Monday, November 29, 2010

स्त्री पर विमर्श ...फेक बुक

अशोक कुमार पाण्डेय जी के फेस बुक प्रोफाइल पर हुए "स्त्री पर विमर्श" को मैं उनके अनुमोदन की अपेक्षा के  साथ मित्रो के साथ साझा करने हेतु...सिलसिलेवार कुछ अंकों में पोस्ट कर रहा हूँ.....

एक पोस्ट पर की गयी टिप्पणी के बाद तमाम महिला मित्रों ने वहाँ भी और अलग से भी कहा कि भाई औरतें घर का काम अपनी ख़ुशी से करती हैं। यह स्वाभाविक है। अक्सर नौकर ख़ुशी से सेवा करना सीख जाते हैं…प्रभावी वर्ग की विचारधारा को स्थापित कर दिया जाता है सबकी विचारधारा के रूप में…यह कन्डीशनिंग कैसे होती है इसे सबसे अच्छी तरह से औरतों के संदर्भ में समझा जा सकता है कि कैसे जिन चीज़ों को उनकी स्वतंत्रता तथा यौनिकता को नियंत्रित करने के लिये लागू किया गया था वे उनसे ऐसी कण्डीशन हुईं कि उसे स्वाभाविक फ़र्ज़ मान बैठीं।


Lovely Goswami मैं तो घर के काम "ख़ुशी से" नही करती हूँ ...
November 25 at 9:52am · LikeUnlike · 3 peopleAshok Kumar Pandey and 2 others like this..

Sameer Yadav  यह 'स्मृति' लोप का शिकार क्यों नहीं होती...?
November 25 at 10:28am · LikeUnlike.

Atul Arora  - koi bhi kaam kaun khushi se karta hai ..daam milta hai to kaam hota hai ...usmein bhi alienation ka element to rahta hai hai ..main apne ghar mein maalik nahin ,ghar ke naukar ki tarah se hi hoon aur is se bachaav bhi nahin kyonki main ghar... ko chalaayemaan chaahta hoon . .mere liye ghar amoort nahin hai ..ek jeevit organic shakhsiyat hai jise agar aap marney nahin dena chaahtey --apney rahte -apney liye ..apneyi nourishment ke liye to yah karney mein sharm kyon aur ghar ki vyavastha ka naukar honey mein shoshan kaisa...?

'Manu Smriti' ke shadyantra ka main hissa nahin hoon ...main nahin jaanta koi smriti itani kroor aur aatankvaadi kaisey ho sakti hai ...iska virodh ho raha hai to bura nahin hai ... Jalaa diye jaaney chahiyein aise nirdesh ...kam se kam humein apni smriti zaroor saaf rakhni chahiyey...See More
November 25 at 10:30am · LikeUnlike · 3 people

Nirmal Paneri निर्मल पानेरी जी -बहुत बढ़िया ....दो इंसानों का प्यार भरा मिलन ...इस्वर के प्रेम का रास्ता ....और दो इंसानों का बेर ....राक्षस सिय गुण का मिलन !!!!!!!!!आब चाहे वो स्त्री स्त्री हो या पुरुष स्त्री हो ..या पुरुष पुरुष हो ....अलग अलग इंसानों और अलग अलग विचारधाराओं से इतिहास ...ने हम सब के बीच गुण की बात को गोण कर दिया है ...और सब आपनी अपनी ढपल बजने पर उतारू हो गए है ....बस विसगातिया वही से चालू हुई है ....मेरा मनना है ये !!!!!!!!!!!!!!
November 25 at 10:41am · LikeUnlike · 2 people

Ernest Albert- MEOW FM पर अनिल श्रीवस्ता ने एक कार्यक्रम तीन महीने चलाया था कमोबेश इसी विषय पे ! उसे सुनना चाहिए, एक अच्छा दस्तावेज़ जहाँ दिल्ली की हजारों सभ्रांत महिलाओं ने "खुल कर" इस स्टीरियोटाइप को सिरे से ख़ारिज ही नहीं किया, इसके विरोध में कमाल की ...बातें सहजता से कह डाली ! अपना देश ख़ासा ही दोगला, तीगला है जी ..जिस जिस को माँ कहता है , चाहे वो गंगा , गौ या अपनी हजारों देवियाँ , उनमें, उनके आसपास मूत्रालय , अधजली लाशें डालता जाता, खाप पंचायत खड़ी करता जाता ! किसी भी 'माता" का रोटी बनाता, झाडू लगाता पोस्टर आज तक तो देखा नहीं....तो औरत से ये सब किसने "कहा होगा", ये इंट्रेस्टिंग रहेगा जानना !पर अब तो जमाना आ गया की अपनी ही कम उम्र बेटिओं , बहनों को हम खुद कामुक कपडे पहना कर, कामुक गानों पर कामुक ठुमके लगाने के लिए स्टेज पर परोस देते और खुद उनकी विडिओ बनाने में झूमते ! और ऐसी "गति" के फेवर में नैतिकताएं भी बना ली गईं है, गढ़ ली गयी हैं ! अपने को बुरा नहीं लगता ये सब, बुरा तब लगता है जब मोरल पोलिसिंग वाले त्रिशूल उठा कर रुदाली बनते हैं ! रही बात निगरानी की...छोडो जी, द्रौपदी युग दस्तक दे रहा, आदमी अपनी निगरानी को तैयार रहे ! शुक्रिया अशोक भाई !
November 25 at 1:38pm · UnlikeLike · 5 peopleYou, Ashok Kumar Pandey and 3 others like this.

Aparna Manoj -यदि शोषण की बात है तो विरोध .. लेकिन घर के काम बेमन तो नहीं ही करते हैं ... बच्चों को और सारे घर की पसंद का बनाने में अलग मज़ा मिलता है ... कभी ऐसा नहीं लगा कि थोपा हुआ काम है .. ये भी एक skill है . किसी की रूचि है , तो वहाँ उत्पीड़न नहीं क...हलायेगा . मनु के ये नियम स्थापित थे.. आज व्यावहारिक रूप से इन्हें कितनी स्वीकृति मिली हुई है ... आम इंसान तो इन स्मृतियों को जानता तक नहीं ... वैसे आजकल दाम्पत्य में इतनी breathing space तो मिली हुई है ... लडकियां सचेत हैं ; अधिकारों के लिए .. ग्रामीण परिवेश में भी शुभ बदलाव आने लगा है ... शुरुआत तो कह सकते हैं इसे .
कल उड़ीसा की एक जनजाति के बारे में (शायद ओंजेस ) पढ़ रहे थे कि स्त्री पर यदि शंका हो जाए तो उसे अग्नि परीक्षा देनी होती है .. गरम अलाव हाथ में लेकर साक्षी मानना होता है ... हाँ , इन दुष्प्रवृतियों पर ध्यान केन्द्रित हो तो बेहतर ... और भी कई एक हैं जिन्हें समूल नष्ट करना ज़रूरी है .. किन्तु आमूल चूल परिवर्तन सरकारी नियम बनाने से संभव है और उनका पालन ठीक से हो ये देखना ज़रूरी है.
November 25 at 1:57pm · LikeUnlike · 4 people Amrendra Nath Tripathi and 3 others like this..

Vandana Sharma -आप कितना भी तर्क देते रहिये हम मनु स्मृति को बिना पढ़े भी इतना आत्मसात किये हैं कि ''नारी तुम केवल श्रद्धा हो '' को किनारे रख कुछ नही सोचेंगे ..हमारे 'मालिक' बड़े क्रपालु दयालु स्नेही और आज़ाद ख्यालों के हैं खाने पहनने कि आजादी है गिफ्ट, शाबाशी ...मिलती है ..उनके लिए क्या इतना भी न करें समाज परिवार सब बिखर जाएगा भई ..काम काज का बटवारा तो करना ही पड़ेगा .अब तो.सुपर वुमन हैं ..घर बाहर सब सभाल लेती हैं,घर तो घरवाली का है घर में चार पैसे आयें सो नौकरी करने कि आजादी भी है.ये सब करके संतोष और कंट्रोल का अहसास भी हो रहा है.पत्नी का धर्म जननी का फर्ज बहू के कर्तव्य.. कैसे होगा भला आखिरी बात.. ''जब मुझे प्रोब्लम नही तो कहीं प्रोब्लम नही'' समझे क्या ?
November 25 at 1:58pm · LikeUnlike · 3 people Ashok Kumar Pandey and 2 others like this..

Sameer Yadav -प्रसंगवश...... क़ल इसी प्रकार की चर्चा के दौरान एक पिता पश्चाताप करते हुए बता रहे थे कि कुछ दिनों पहले मैं अपनी विवाह योग्य पुत्री को पूर्व अनुमति लेकर साइबर केफे जाने पर २ घंटे बाद भी घर नहीं लौटने पर मोबाइल लगाकर पूछने लगा कि कहाँ हो...... अब तक क्यों नहीं लौटी.....वहाँ क्या कर रही हो...आदि आदि ! जबकि उसके पहले से बाहर गए पुत्र के लिए कोई चिंता नहीं की....बावजूद इसके कि पुत्री मुंबई के किसी मेनेजमेंट संस्था में अध्ययनरत भी है. मैं भी उस पिता के असमंजस में उलझा हूँ कि इसे एक पिता की पुत्री के प्रति स्वाभाविक स्नेहिल-चिंता कहें या फिर अवचेतन में आत्मसात मनुस्मृति का कुप्रभाव.
November 25 at 2:50pm · LikeUnlike · 2 peopleAshok Kumar Pandey and Rajeev Kumar like this..

6 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

काफी दिनों बहुत बढ़िया सारगर्वित आलेख पढ़ने मिला .... आभार

Girish Billore 'mukul' said...

Bahut umda
jaaree rahe sarakar

प्रवीण पाण्डेय said...

सार्थक विमर्श।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

भाई…आपको पूरा अधिकार है…किसी औपचारिकता की ज़रूरत नहीं

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

विमर्श को एक जगह प्रस्‍तुत करने के लिये, धन्‍यवाद समीर भाई.

समीर यादव said...

आपका बहुत आभार अशोक भाई.