीं क्या क्या ....??  सिर्फ हर्ष और मिताली ही देख रहे थे, जो उन्हें अक्सर दिखते भी थे. जाहिर है उनकी बातों में मौसम नहीं आता था और कभी आता भी था तो अपने मिज़ाज़ में ही. मगर यह तो एक ठिठका हुआ ख़याल ही था. शायद उन्हें पता है मौसम के मिज़ाज़ पर ख़ुद के मिज़ाज़ का असर लाज़िमी है.


अक्सर बेख्याल कर देने वाले इस ठिठके हुए ख्याल से नज़रें चुराने की नियत से उस दिन हर्ष ने खुद ही वसुधा से  बातचीत की शुरुआत की कुछ यूँ कोशिश की .....
“मुझे किताबें पढ़ना पसंद है.” बहुत देर से किताब की एक पेज से आगे बढ़ने में नाकाम रहने की बोरियत दूर करने के लिए उसने टीवी सुन रही वसुधा की ओर बिना देखे ही बुदबुदाया.
“और मुझे किताबों से परे, जीना पसंद है.” अनजान वसुधा की मासूमियत बरकरार है.
मुझे कैरेक्टर्स के द्वन्द पसंद हैं. उसने उबासी लेते हुए आवाज का वॉल्यूम बढ़ाया.
और मुझे द्वन्द से ज्यादा कैरेक्टर्स अज़ीज़ हैं. वसुधा अभी भी उसी अंदाज़ से बात कर रही है. हाँ अब वह टीवी देखने लगी.
उन कैरेक्टर्स के “character” नहीं ? उसने “राइम” करने के लिहाज़ से पूछा.
तो द्वन्द में क्या होता होगा, एक दूसरे के कैरेक्टर के बरक्स नुक्ताचीनी ही न.
तुम मुझे ट्रैप कर रही हो ..... हर्ष हँसने की कोशिश करने लगा.
न न ट्रैप होने से बच रही हूँ ... वसुधा अभी भी वैसी ही है.
वैसे किस किताब का कौन सा कैरेक्टर तुम्हें हर मूड में पसंद आता है. वसुधा ने बात बदलने के लिए कहा.
अब कोई एक हो तो कहूँ, बहरहाल मुझे हर “मेल कैरेक्टर” के लिए एक शब्द बहुत पसंद है.
क्या.. ?
“लम्पट”
किताबों में या हकीक़त में... या फिर दोनों में !!! यह कहते हुए उसके चेहरे पर जानी पहचानी निश्छल हँसी तैरने लगी.
हर्ष उस पेज को अबकी बार बिना पढ़े आगे बढ़ गया. वसुधा अभी भी वैसी ही थी. वह टीवी सुनने लगी. जाहिर है ऐसी बातचीत में मौसम का ज़िक्र अभी जरुरी नहीं.


मिताली के ख़याल अक्सर उसे किताब के किसी एक पेज पर रोकने लगे थे. फिर उसके बाद हर्ष के साथ जो गुजरती उसे वसुधा कुछ-कुछ समझने लगी थी. टीवी ऑन होता था, मगर वह तो सुनती बस थी न. यही ख़याल हर्ष को किताबों से मोबाइल और मोबाइल से मिताली के “क्लोन्स” की ओर ले जाने लगे. वह कहती न थी, हाँ हर्ष की मोबाइल कन्वरसेशन के साथ-साथ उसके मिलने-जुलने वालों पर निगाह जरुर ठहरने लगी.
विवाह की सामान्य नैतिक बाध्यताओं के इतर हर्ष  अपने पुराने दोस्तों, जिनमें खासतौर पर अंजलि, रुखसार भी थीं, से कांटेक्ट में रहना जरुरी मानकर चलता था. कोई कहे तो इसे वह जस्टिफाई भी करता, जैसे वसुधा से.
वसुधा का ध्यान इस तरह के मोबाइल कन्वरसेशन भटकाने लगे थे.. ”देखो तुमने जीना शुरू ही नहीं किया, मेरी मानो थोड़ी सी बिगड़ भी जाओ. अपने लिए वक़्त निकालो, तुम्हारे लिए हमेशा पहले प्रद्युम्न, फिर बच्चे फिर घर जरुरी रहे. लादी गयी जिम्मेदारियों को, खुद की इच्छाओं पर प्राथमिकता देकर ढोना कहाँ तक ठीक है. अपनी काबिलियत को किचन, बच्चों की टिफिन, ट्यूशन, हसबेंड की फरमाईश, कामवाली बाईयों के मेनेजमेंट, ऑफिस के टास्क क्लीयरेंस और कलिग्स के साथ किच-किच में खपा दिया है. वो स्ट्रेटफॉरवर्ड, जुनूनी लड़की कहाँ खो गयी. उसे निकालो अपने भीतर से. जियो खूब जियो....अपने मन का करो, थोड़ी बिगड़ जाओ.”
वसुधा  समझ गयी थी ... यह मैं नहीं हूँ, न हो सकती हूँ. इसकी फ्रीक्वेंसी मोबाइल के थ्रू ही मैच करती होगी इसलिए यह उसी नेटवर्क के कम्युनिकेशन में कही-सुनी और अमल में लायी जाती है.
उनकी बातचीत में मौसम कभी-कभार आने लगा था. अक्सर रात सर्द होने लगीं, कई रात वह भीगने लगी थी.


फिर भी ज़िन्दगी उसी “इमेजिनरी प्लानिंग” के हिसाब से चल रही थी, जैसा हर्ष ने सोचा था. जाहिर है इन अवसरों पर वसुधा की बातों का इशारा समझकर अपनी जिद पर अब वह सपाटबयानी नहीं करता.
“वक़्त के साथ कम्युनिकेशन के मायने बदल जाते हैं.” इस आवाज से किसी मनपसंद गाने के बीच आये कॉल की तरह उसका हमसफ़र, बेसब्र ख़याल जैसे ब्रेक हुआ था.
और मीडियम भी न .....! उसने झट से हर्ष के अधूरे से लग रहे वाक्य को पूरा किया.
तुम उसका अक्स ढूँढते रहते हो हर्ष...
चुप्पी........ ###
हरेक शख्स में, जहाँ वो मिल ही नहीं सकती.
“तुम्हें खाना बनाना पसंद नहीं है न..... वसु” ऐसा वह निःशब्द होने पर ही उचारता है.
अंजलि, रुखसार या “किसी” और में.... मतलब मुझमें में भी नहीं मिलेगी ... ज़रा मन को मना भी लो.
तुम ये बेवजह घर के सब कपड़े धोना कब बंद करोगी.
“तुम भी कम से कम, बेवज़ह ही सही, बात तो कर लिया करो मुझसे... हर्ष” यह भी चरम क्षण का संबोधन ही था.
तुम देर रात तक टीवी देखना बंद करो.
सहसा दोनों टीवी की तरफ देखने लगे, डिस्कवरी पर साउथ पोल पर कोई डाक्यूमेंट्री चल रहा था. सतही चुप्पी के बाद बातचीत डाइवर्ट होने लगी.
देखो आज मौसम कैसा अजीब सा हो गया है, ठण्ड भी ज्यादा है.
हाँ आसपास कहीं बारिश हुई होगी.
चलो, जिंदगी में लास्ट एपिसोड का रिपीट टेलीकास्ट देखना है.
हूँ.......! मुझे भी कल सुबह जल्दी उठना है. मोबाइल में चार्जर का पिन खोंसते हुए... उनके बीच लास्ट डायलाग डिलीवरी होती है.
इस रिश्ते में मौसमी ठण्ड, ताप, बारिश घुसपैठिये की तरह कब आवाजाही करने लगे. पता ही न चला. अनमनी सी पेंच फंसी रहने लगी वसुधा, हर्ष, मिताली और उसके "क्लोन्स" के बीच.


ऑफिस में बॉस से कन्वर्सेशन में मौसम का ज़िक्र था.
आप क्रिसमस के लिए जा रहे हैं न सर ! थोड़ा अधीर लग रहा हर्ष अपनी बात रखता है.
हाँ, इस बार और भी कुछ ख़ास है डियर.... अरुण सिंह बॉस की तरह ही मुस्कुराते हैं.
अरे हाँ, याद आया सर, आपकी शादी...है न ! हर्ष संभलकर मुस्कुराता है.
यस पार्टनर शादी ! तुम तो आओगे नहीं. चलो लौटकर तुम्हारी फरमाईश पर मेरी तरफ से पार्टी डन रही.
राईट सर !!!
और बताओ !!!
सर सोच रहा हूँ.. न्यू इयर पर इस बार मैं भी कहीं हो आऊँ.
अरे जरुर.. राजस्थान गए हो कभी.
हाँ सर !
तो भी !! जाओ, माउंट आबू घूम आओ. बता रहे हैं वहाँ मौसम भी अच्छा है, अब की बार लगता है न्यू इयर पर टेम्परेचर माइनस में चला जायेगा ..... मज़ा आएगा.
जरुर सर ! वैसे भी वसुधा बहुत दिनों से यही  ज़िद कर रही है.
गुड, बीवी की इच्छा का सम्मान भी हो जाएगा. “लाइक फूल्स पैराडाइस...” कहते हुए आँख मारते हैं. और हाँ कोई जरूरत हो तो बताना मुझे.
थैंक्स सर .... दुविधा में हँस भी नहीं सका वह.


लेकिन इस बातचीत में मौसम नहीं आया था...
“तुम्हारे बर्थडे का गिफ्ट लेना तो रह गया न इस बार..” बहुत देर की कोशिश के बाद बातचीत की शुरुआत के लिए उसे यही लाइन ठीक लगती है, तो कह देता है.
हाँ जैसे पिछली बार तुमने टाइम पर दिया था न ! ..... वसुधा अब टीवी देखने लगी है.
थोड़ी चाय मिलेगी ??
हाँ क्यों नहीं... यदाकदा तो मांगते हो. अभी लायी.
“चलो इस बार राजस्थान से कुछ लेते हैं तुम्हारे लिए.”
चाय की चुस्की से शायद बातों में मिठास आती है, मुस्कुराते हुए वसुधा सोचती है. फिर कहती है “एक स्मार्टफोन ही दिलवा दो.” बात पूरी करते करते जोर से खिलखिला उठती है. हर्ष फिर भी सोचता रहता है.
“आज ही निकलेंगे... गरम कपड़े ठीक से रख लेना, मैं गाड़ी तैयार करवाता हूँ.” हर्ष कामकाजी बातचीत के सहारे खुद को असहज सवालों से दूर रखने की कोशिश करता है.
हूँ, कितनी बार मिन्नतें की हैं तुम एक बार मेरे साथ कुछ लम्हें जियो तो....!!!
हर्ष अब बातचीत में अक्सर मौसम न आये, सोचने लगा है. इस वक़्त वह माउंट आबू के मौसम पर गूगल कर रहा था.   
दो घंटे बाद....
नयागांव बैरियर क्रॉस कर इनोवा अब राजस्थान के फोरलेन पर थी. स्पीडोमीटर का कांटा 120 के आसपास देर से बना हुआ है. हर्ष ड्राइविंग सीट पर है और वसुधा अपना सीट बेल्ट खोले मोटर व्हीकल एक्ट की अधिकाँश वैधानिक चेतावनियों की लगातार अवहेलना कर रही है.
बाहर का मौसम धूप-छांह के साथ बदल रहा है और गाड़ी के भीतर का मौसम “ऑटो मोड” पर है. 


माउन्ट आबू के शेल्टर इन होटल के आधुनिक लिफ्ट से बाहर आते हुए लगभग चीख ही उठा था वो
“अरे अरे संभालो उसे...”
तुम भी न, ज़रा भी ध्यान नहीं रखती. अभी टूट जाता फिर यूँ ही नंगे पाँव.......!
हूँ ! पिछली सर्दी में महाबलेश्वर जाते हुए पंचगनी से लिया था. याद है तुम्हें, कितनी ऊँची नीची, फिसलन भरी राहों में साथ रहा, बच गया, शायद अब इजाज़त मांग रहा. कहते हुए मुस्करायी वो बहुत देर बाद.
वह जहाँ है उसे यही करना भी है... “चप्पल कहीं का” हँसी को पॉज दिया उसने.
जब हम खुश होते है तो किसी बात पर यूँ ही फ़िलासफ़ी झाड़ लेते हैं. कहते हुए उसने भी मुस्कराहट को पॉज कर दिया.
हाँ, यही मैं भी सोच रहा था. वैसे ही जैसे किसी से जब अनमने बात करनी हो तो थोड़ी देर में मौसम का हाल पूछना ही रह जाता है.
“ऐसा कितनी बार हुआ हमारे बीच”... अनायास पूछ पड़ी वो.
इतनी बातें होटल के लम्बे कॉरिडोर में रूम नंबर पढ़ते पढ़ते हो रही थी.
“शायद.... कभी... नहीं ! उसके हर शब्द के बाद पॉज था. रूम अटेंडेंट के
जाने के कुछ देर बाद डोर नॉब पर उँगलियाँ फिराते हुए कहा उसने.
“अच्छा बताओ आज रात बर्फ गिरेगी....” बहुत देर से बदन सीधा करने की इच्छा होने के बावजूद बिस्तर पर पसरने के बजाय सोफे पर रखे कुशन को भींचें वह खिड़की पर आ गयी.
क्या ??  हँस दिया उसने अबकी बार.
उसके पास भी हँसी थी, सो उसने भी हँस दिया.
वो लोग क्यों कह रहे थे कि माउंट पर रातें सुनसान सी हो जाती हैं. रात के ग्यारह बज रहे हैं, लगता तो नहीं. वापस सोफे पर आकर बैठ गयी.
तुम भी न !! न्यू ईयर पर आई हो, रात भर जश्न होगा. साथ में लाये बेग से कुछ जरुरी सामान निकालते हुए वह झुका रहा.
अच्छा बताओ ! मैं न कहती, तो तुम शायद यहाँ फिर नहीं आते.
सोचना पड़ेगा...!
सोचना पड़ेगा ...... क्यों ? अरे 400 किलोमीटर इनोवा से चलकर यहाँ आते समय इसके अलावा और कुछ सोचते रहे क्या ? आबादी, जंगल, वादी, रास्ते सब क्या ख़याल कराते रहे.
वह सीधा हुआ और उसके नज़दीक आ गया मगर चुप रहा.
सच में हर्ष !! तुमसे फिर से मुहब्बत करने का मन होने लगा है.
ओह !! क्या मैं अब बेहतर ड्राइव करने लगा हूँ ? शायद मुस्कराया था वह.
हाँ बेहतर ड्राइव करने लगे हो ...... गाड़ी भी.
चलो नीचे चलते हैं, बहुत से इवेंट्स हो रहे हैं आज की रात.
रहने दो ठण्ड होगी.
अरे नीचे अलाव लगे हैं देखो...
देखा न, चारों ओर इतनी भीड़ भी तो हो गयी है.
रूम हीटर ऑन था, कमरा धीरे धीरे सामान्य तापमान पर आ रहा था. टीवी ऑन करने का उसका मन था नहीं. बस एक बार वाशरूम से आकर उस हेरिटेज होटल के शाही पलंगनुमा बिस्तर पर..... !! अँगड़ाई लेती सोच रही थी वह.
“कुछ पीना है”  उसके आगे के ख़याल का सिलसिला हर्ष की आवाज़ से टूट गया.
नहीं अब सोने की इच्छा है.
इतनी जल्दी, हाँ थक गयी होगी. पर नया साल तो आने ही वाला है.
हाँ पिछला गुजर जो गया न...!
आज की ये बातचीत वैसी नहीं थी जैसी उनके बीच अक्सर होती थी.
ये लो इसे ओढ़ लो, इसे पहन लो, और इसे बिछाना. हर्ष उसे वह सब एक-एक कर देता रहा, जो उसने अपने बेग से कुछ देर पहले निकाला था. इस बीच अपरिभाषित सी खामोशी में कुछ वक़्त गुज़र गया.
बहुत कुछ घट रहा था इस दरमियान, दोनों कई बार एक दूसरे में समा जाने की कामना की तीव्रता तक पहुँचे. 
एक शाल, एक नथनी, और दो बाँहे फैलाए हर्ष को कुछ इंच की दूरी पर महसूस कर वसुधा खिल कर सकुच गयी.
उठी, झुकी  और उसके आगोश में यह कहते हुए खो गयी कि “आने वाला हर वक़्त मुबारक़ हो.” माउंट की चुभने वाली ठण्ड भीतर पक रहे रिश्ते की दहक से हार गयी थी. ज़ाहिर है उनकी बातचीत में मौसम आना भी नहीं था.  


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समीर .....

Saturday, February 21, 2015

बदलाPUR ने बदला बदला लेने का अंदाज़

                                       
अपना बॉलीवुड बदला/revenge पर खाँटी मूवी बनाने और #टैग लाइन रखने का आदी रहा है. हमारी टिपिकल बदला लेने वाली फिल्मों में खालिस अनैतिकता, अन्याय और सिस्टम के खिलाफ उतने ही अभिनव ढंग से बदला लेने वाला नायक कभी-कभार विलेन से तो ज्यादातर महँगे टिकिट और बेशकीमती टाइम खोटी करने वाले दर्शकों से हिसाब बराबर करता है. क्या "बदलाPUR" का बदला भी उतने ही शिद्दत से श्रीराम राघवन [एजेंट विनोद फेम] ने रचा है ? यह जानने के लिए फिलिम देखना तो बनता है.

फ़िल्म दर्शक की नब्ज़ को पहले ही मिनिट से मैच कर लेती है फिर उसे थामे, दबाये, बढाए, रोके चलती रहती है. गाने बैकग्राउंड स्कोर की तरह हैं जो सूफियाना अंदाज़ में में स्टोरी को सपोर्ट करती हैं, गुटखा थूकने, कश लगाने या फिर उबासी दूर करने के लिए वॉशरूम तक जाने की इजाज़त नहीं देती.  ये सोचना मज़ेदार है कि जब श्रीराम राघवन ने इसके कलाकारों को पहली बार story narrate किया होगा तब उनका रिएक्शन कैसा-कैसा रहा होगा. कुछ को समझ आया होगा तो कुछ ने इस रिस्क के साथ फिल्म साइन कर लिया होगा कि फिल्म के प्रीमियर शो में राघवन से ही पूछ लेंगे.

दर्शक को सबकुछ  दिखाकर उसे स्टोरी के क्लाइमेक्स पर अटकल लगाते रहने पर मजबूर करना ही इस "थ्रिलर" का असली "थ्रिल" है.

यामिनी गौतम, दिव्या दत्ता, राधिका आप्टे, विनय पाठक, हुमा कुरैशी एक तरफ अपने करैक्टर में डूबे हुए "irreplaceable" हैं, तो दूसरी तरफ "तीन प्रमोशन और दो बाईपास" वाला पुलिस ऑफिसर, "पुराने चाँवल में कीड़े न निकाल" की सलाहियत वाली माँ, पुलिस थाना, जेल, पुलिस/जेल लाइन के साथ सिनेमेटोग्राफी सब फिल्म के मूड और फ्रीक्वेंसी को ऊपर वाले लेवल पर ले जाते हैं.

वरुण धवन चौंकाते हुए उठते हैं, तो नवाजुद्दीन की एक्टिंग सभी रसों का पान कराती यह तय करती है कि वो स्टोरी टेलिंग की विधा के साथ इस फिल्म के असल हीरो हैं. बहरहाल अब बॉलीवुड एक्सपेरिमेंट, सेक्स को लॉजिकली यूज करना सीख रहा है.

धोनी की तरह फिल्म की फिनिशिंग भी नवाजुद्दीन ने अपने ही बिग शॉट अंदाज़ में किया है. क्या किसी अन्याय/गलत कार्य का बदला उसी तरह लिया जाना कंसर्न्स को न्याय दिलाने का सही इंसानी तरीका है या नहीं ? इस प्रश्न को ऑडियंस के दिमाग में खलबली मचाने के लिए छोड़ते हुए.


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#समीर 

Tuesday, January 13, 2015

तुम बेवजह याद रहती भी कहाँ हो













क्या कहा ?

तुम अपनी इन पतली उँगलियों को मेरे पलकों के गिर्द नचाना छोड़ो अब ! जानती हो, उधर पोमेस्ट्री वाले रुम में सब घूर रहे थे.

उँगलियों को ?

नहीं, तुम्हारी सूरत को.

इसीलिए तो गणनायें गलत होती हैं इनकी.

तुम भी न ; उन्हीं लकीरों की बात करती हो.

अहाँ........! जिनके हर घड़ी बदलने की फ़िक्र होती है, कभी उस तरफ तो कभी हमारी तरफ़.... ब्ला.. ब्ला.. ब्ला. लो पूरा कर देती हूँ मैं.

थोड़ी देर की नीरवता से वह कुछ सुनने की कोशिश करती है.

ज़रा सुनो...!! अब मंदिर की घंटियों की आवाज़ साफ़ आने लगी. मम्मा भी निकल आयी होगी, उनसे मेरे रिश्ते की बात करके.

तुम उंगलियाँ नचाना बंद तो करो.... शकुन.

तुम भी न ! अब फिरा रही हूँ, तुमने बाल इतने बढ़ा रखे हैं कि तुम्हें नचाना लग रहा है.

पापा ने तो मेरे लिए हामी भरी थी न, फिर.......

मेरी उंगलियाँ लम्बी हैं न इसलिए पतली लगती हैं और तुम्हें पता है .....

क्या ???

मम्मा को सिक्यूरिटी पसंद है, हर तरह की. आदमी, आदमी की नीयत, और उसके जॉब की भी. 

चलो मेहुल ! अब उठो. ये सुलझेंगे नहीं, शेम्पू नहीं करते क्या ? पामिस्ट भी नहीं सुलझा सकता लकीर और रास्ते टेढ़े हों तो..... हँसती है खिलखिलाकर ..... शकुन.

आईने के सामने अब छोटे रह गए बालों पर कंघा चलाते तुम इसी तरह जेहन में आती हो और मैं नाहक कोशिश करता हूँ उन लम्हों को भुलाने की. तुम बेवजह याद रहती भी कहाँ हो.

मेहुल फिर बुदबुदाता है, 
मंजरी फिर उसे कनखियों से देखती है, 
वो फिर एक दूसरे को देखते हैं, 
दोनों फिर फीकी मुस्कान फेरते हैं, 
फिर "बाय" कहते हैं .... पिछले 6 साल से रोजाना की तरह, ऑफिस जाने से पहले एक दूसरे को.  




Saturday, December 6, 2014

चपटी तिकोने वाली प्लेट
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अंडे सर्दी में फायदेमंद होते हैं.

अंडे, अब तो ये सभी मौसम में खाये जा सकते हैं. उसने हँसते हुए चाक़ू की धार के दूसरी तरफ़ से टूक टूक कर तोड़ा और सहेजकर गरम फ्राइंग पेन पर उड़ेल दिया.

अच्छा है तुम अंडे खाने लगी.

क्यों ? अब ये वैसे भी वेजेटेरियन केटेगरी में है.

न न.……  वेज, नॉनवेज की बात नहीं !

तो क्या ?

बात मानसिकता की है.

लो तुम फिर फेमिनिस्ट अप्रोच लेकर शुरू हो गये, जैसे दुनिया भर की चेतना की शुरुआत प्रोग्रेसिव लेडी के किचन से होती है. आमलेट को पलटते हुए वह यहाँ तक, रोज़ाना की बातचीत की आदी सी हो गयी थी.

तो क्या अब उसी तरह से जवाब दिया जाना ही किसी समस्या का समाधान है.

अब कौन सी समस्या है…! उसने फ्राइंग पेन से आमलेट मिहिर के चपटी तिकोने वाली प्लेट पर डालते हुए पूछा।
देखा न ! एक प्रोबेशनर को 13 मौतों के बाद लगने वाले पहले ही शिविर में सारे काम सौंप देना, फिर कहना लड़कियाँ किसी से कहीं कम नहीं.

"बात कुछ और ही है"  किचन से बैडरूम के वार्डरोब की तरफ जाती हुई उसने कनखियों से इशारा किया.

अनुभा मैंने कहा था न, वो विडियो* रियल तो पहले भी नहीं लग रहा था. तुमने [विडियो* - हरियाणा में एक बस में कथित छेड़छाड़ होने पर दो लड़कियों द्वारा एक लड़के की पिटाई का वायरल हुआ विडियो] ध्यान से नहीं देखा होगा. मगर खुद उसका ध्यान पिछले साल हेल्थ डिपार्टमेंट से बतौर बेस्ट प्रोबेशनर अनुभा को गिफ्ट में मिले चपटी तिकोने वाले प्लेट पर था.

ज़रा वो सॉस देना ! सरपट आकर अपनी प्लेट उठाते हुए अनुभा ने लगभग उसे अनसुना कर दिया.

हाय रे मीडिया, मोबाइल, माहौल......!!!

और तुम………!!!  अनुभा ने हलकी चुटकी ली.

लो आमलेट खाओ.

बॉयल होता तो ले लेती, तुम फिनिश करो, फ्राई पसंद है न तुम्हें.

वीडियो भी डीप फ्राई ही था, सारे जमाने को पसंद आया. मगर हाइजीनिक नहीं था. अब जाकर समझ आ रहा है.

देर तक लौट पाउंगी … कल की तरह. स्कूटी पंक्चर न हो भगवान.

"अब लडकियाँ भी कम नहीं सच में... !" मिहिर के फोरहेड की तीनों लाइने एक दूसरे से टकरा सी गयी थी.

अंडे तोड़कर यॉक लिक्विड फ्राइंग पेन में डालना, रोज़ किसी के पसंद का चटपटा बनाना, 70 साल से अधिक उम्र वाले ऑपरेटेड बुजुर्गों को शिविर में संभालना, या फिर बस में किसी लड़के की "इज्जत" लेना, घर आकर रोज़ Temazepam की तरहपेश होना ... कैसे हाइजीनिक होगा. अनुभा जानबूझकर बस बुदबुदा रही थी.

सुनो !! ऑफिस से लौटते समय डॉयक्लीनर्स से अपने गरम कपड़े लेते आना तुम्हें ठण्ड जल्दी लग जाती है न, …… उसने यह बात मिहिर के सुनने भर आवाज़ में कही थी.



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समीर





Saturday, July 5, 2014

चारमीनार का नारको टेस्ट २

ये क्या हुआ...आया तो था नारकोटिक्स केसेस में कुछ बेहतर साइंटिफिक ऐड वाले इन्वेस्टीगेशन सीखने एक सेमीनार के लिए. पर शाम को घूमते फिरते जब चारमीनार देखने पहुँचा तो हैदराबाद से उसके पुराने रिश्ते के मद्देनजर धीरे से कुछ जानने की इच्छा हो गयी. पूछा तो उसने साफ़ मना कर दिया. उससे इस कदर बेरुखी की उम्मीद न थी. मैंने उसे एक बार भरी नजर से देखा और लम्बी सांस लेने की इच्छा के बावजूद वहाँ पसरी गर्दी को महसूस कर घुटे हुये से आवाज में फिर मिन्नत की. पुराना, बेहाल, निपट चुके बूढ़े, तिस पर एक मीनार पर बंधी मरहम पट्टी।  फिर भी जवाब आया..न.  इसके इसी जिद ने इसे इस हाल में पहुँचाया होगा . ऐसा सोचते हुए मीनार से पूछा - तुम कौन सी बात नहीं बताने के लिए यूँ चुप्पी लगाये हो. उस निजाम, उन ताबेदारों या आज के रहनुमाओं के. यहाँ से गुजर रहा हरेक शख्स तुम्हारे वजूद से बाख़बर पर तुमसे बेख़बर है. पर तुम कहो न कहो यहाँ तिजारत करते दिख रही बुर्का वालियों की तरह इस आधी चाँदनी और  मोतियों की दूकान वाली आधी रौशनी में तुम्हारे चेहरे पर तारी  मायूसी कुछ बयाँ तो कर रही है. उसे पढ़ने की कोशिश करते ही तुरंत ख़याल आया ये क्या.. इसमें क्यूँ इमोशनल होकर वक्त जाया किया जाये.क्यों न आज की क्लास में सीखे फार्मूला को आजमाया जाये. इस बेजान बन रहे मगर  अपने आग़ोश में कई इतिहास छुपाये चारमीनार से उसकी दास्ताँ सुन ली जाये... क्यूं न चारमीनार का "नारको टेस्ट' कर लिया जाये.



                         इसी तरह चारमीनार से गुफ़्तगू शायद थोड़ी देर और चलती लेकिन साथ ही चल रही "सीमा" [ मेरी पत्नी ] ने अपनी "मनुहार" वाली आवाज से क्रम तोड़ दिया- देखिये, कोकिला के लिए कोई छोटा मोटा खिलौना लेके मोतियों की दुकान पर चलते हैं मुन्नू ने यहीं का पता बताया है. हाँ यह ठीक रहेगा- मैंने बिना कुछ ज्यादा सोचे कह दिया. कैमरे को पाकेट में रखते हुए मैंने चारमीनार से "ख़िदमत में सलाम अपुन" के अंदाज में सर झुकाया तो उधर से तुरत फुरत में जवाब मिला- इस तरह के ख़िदमत से बेहाल हूँ. कुछ ना कहो यार. मैंने कुछ न कहते हुए सीमा की ओर निगाहें की किया इशारे में ही कल फिर आने की बात चारमीनार को समझाते वहाँ से मोतियों की दुकान की तरफ रवाना हो गया. मोतियों की दूकान पर मोबाइल हाथ में लिए सवालों का एक खाका तैयार करने लगा। …… लिखा 

 ऐ चारमीनार बता..

@ सबसे पहले निजाम के विरासतों में क्या हैदराबाद का ये हाल भी शामिल है. तुम्हारे एक मीनार के पाए पर आबाद मंदिर नुमा घेराबंदी क्या हमारी गंगा-जमुनी तहजीब का एक रंग है, या हमारे सेमीनार को-ऑर्डिनेटर रामाराव और मेरे ड्राईवर वाहिद जैसे लोगों के डर का एक अबूझ हिस्सा ?

@ एक तरफ डॉट कॉम के चमचमाते ऑफिस है तो दूसरी तरफ दस्त कम और जवानी बढाने वाले हकीमों के विज्ञापन भी है..तुम किसकी तरफ हो चारमीनार ?

@ हैदराबादी बिरयानी का ग्लो साइन बोर्ड पर प्रचार करते पैराडाइज शाप और उसकी ब्रान्चेस है और उसके साथ-साथ वो टपरे भी है जिनके बाहर हकाली गयी भेड़ें-बकरी भी जो बेकदरी से  छिले-कटे और लटके अपने साथी को निहारते  ख़ुद की बारी का इंतज़ार कर रही है. क्या वो कातर निगाहें अक्सर तुम्हारी ओर भी देखती है चारमीनार ?

@ हुसैन सागर पर शान्ति के प्रतीक स्वरुप बुद्ध की वह प्रतिमा, कद के हिसाब से बने अपने बड़े-बड़े कानों पर हाथ धरे दिखती है, जो नेकलेस, वी.आई.पी.रोड से घिर चुके झील पर चल रहे स्टीमर्स, मोटर बोट, उस पर सवार लोगों के शोर और झील के किनारे महा नगरनिगम की निगाह में किरकिरी बने झुग्गियों से आती रोजमर्रा के चीखों से बचना चाहती है. ऐसा मैं सोचता हूँ..पर बुद्ध कहते है...चारमीनार जाने.

@ मेरा ड्राईवर वाहिद पिछले 15 साल से ड्राइवरी करता, 35 साल से हैदराबाद में रहता है.वालिद के इंतकाल से पहले से ही काम करने लगा फ़िर इंतकाल के बाद उस काम के अलावा कुछ कर भी ना सका. शायद इसीलिए केवल तेलुगू में लिखे बोर्ड को मुझे पढ़कर नहीं बता सकता. बोलता है मदरसा भी नहीं जा सका, अपनी जबान में तुमसे शिकायत भी नहीं कर सकता. मैं पूछता हूँ.. वाहिद ! फ़िर तुम खुश कैसे रहते हो.. ? वह मुस्कराते हुए कहता है- साब, ये तो चारमीनार जाने.

@ आसपास के ग्रामीण, उपनगरीय लोगों को मिला लिया जाये तो करीब एक करोड़ की आबादी को चलने-फिरने लायक बनाती यहाँ की ट्रेफिक व्यवस्था, गलियों,सड़कों से लेकर प्रस्तावित मेट्रो रेल. सब खराब पड़े ऑटोमेटिक सिग्नल पर खड़े ट्रेफिक पुलिस की तरह है जो कभी सिग्नल, कभी भीड़ तो कभी अपने नाक पर बंधे रुमाल को देखता है. और हर एक मिनट में हांथो से इशारा कर पूरे मन से सिग्नल को कोसता है. मैंने एक सिग्नल पर किसी सिटी बस से डेस लग जाने पर निराकार हो गये ऑटो रिक्शा के निर्विकार चालक से कुछ पूछने की मुद्रा बनाई तो वह उसी भाव से कहता सुनाई दिया- मई कयाँ बोलूँ, सब चारमीनार जाने.

@ और हाँ, केंद्र सरकार और राज्य सरकार के गिने-चुने शासकीय भवनों के अलावा कहीं भी हिंदी का कोई बोर्ड नहीं, बाजार में हिंदी विज्ञापन नहीं, पी.वी.आर तक में हिंदी सिनेमा नहीं, कथित हिंदी पट्टी के सेलिब्रिटीज का नामोनिशान नहीं [ धोनी के एक्का-दुक्का बोर्ड को छोड़कर ], बुक स्टाल पर हिंदी किताब, मेगजीन भी नहीं, हिंदी में सूचना नहीं, हिंदी में जानकारी नहीं, हिंदी अखबार भी नहीं. एक बात सुकून का है आम आदमी हिंदी समझता है और जवाब भी कमोबेश दे देता है. इससे यह भ्रम जरुर दूर हो रहा है कि क्या जरुरी है. हम हिंदी प्रदेश वाले भी इन्हीं नाटकों के अलावा हिंदी में करते क्या है, जो हम करते है वो तो ये भी समझते है. पर एक चिंता जरुर होने लगी कि चारमीनार से सवाल हिंदी में करूँ या फ़िर...!

@ इस महानगर के भविष्य के बारे में बात करने पर मेरे ड्राईवर वाहिद की एक बात याद रह जाती है - साहब जी ! तेलंगाना वालों ने पिछले कई सालों से हलाकान कर रखा है. बंद, बंद फ़िर बंद सब ठप्प हो गया है. मैं उससे कुछ पूछता मगर क्या पूछूं ! जाहिर है, सवाल तो वह कर रहा है...! क्यों चारमीनार..?

ओहो..हैदराबाद में और भी बहुत कुछ है....बहुत से सवाल हैं मगर आज इतना ही...

सभी के ख़िदमत में सलाम अपुन का.

हैदराबाद डायरी.


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समीर यादव 

चारमीनार का नारको टेस्ट

March 9, 2011 at 8:23pm
ये क्या हुआ...आया तो था नारकोटिक्स केसेस में और बेहतर साइंटिफिक ऐड के साथ इन्वेस्टीगेशन पर सेमीनार के लिए..पर शाम को घूमते फिरते जब चारमीनार देखने पहुँचा तो हैदराबाद से उसके पुराने रिश्ते के मद्देनजर धीरे से कुछ जानने की कोशिश की तो उसने साफ़ मना कर दिया. उससे इस कदर बेरुखी अपेक्षित नहीं थी. मैंने उसे एक बार भरी नजर से देखा और लम्बी सांस लेने की इच्छा के बावजूद वहाँ पसरी गर्दी को महसूस कर घुटे हुये से आवाज में फिर मिन्नत की. पुराना, बेहाल, निपट चुके बूढ़े, तिस पर एक मीनार पर मरहम पट्टी बंधी फिर भी जवाब आया..न. इसके इसी ज़ज्बे ने इसे इस हाल में पहुँचाया होगा ..ऐसा मन में सोचते मीनार से पूछा- तुम कौन सी बात नहीं बताने के लिए यूँ चुप्पी लगाये हो. उस निजाम, उन ताबेदारों या आज के रहनुमाओं के. यहाँ से गुजर रहा हरेक शख्स जैसे तुम्हारे वजूद से बाख़बर पर तुमसे बेख़बर. तुम कहो न कहो यहाँ तिजारत करते दिख रही बुर्का वालियों की तरह इस आधी चाँदनी और  मोतियों की दूकान वाली आधी रौशनी में तुम्हारे चेहरे पर पसरी मायूसी कुछ बयाँ तो कर रही है. उसे पढ़ने की कोशिश करते ही तुरंत ख़याल आया ये क्या.. इसमें क्यूँ इमोशनल होकर वक्त जाया किया जाये.क्यों न आज की क्लास में सीखे फार्मूला को आजमाया जाये. इस बेजान बन रहे पर अपने आग़ोश में कई इतिहास छुपाये चारमीनार से उसकी दास्ताँ सुन ली जाये... क्यूं न चारमीनार का "नारको टेस्ट' कर लिया जाये.

चारमीनार का नारको टेस्ट ..... जारी ....हैदराबाद डायरी के साथ..!

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समीर यादव 

Saturday, August 17, 2013

नाईट गश्त में चेकिंग



वूं वूं वूं ......................वूँ....वूं...!!!!!

अरे कितनी बार कहा गश्त के दौरान सायरन या हूटर मत बजाया करो और हाँ पीली बत्ती भी जलाने की जरुरत नहीं है.

वो क्या है न सर, फिर पॉइंट ड्यूटी वालों को पता कैसे चलेगा हम चेकिंग में आये हैं. मैं तो केवल पॉइंट पर ही बजाता हूँ.

इस चेकिंग के चक्कर में वो लोग डीसी [ड्यूटी सर्टिफिकेट] लिए बस अपने पॉइंट पर खड़े रहते हैं, मेरा बस चले तो ऐसे डीसी चेकिंग ही बंद कर दूं. वायरलेस सेट क्यों दिया है कॉल नहीं कर सकते.

सभी पॉइंट वाले के पास थोड़े ही है सर, और जो हैं वो भी किस हालत में हैं आप तो जानते हैं. किसी की बैटरी डिस, तो किसी से आवाज ही नहीं आती. ये हूटर वाला आईडिया सबसे बढ़िया है, इसीलिये सिकरवार साहब कहते हैं- “स्साले जब हम अपनी नींद रात में खराब कर रहे हैं तो इनको भी कोई हक़ नहीं है सोने का. करो हल्ला, जागते रहेंगे तो कम से कम कुछ तो क्राइम रुकेगा.”

और गोविन्द कैसा चल रहा है, सब ठीक है तुम्हारे पॉइंट पर 
जी सर !
वो मुन्ना खटिक को चेक किया, पता चला है जेल से छूट गया है.
हाँ सर, लेकिन घर पर कभी नहीं मिलता. बस उसकी माँ और भाभी रहती है
अरे कभी सुबह सुबह दबिश दिया कर, वो भी छत पर, तब मिलेगा ओके 
इस तरफ परवेज डेंजर, अशरफ डॉन, कन्नू काडर को भी दिखवा लेना गौतम....! स्साले...... कुछ न कुछ करते रहते हैं. 
हाँ सर ! आजकल कन्नू काडर अध्यक्ष बनने के चक्कर में झांसी के खूब चक्कर लगा रहा है.. गौतम ने अपना सर जिप्सी के पिछले हिस्से से डी.एस.पी.के कान के पास लाकर बताया  

अरे गौतम ! उधर देखना गली के अन्दर उस मकान की लाइट इस वक्त कैसे जल रही है.

जी सर !

जैसे ही गाड़ी रुकी वहां से कुछ आवाज आते हुए भी सुनाई दी. सब इंस्पेक्टर गौतम उसके साथ गनमेन और एक होमगार्ड फुर्ती में गाड़ी से कूदे और मकान की तरफ दौड़ लगा दिए.

मकान के नजदीक पहुँचने पर वहाँ से आती आवाज लगभग शोर में बदल चुकी थी. मुमकिन झरोखों और दरवाजों से अन्दर झाँकने के बाद भी कुछ ज्यादा समझ नहीं आने पर गौतम ने दरवाजा खटखटाना शुरू किया. थोड़ी देर तक कोई जवाब नहीं मिलने पर पुलिस वालों का गुस्सा और आवाज देने की फ्रिक्वेंसी अपने आप बढ़ने लगी. भीतर तक आवाज पहुंचाने के लिए वे दरवाजे पर हाथ की जगह मुक्के और लात मारने लगे और हाँ मुंह से.... #$%^%$ [ हाँ इसका मतलब गाली है, आपने सही सोचा ]

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला.

पहले दौर में एक दूसरे को हैरानगी से देखा-देखी के बाद गौतम ने ही पूछा - "अरे इतनी रात को तेज आवाज में टेप बजाकर तुम क्या कर रहे हो."

“अपने घर में मैं कुछ भी करूँ आपसे क्या मतलब” – उस अधेड़ से भी अधिक उम्र के लग रहे है आदमी ने जवाब दिया.

“लेकिन इस उम्र में तुम्हारी ऐसी हरकत से दूसरे परेशान हो रहे हैं. बहुत हो गया, चलो अब सो जाओ..@#$@@ के”- गौतम ने कहा

“किसी को कोई प्रॉब्लम नहीं है तुम नाहक ही मुझे परेशान मत करो....और मुझे @#$%$$ मत दो”- आदमी ने कहा

"तुम हमें प्रॉब्लम समझाओगे #$%^&$ ....., अरे वीरेंदर ले चल इसको".

देखते ही देखते माहौल खराब हो गया और पुलिस ने उस आदमी को टेप रिकार्डर के समस्त सहायक उपकरणों के साथ जीप के पिछले हिस्से में ला पटका.

"सर ! ये तो बहुत #$%^# आदमी है इसे थाना ले जाना पडेगा..." गौतम रिपोर्ट देते हुए बोला.

हाँ चलो, मोती मस्जिद की तरफ से पॉइंट चेक करते हुए इसे कोतवाली छोड़ देंगे

बिठाओ इस @#$%## को और हाँ 109 कर देना, दो चार दिन उधर की हवा खा लेगा तो समझ आयेगा इसे. [पंद्रह मिनट बाद कोतवाली थाना में]

चार दिन तो नहीं दो दिन बाद उसी कोतवाली थाने में ........ सर एक रिपोर्ट करनी है. [दो घबराए से युवक मुंशी के सामने आकर कहने लगे]

बोलो ! मुंशी ने नहीं उसके मददगार ने कहा

सर हम अपने एक रिश्तेदारी में तीन दिन पहले महराजपुर गए थे. पिताजी की तबियत कुछ ठीक नहीं होने से वो यहाँ घर में रुक गए थे. आज सुबह जब हम लौटे तो पिताजी घर पर नहीं मिले...

अरे आस-पड़ोस से पूछा, जान-पहचान वालों से तस्दीक की.....आखिर कहाँ जायेंगे इस उम्र में. वाक्य पूरा होने से पहले ही मुंशी लड़कों की उम्र का अंदाज लगाकर समझाने लगे.

जी साहब पूछ लिया. कहीं से कोई खबर नहीं मिली. हमें बहुत डर लग रहा है सर.

अरे ऐसा करो घनश्याम ! गुम इंसान कायम कर लो - मुंशी जी ने अपने मददगार से रूटीन अंदाज में कहा.

हाँ क्या नाम है तुम्हारे पिताजी का, उम्र, पता, हुलिया, कपडे क्या पहने थे, कहाँ-कहाँ रिश्तेदारी है सब बताते जाओ. हाँ अभी-अभी का एक फोटो भी लगेगा.

जी साहब फोटो है...ये लीजिये. फोटो हाथ में लेकर मुंशी एक बार गौर से देखता है.

सर एक और बात है, घर मे बाक़ी सब तो ठीक है लेकिन पिताजी के कमरे से पूरा साउंड सिस्टम ही गायब है. हमें ये समझ नहीं आ रहा है कि पिताजी उस टेप रिकार्डर को लेकर आखिर कहाँ और क्यों जायेंगे, इसीलिए डर भी लग रहा है. घबराये हुए दोनों बेटे लगातार अपनी आशंका को जाहिर करने की कोशिश करने लगे.....

अरे कुछ नहीं हुआ है तुम्हारे पिताजी को, घबराओ नहीं बैठो. अभी पता लगाते हैं......कहते कहते मुंशीजी ने फटाक से 109  के रजिस्टर से गुम इंसान का रिकार्ड सरसरी तौर पर मिलान करते हुए कनखियों से मालखाने में रखे टेप रिकार्डर का जायजा भी ले लिया. फिर धीरे से मददगार घनश्याम से कहा - "जा बाहर ले जाकर इन्हें बता, कोर्ट से जमानत करा ले, रंगरेलियां मनाते पकड़े गए अपने बाप की..."


साहब ....... ! रिपोर्ट लिखानी है



हेलो...... !  
ये सोचते हुए फ़ोन कान से लगा लेता है कि नाम देखे बगैर फ़ोन उठा लो तो "हेलो" कहना ही रह जाता है 

नमस्कार सर ! शंखवार निवेदन कर रहा हूँ सर ..!
दूसरी ओर से ऐसी आवाज आने पर वह सहज हो जाता है. 

अरे टी.आई.साहब, "महिलाओं एवं कमजोर वर्ग के प्रति संवेदनशीलता" वाली कार्यशाला से कब लौट आये. कार्यशाला के "सब्जेक्ट" को जानबूझकर चबाकर बोलते हैं.  
अबकी तीसरी बार थी न सर, इसलिए दो बजे ही लौट आया था.... बिना लंच पेकेट लिए. फिर थाने से बार-बार फोन आ रहा था, एक 376 की रिपोर्ट आई है, इसलिए सीधे थाने ही आ गया था.  
अरे किसकी रिपोर्ट है ?  क्या हुआ ? ..... चेहरे से सहजता जाने लगी.
बडकुवाँ गाँव की है सर, एक महिला आई है अपने पति के साथ. सर आसपास लोकेशन हो तो थोड़ा आप भी आ जाइए न थाना तक.... ठीक रहेगा.
कैसे, कुछ सीरियस है क्या ?
नहीं सर, लेकिन मामला थोड़ा देखना पड़ेगा.
ओके ..... मैं पहुँचता हूँ.

[विशेष - थाने पर टिपिकल बॉलीवुड मूवी जैसा कोई माहौल नहीं है.]
हाँ बताओ !  - टी.आई. ने पति से पूछा 
ये मेरी पत्नी है इसके साथ गलत काम हुआ है.
कब ? टी आई की निगाहें अब उस महिला की तरफ थी. 
साहब, कल मैं तो घर पर था नहीं.......
तो फिर ....पति को बीच में रोकते हुए टी.आई. ने झुंझलाकर कहा - तुम बताओ बाई ???
लम्बी चुप्पी.............!
घबराओ नहीं ...बताओ ! पति ने भरोसा देने के अंदाज से जोर दिया 
हाँ साहब...! "कल दोपहर बाद जब हम जेवन कर अकेले घर में थे, तभी हमारे जेठजी आये और हमारे साथ जबरदस्ती गलत काम किया." महिला निगाहें फ़र्श पर गड़ाये बुदबुदाने लगी. 
टीआई, डी.एस.पी. और डे ऑफिसर तीनों की निगाह एक साथ मिली, चमकी, फिर पूछताछ शुरू .... 

कल क्यों नहीं रिपोर्ट किया ? 
साहब ये छतरपुर गए थे, रात में आये फिर हमने सबकुछ इनको बताया. रात गहरा गयी थी सो आज रिपोर्ट करने आये 
जेठ कहाँ रहता है ??
वहीँ पड़ोस में साहब - पति ने जवाब दिया 
और सास ससुर ...?
वो जेठ के साथ रहते हैं.
पहले कभी इस तरह की कोई निगाह या हरकत की थी उसने ?
समझ में नहीं आया साहब.... क्या पूछे ?
अरे, मतलब ये कि पहले कोई झगड़ा, विवाद तो नहीं हुआ था उससे ?
ना साहब !   
भाईयों में बंटवारा कब हुआ, शादी कब हुई, कितने बच्चे हैं, बंटवारे में जमीन-जायदाद का कुछ विवाद है क्या, चुनाव में कौन जीता, तुमने किसको वोट दिया था, गाँव में पार्टीबाजी है ?  उसमें तुम किस तरफ हो....?
सवाल कभी पीड़ित महिला तो अधिकांशतया पति समरथ सिंह से पूछा जाने लगा. 

अरे समरथ सिंह तुम्हारे जमीन का मामला तो कोर्ट में चल रहा है न !
जी साहब ! वो तो गजब दिन हो गए. समरथ सिंह खिसककर पत्नी के ओट में होने की कोशिश करता है.
कल तुम्हारे गाँव के फग्गन ठाकुर के यहाँ कोई कार्यक्रम था, सुना है बड़ी दूर दूर से जात-समाज के लोग आये थे जी हुजूर ! 
तेरी ससुराल कहाँ है, मतलब तेरी पत्नी कौन गाँव से आई है ?
कुदारी कलाँ, थाना महराजपुर के शम्भू सिंह की लड़की है.. साहब

इस बीच टी.आई. थाने के दीवान और एम्.एल.सी. कराने के लिए तैनात कांस्टेबल को बुलाकर कान में कुछ कहता है और इसके थोड़ी देर बाद कुदारी कलाँ गाँव  का रहने वाला कांस्टेबल विजय सिंह धीरे से पूछताछ का मुआयना कर रहे डी.एस.पी. को सेल्यूट कर निवेदन करता है - सर, शम्भू सिंह एक रिश्तेदारी में कल से बडकुवाँ गाँव आया हुआ है. कोटवार को ताक़ीद कर दिया है, उसको लेकर थोड़ी देर में वह थाने पहुँच जाएगा.  

करीब एक घंटे बाद ....
अब टी.आई. के कक्ष में हो रही पूछताछ में एक व्यक्ति और बढ़ गया, वह था ... शम्भू सिंह 
पूछताछ महिला से शुरू होती है और वह पीड़ित महिला पहले वाली ही बात को .............ठिठक-ठिठक कर दोहरा की कोशिश करती है...... "साहब.......... बुरा काम किया" 
यह सुनकर वहाँ मौजूद एक व्यक्ति अवाक हुआ, वह था शम्भू सिंह. बाक़ी तो पहले ही सुन चुके थे.
वह तुरंत बोल पड़ा - क्या बोल रही हो ? मैं कल से फग्गन के घर हूँ. समरथ तुमने कुछ बताया ही नहीं और शामलाती [पीड़ित का जेठ] तो कल दोपहर से शाम तक वहीँ कार्यक्रम में मौजूद था. तभी तो समझ ही न आये कि पुलिस आखिर मुझे क्यों बुला रही भला. अब घरबार की इज्जत को इस तरह थाना-कचहरी तक लाओगे तो क्या रह जाएगा. एक सुर में बोलते हुए शम्भू पीड़ित महिला की तरफ घुम गया - "अगर ये सच है तो बोल बेटी ! बड़ी बात है ....!
 फिर एकटक अपनी बेटी को देखता दीवार से घिसटकर जमीन पर बैठ गया शम्भू सिंह.


टी आई के कमरे में कुछ देर लम्बी चुप्पी.....................पसरी रही   !
एक तरफ पुलिस वाले निगाहों से इशारे कर रहे थे, तो दूसरी तरफ आँखे चुराने का खेल सा हो रहा था. जो थोड़ी देर में आंसुओं से डबडबाने लगी.
"बाबूजी.......... तुम्हारे सामने झूठ न कह सकेंगे" - वह बिना आँसू पोछे बोलने लगी 
तुम्हारी सों ... इन्होने कहा हमसे, जो जमीन बचानी है तो केस में समझौता करानी जरुरी है... तो उसके लिए एक मुकदमा हमारी तरफ से दरज करानी होगी.... इसी खातिर हमसे ये रिपोर्ट कराने लाये हैं. हमने मना किया था, नहीं माने.

अब उसकी निगाह पिता से पुलिस की तरफ हुई.. 
साहब.....! रिपोर्ट लिखानी है, हाँ लिखानी है हमें, पर हमारे पति के खिलाफ. वैसे तो हम थाने कभी न आते, पर ये ले आये हैं तो लिखिए..... कितना जुर्म करते हैं ये हम पर, हमारे बच्चों पर, सब बरबाद कर दिया पी-पीकर, न कमाना न कोई उदम करना, न जमीन रही न इज्जत, अब ये धत करम ही रह गया था सो ...... लिखानी है रिपोर्ट.
पति सरककर दरवाजे से बाहर खड़ा हो जाता है और बेटी पिता के गले लगकर रो रही है.

Tuesday, July 30, 2013

जा कुलच्छनी........! सब बरी हो गए





















तुम क्यों आये रिपोर्ट करने ...?
फुसफुस..फुसफुस.....
हाँ कारण ही कान में बताता है.
ऐसी रिपोर्ट हुई तो गुम इंसान ही कायम होना था, लिखा नाम, पता, हुलिया, अंतिम बार कब, कहाँ, किसके साथ देखी गयी.

खोजबीन हुई ........ हाँ भई सच में हुई
न वो मिली, न उसकी लाश ! [ओह इतनी जल्दी लाश क्यों लिख दिया]  

अब जिद से थाने में पहले कान में फुसफुसा कर बतायी गयी कहानी जोर से खुले में सबके सामने सुनाई गयी.
मामला ही ऐसा था कि.......
केस में मर्डर की धारा बढ़ाई गयी [हाँ ठीक सोच रहे हैं अजूबा ! डेड बॉडी मिले बिना]

फिर खोजबीन हुई....... हाँ भई ठीक से हुई 
नहीं मिली, मिलनी भी नहीं थी  
रामपुर बन्नौदा जिला शहडोल से बहती नदी की तेज बलखाती धार से गुम हुई थी वह, ज़िंदा.
सुनते हैं वह तो धकेले जाने से पहले ही मर सी गयी थी. हाँ कारण बताया गया था उसे पहले.

समय गया, बातें रह गयी.... लाश तक नहीं मिली.
हाँ ठीक सोचा आपने, सुराग.... वो भी नहीं मिले.

फिर भी पुलिस ने गवाह, सबूत जुटाया और न्यायालय में चालान [चार्जशीट] किया....... उंची कुल-जात की लड़की को गाँव के चमरापारा के लड़के से कुजात-पियार हो गया. लोक-लाज का लिहाज न रखी. धत ! कितना चेताया, कोई ऐसा सोचे भी न, मिसाल रहे. घर से निकाला चोटी पकड़कर, कपड़े थे बदन पर, बेटी थी आखिर, सब अपनों की भीड़ भी थी इसलिए बस चप्पल-जूते की चपत लगाते, कानों में शीशा घोलते, घसीटते... उफनती नदी के किनारे लाये, धकेल दिया...... जा कुलच्छनी !!!

पुलिस भी न ....पक्का केस बनाकर....ये सब न्यायालय में पेश किया था 
हाँ साहब, पियार था दोनों में, मिलते थे, एक दूसरे को देखकर हँसते भी थे
हाँ साहब, महराज के घर में झगड़ा हुआ था
जी साहब, बहुत भीड़ थी, सब चिल्ला रहे थे मारो-मारो....
हाँ साहब, वहाँ गिरने के बाद किसी को दिखी नहीं
इन बयानों के साथ पुलिस ने चप्पल, चूड़ी के टूटे टुकड़े, एक मोबाइल, चुनरी भी जप्त किया था.

पर मानिए उसके घर देर है अंधेर थोड़े, आखिरकार छह साल बाद न्याय मिल गया.
ऐसे कोई जांच होती है भला. लाश नहीं, जप्ती कुछ ख़ास नहीं, ऊपर से गवाह बोलते नहीं.
फैसला दिया-
"गवाह और सबूतों के अभाव में मामले के सभी आरोपियों को [हाँ माँ-बाप-भाई-चाचा सहित] बा-इज्जत बरी किया जाता है."