Tuesday, October 14, 2008

टिपियाने का मतबल....गिनती बढ़ाना और हक़ पाना है क्या..???



इसे लिखने हेतु प्रेरणा स्त्रोत हैं सम्मानीय समीर जी और नीशू जी
पहले उन्हें अभिवादन !! फ़िर टिपियाना शुरू.......


ब्लॉग लेखन की दुनिया में टिप्पणी को इतना महत्त्व आख़िर क्यों मिला ? इसका मूल कारण है. ब्लॉग में विसिटर्स की पहचान और संख्या याने ट्रैफिक का सही जानकारी नहीं हो पाना है. हम अपनी पोस्ट रचना पर सुधी ब्लागर्स के टीप की अधीरता मय व्यग्रता से प्रतीक्षा इसीलिए करते हैं कि उस रचना के सम्बन्ध में लोगों की राय क्या है.

लेकिन यह भी सोचने का विषय है कि किसी भी क्रिया, प्रतिक्रिया और उसको लिखने, पढ़ने वाले कि कोई सीमा है कि नहीं. व्यक्ति विशेष की पठन पाठन, पसंद, नेट कनेक्शन की गति, ब्लागर के मति की गति, समय और फ़िर ब्लॉग अथवा ब्लागर विशेष से लगाव ......और पता नहीं कितने ऐसे कारक हैं, जिनसे किसी पोस्ट विशेष पर टिप्पणी लेखन निर्भर करता है. यह शिकायत आम है कि बहुत सुंदर, उम्दा, बढ़िया, आभार, धन्यवाद, जारी रहें से उस वक्त लिख रहे टिप्पणीकर्ता के अतिरिक्त सभी को एलर्जी है..सभी चाहते हैं कि वह लिखे या न लिखे लेकिन उसके पोस्ट पर विस्तृत, विश्लेषणात्मक, भावनात्मक टिप्पणी जरुर लिखी जाये. पर यह सम्भव है या नहीं यही तो चर्चा का विषय है, और इंशा-अल्लाह आगे भी बना रहेगा.

अब इस पर ज्ञान, सलाह तो यह भी दी जायेगी कि " भईया अजीरण होते तक न पढिये...के टीपे करने लायक न रह जाए. वैसे तो " .टिप्पणियों को अनेक प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है....एक वो जो सबको भाती है, दूसरी वो जो ठीक लगती है पोस्टकर्ता और अन्य टीपाकारों को, तीसरी वो जो केवल टीपाकार को ही ठीक लगती है कि हाजिरी लग गई अब हक़ बन गया हमारा इन पर, एवम पोस्टकर्ता को गिनती बढ़ने का संबल देती और चौथी वो चेहरा छुपाये टीप जो स्वयं टीपाकार को टीस देती है और शेष को तो एलर्जिक जैसी ही होती है. टीप पर अनूप जी से प्रेरणा लेना श्रेयस्कर होगा जो अनेक टीपकारों के गुरु समान हो सकते हैं..एक लाइना में जो ब्लॉग का विषयवस्तु , शीर्षक का अवलोकन कर तुकांत कटार जैसी टीप देते हैं, वह न केवल संबंधित ब्लागर को अपितु अन्य विचरणकर्ता को भी वहां विसीट करने, न करने का मार्ग प्रशस्त कर देता है. क्या इस तरह की सारगर्भित टीप किसी भी ब्लोगर को अस्वीकार होगी. हो भी सकती है भइया...."'एक लाइना" कई बार केवल पोस्ट की लिंक बतौर ही होती है क्योंकि पोस्ट का शीर्षक पढ़कर तुकांत टीप लिख देना आप से अपेक्षित नहीं होता है. पर "चिठ्ठा चर्चा" का उद्येश्य पृथक होने से यह टीप की श्रेणी में आता है या नहीं यह भी चर्चा का विषय है."

मज़बूरी में अजीरण का रोग कई लोगों ने लगा रखा है..कोई निर्धारित.समय न होने का, नेट पर लगातार बैठकर शेष कार्यों से दूर होने का और फ़िर बचे हुए समय में रचनाओं के सम्बन्ध में सोचकर थकने का.

एक खास बात पर भी खूब मानसिक द्वंद और बहस होती है बल्कि कुछ ब्लागर ने बाकायदा "टिप्पणी चौकोर' के ऊपर उनकी आगत टीपाकार से क्या अपेक्षाएं है संकेत रूप में लिख रखा है. बाबा भावनाओं को समझो और वैसे ही टिपियाओ. कुछ ने निरापद होने और कुछ ने टीप को ही सबकुछ मान लेने जैसा भी संकेत किया हुआ है लेकिन एक अदद टिप्पणी कि चाह तो .....तो है.

लेकिन अपेक्षाओं की बयार इतनी दबाव लिए होती है कि टीप करनी ही है तो फ़िर सहज-सुलभ मार्ग तो अपनाया जायेगा ही. टिप्पणी को जब तक ब्लॉग में उपस्थिति के द्योतक के रूप में प्रतिष्टा मिली रहेगी यह प्रश्न बार-बार सभी ब्लागर बंधुओं के विचार में कौंधता रहेगा. इसलिए मेरा तकनीकी रूप से विशेषज्ञ ब्लागर भाइयों...रवि रतलामी , संजय बेंगानी, पंकज जी, श्रीश जी, समीर जी एवम अनेक....अन्य से निवेदन है कि वह ब्लॉग विसिटर्स की संख्या एवम उनके पहचान हेतु कोई तकनीक उपलब्ध हो तो कृपया हम सबको बतायें या न हो तो अविलम्ब उपलब्धता के लिए प्रयास करें.

फिलहाल यहीं तक, वैसे तो टिप्पणी पुराण बहुत जगह दे रही है, मुझे कुछ भी टिपियाने की. लेकिन मुझे लग रहा है कि इतना लिखने पर ही मुझे बहुत से टीप मिल जायेंगे. तो लालच बुरी बला से सराबोर यह टिप्पणी यही पर ख़तम .

टिप्पणी पर कभी फ़िर "टिपियाया" जायेगा....इसके लिए जरुरी है आप सब इस पर अच्छी टीप जरुर टिपिया दें . बिना टिपियाये या टिपिया के चलते न बने......वरना एक और झेलाऊ पोस्ट के लिए फ़िर तैयार रहिएगा.
.हा हा....हा....!

12 comments:

दीपक said...

सोलह आने खरी बात है !!सचमुच मे अनूप जी की एक लाईना माशा-अल्लाह है !रहा सवाल अनाम टीपाकारो का तो उन जैसे बिना गुर्दे वाले लोगो के लिये दया रखिये।आप भी जानते है शक्ती सबके पास हो सकती है पर साहस सबके पास नही होता।

Gyandutt Pandey said...

स्टैटकाउण्टर कुछ सीमा तक सहायक है। पर हिन्दी ब्लॉगरी शैशवावस्था में चले जा रही है और उस शिशु को सूखे का रोग भी है - बढ़ोतरी भी नहीं हो रही।
लिहाजा टिप्पणियां बतौर मुगली घुट्टी काम आ रही हैं।:)
बढ़िया लिखा।

Deepak Bhanre said...

श्रीमान अच्छी अभिव्यक्ति है . टिप्पणी तो टिप्पणी है अब इसके पीछे की भावना कौन समझे की कौन किस उद्देश्य से कर रहा है , जो भी हो किंतु टिप्पणी पाने वाले के लिए तो टिप्पणी एक टोनिक की तरह होती है . जो उसे और अच्छा लिखने हेतु मनोबल को बढाती है .

COMMON MAN said...

pahli tippani yah ki aajkal mp se bahut pps adhikari blog likh rahe hain, achchi baat hai, doosri yah ki too meri piith khuja, main teri khujata hoon, tippan do, tippan lo, teesari baat kuchh log din bhar daftar me baith kar plastic peeter ban jaate hain, lekh lamba tha lekin achcha tha,

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

भाई एक बात मै और जोड़ना चाहता हूँ कि टिप्पणी मिलने से ब्लागर का लिखने का उत्साह और मानसिक मनोबल बढ़ता है . टिप्पणी भी ब्लागर के लिए दवा का काम करती है . सराहनीय पोस्ट के लिए धन्यवाद्.

ajay kumar jha said...

tippni dene dilane par itna badhiya lekh par kar man prasann ho gaya, aur han anam tippnnikaaron kaa kya kaha jaaye, ye shaayad yahee ek kaam karne ke liye hain yahan par.

डा० अमर कुमार said...

समीर भाई, आपकी बात से सहमत तो हूँ, इस विषय को लेकर कुछ कटाक्षात्मक पोस्ट भी लिखीं हैं । पर अंततोगत्वा यह निष्कर्ष निकलता है, कि हिन्दी ब्लागिंग अभी प्रौढ़ नहीं हो पायी है ।

अधिकांश ब्लागिये षोडशी के मानिंद सज बज के,
इस कल्पनालोक में पोस्ट लेकर उतरते हैं । अब भला
कोई कमेन्ट न पास करे तो ज़ाहिर है, उनको अपने
पोस्ट की लुनाई पर संदेह होने लग पड़ता है । फिर..
पैंतरे बाजी, गुटबाजी, सहवास-प्रतिसहवास का एक
मिसन लेकर बाज़ार में आने पर उतारू होते हैं, एक ..
घटिया प्रक्रिया का जन्म हो रहा है ।
और बिना पोस्ट पढ़े टीपियाने की नेटवर्किंग के तो
क्या कहने ?

ताऊ रामपुरिया said...

अब हमने आपकी पूरी पोस्ट पढ़ ली है और आपने सही प्रश्न खडा किया है !
आपके सवाल का जवाब जिस हद तक दिया सकता है उस हद तक आ. ज्ञान जी और डा. अमर कुमार जी ने दिया है और मैं भी इससे पूरी तरह सहमत हूँ !
आपने जिस शैली में ये पोस्ट लिखी है उसे पढ़ कर बहुत मजा आया ! धन्यवाद !

Udan Tashtari said...

बहुत विचार योग्य आलेख है. कितने ही तो दृष्टिकोण हैं, जिसे लेकर टिपियाया जा रहा है आज-कभी विमर्श, तो कभी प्रोत्साहन, तो कभी आलोचना और कभी भड़ास आदि.

आपने अच्छा मुद्दा लिया, आभार.

संजीव तिवारी said...

समीर जी इस मुद्दे पर यहां चर्चा के लिए आपको आभार, बहुत कुछ बातें स्‍पष्‍ट हो गईं हैं ।

मेरा मानना है कि टिप्‍पणियां सार्थक हो एवं आवश्‍यक हो तभी की जांए, पर ज्‍यादातर पोस्‍टों को पढते वक्‍त सिर्फ दो शव्‍द में 'हम आपसे सहमत हैं' 'बढिया प्रयास' जैसी टिप्‍पणी दिल से निकलती है और कभी कभी पोस्‍ट ही समझ में नहीं आता, उपर से गुजर जाता है या यूं कहें कि दिल और दिमाग उसे स्‍वीकार ही नहीं करता वहां कामचलाउ उपस्थिति या तू मुझे खुजा मैं तुझे खुजाउं वाली टिप्‍पणी देनी ही पढती है ।

इसके स्‍थान पर इस बेहतर प्‍लेटफार्म में विमर्श होनी चाहिए गलतियों व सोंच का सुधार होना चाहिए लेखन कार्य एवं वाक्‍यविन्‍यास को परिष्‍कृत करने का उपक्रम होना चाहिए । यह तब संभव हो पायेगा जब हिन्‍दी ब्‍लाग अपने परिपक्‍वतावस्‍था में आयेगा ।

हा हा हा .... मतलब कि अब आपके पोस्‍टों में सिर्फ हाजरी लगाने से काम नहीं चलेगा, फंसा दिया डीएसपी साहब आपने ।

डॉ .अनुराग said...

टिपियाने का मतलब किसी के लिखे को आदर देना .ओर उसके विचारो को जानना है ....टिपियाने का मतलब एक दूसरे से संवाद कायम करना है ,टिपियाने का मतलब अपनी असहमति जताना भी है .टिपियाने का मतलब अपने खोल से बाहर निकल कर झांकना भी है.

राज भाटिय़ा said...

भाई मै तो इस टिपयाणे को यही कहुगां की कुछ मित्र बनजाते है, बंलाग जगत मै फ़िर सब बतीयातए है, कुछ ना कूछ राय सभी देते है आप की बात पर, इस से हमै बहुत सा अपना पन भी मिलता है, लेकिन हमै हमेशा तारीफ़ की उम्मीद नही करनी चाहिये, क्योकि दोस्तो मे बहस भी तो होती है...
धन्यवाद