Tuesday, November 30, 2010

स्त्री पर विमर्श - २ [फेस बुक]

अशोक कुमार पाण्डेय जी के फेस बुक प्रोफाइल पर हुए "स्त्री" पर विमर्श को संकलित कर प्रस्तुत है: स्त्री पर विमर्श भाग-२

"एक पोस्ट पर की गयी टिप्पणी के बाद तमाम महिला मित्रों ने वहाँ भी और अलग से भी कहा कि भाई औरतें घर का काम अपनी ख़ुशी से करती हैं। यह स्वाभाविक है। अक्सर नौकर ख़ुशी से सेवा करना सीख जाते हैं…प्रभावी वर्ग की विचारधारा को स्थापित कर दिया जाता है सबकी विचारधारा के रूप में…यह कन्डीशनिंग कैसे होती है इसे सबसे अच्छी तरह से औरतों के संदर्भ में समझा जा सकता है कि कैसे जिन चीज़ों को उनकी स्वतंत्रता तथा यौनिकता को नियंत्रित करने के लिये लागू किया गया था वे उनसे ऐसी कण्डीशन हुईं कि उसे स्वाभाविक फ़र्ज़ मान बैठीं।"

Ernest Albert sameer ji, kyon chinta mei rhaa ye pita, ya koi bhi pitaa, kyon 'maan' baithe hum ki meri, koi bhi ladki apna dhyaan nahi rakh sakti (kya wo pita, koi bhai itna zyaada khud ko jaante hue, 'purush' ko , uske taane-baane ko jaante hue apni, doo...sri ladki pe nazar rkhta hai....apni pe alag, doosri pe alag ??koi gehre baitha "bodh", ya "deh" ko , nari deh ko "izzat" ka prayaaye bnaa diya gyaa,do teen dashak pehle yehi "bodh" apne mveshiyon, ghodon aadi ke prati bhi thaa.....nahi क्या.
 Ashok Kumar Pandey वंदना दी ने बिल्कुल सटीक बात कही है…ज़रूरी नहीं कि आप प्रत्यक्षतः उन नियमों से शिक्षा ली हो…उनसे अपरिचित होते हुए भी मानसिक कण्डीशनिंग ऐसी हो जाती है कि उन कामों में आपको 'मज़ा' आने लगता है, उनसे 'संतोष' मिलने लगता है…सवाल ये है कि अपने बच्चों को उनके मन का बना कर खिलाने का यही संतोष पति क्यों नहीं मिलता?
  • November 25 at 3:13pm · · 5 people5 people like this.

  •  Vandana Sharma  मान लेते हैं की किंचित स्नेहवश भी थीयद्यपि पुत्र के प्रति नही थी ..सीधी सी दो बातें हैं ..पिता को पुत्री के 'शारीरिक बल ओर मानसिक'परिपक्वता' पर भरोसा नही था प्रथम तो कुछ उचित किन्तु दूसरा किसकी देन है ..अवचेतन में समाई मनु प्रदत्त व्यवस्था ...की ही ना ..पिता को पुत्री से अधिक बाहरी ''शूर वीरों '' पर भरोसा था

  • November 25 at 3:19pm · · 4 peopleLoading...

  •  Aparna Manoj jahaan dono working hain wahaan mil baantkar kaam hota hai . hindustan mein beti ki kai trah se conditioning hoti hai ...- beti ko shuru se jaane- anjaane kah diya jaata hai ki yadi aisa karogi to saas ye karegi .. aadi-aadi .. to aarmbhik ...shiksha hai ye ..yahi seekh lekar avchetan vidroh lekar jaata hai ..- beti ko gudiya thammai jaati hai ... bete ko car ...- beti koghar ke rakh-rakhaav ki atrikit shiksha ..anamika ji ki kavitaen yahaan lag jaayen to ye conditioning ki baat aur theek se samjh aayegi ..par itna avahya hai ki samay ke saath aaj ki pidhi mein bahut badlaav aaya hai ...dono milkar har front par kaam kar rahe hain . women empowerment ki zaroorat hai .. par balance rahe.. nahin to vikhandan dikhega ... marriage institution ka wahi hashr hoga jo pashchim mein hua ....extreme kabhi sukhdayi nahin hota.... har jagah virodh ke liye virodh ki pravriti bhi theek nahin. ham ghar ke kaam ko lekar itne pareshan kyon ...? jahaan swatantrata honi chahiye ham un sthaanon par chup kyon ho jaate hain?kiran bedi police vyavastha mein purush pradhan vyavastha ka shikar huin... tab ek lambi chuppi lekar baitha raha tantr. ham sirf itna kahate hain ki jahaan sach mein shoshan ho raha hai wahaan ham kyon nahin pahunch paate? sati pratha .. raja ram mohan ke karan khatm hiu par uske baad ka itihaas naari ko kitne hak dilwa paaya ....
    roti belane mein shoshan hai ..bachchon ko pasand ka khilane mein shoshan hai ... par jahaan ham hadon ko paar kar gaye un masalon par chuppi kyon?

  • November 25 at 3:58pm · · 3 peopleLoading...

  •  Vandana Sharma जिस दिन बेटी को गुडिया और बेटे को कार निश्चित कर दी गई अंतर तो वहीँ से प्रारंभ हो गया ..किसी भी प्रकार के शोषण के विरुद्ध उठाई गई आवाज ''विध्वंस हो जाएगा'' कह कर ही दबाई जाती हैकिरन बेदी यदि शोषण का शिकार हुईं तो भी इसके पीछे पुरुष वर्चस्व व...ाली स्थिति ही थी ..और रही स्त्री की हदों की बात ..उस पर हाय हल्ला के लिए हम खुद ही काफी हैं ..बाकी का कार्य शिव सैनिक सभाल लेते हैं ...बदलाव ...वह अभी दूर है ..क्यों कि हम तुम जैसी कमाऊ स्त्रियाँ मात्र १५% हैं प्रत्येक गुलामी कि वजह अशिक्षा एवम परनिर्भरता है ...

  • November 25 at 4:47pm · · 5 people5 people like this.

  •  Nirmal Paneri निर्मल पानेरी पर वंदना जी ...पिछले ७-८ सालों से जो कुछ एक स्त्री द्वारा निर्मित चल चित्र घर घर में देखा जा रहा है वो भी एक रूप स्त्री का जी !!!!!!!!!!!!!इस में पुरुष का कही हाथ नहीं है जी .....ऐसा रूप भी स्त्रियों का एक आम इन्सान ने इस टीवी पर ही देखा है ....!!!!!!!!!!

  • November 25 at 4:58pm ·

  •  Ashok Kumar Pandey मिल बाँट कर काम कर लेते हैँ…लेकिन मूलभूत ज़िम्मेदारी किसकी होती है? क्या यह सच नहीं है कि किचन होता औरत का है…पुरुष हेल्प करते हैं…बाहर की ज़िम्मेदारी और अधिकार पुरुष के होते हैं लेकिन औरत से 'पूछ' लिया जाता है…वंदना दी ने जो गुड़िया और कार की... बात की है वह बेहद मानीख़ेज़ है…स्कूली पाठ्यक्रमों में भी देखिये…पिताजी अख़बार पढ़ रहे हैं/माँ खाना पका रही है/भैया खेल रहा है/गुड़िया पानी ला रही है। और निगरानी वाला मसला बेहद महत्वपूर्ण है…आप ज़रा सा छूट लीजिये…या फिर बच्चों के बड़े होने पर जहाँ लड़की की यौनिकता निगरानी की जाती है और शुचिता से जुड़ी होती है लड़के के लिये वह विशेष मायने नहीं रखती…

  • November 25 at 5:01pm  · 4 peopleLoading...

  •  Vandana Sharma टी वी पर मत जाइए वहाँ हर बात अति है जैसे ही शेव कर आदमी निकला कि दस बारह बालाएं झट से लिपट गई या गश खा गयीं होता है क्या हर आदमी के कमस्कम तीन विवाह हैं दो तीन नाजायज ओलादें हैं ये सब है वहाँ ...

  • November 25 at 5:05pm · · 3 peopleLoading...

  •  Atul Arora shikshit hi nahin balki kai staron per atirikt dhang se jaagrook aur progressive gharon ki baat jo mainey pichhaley lagbhag 30- 35 varshon mein dekhi hai ...apney liye namooney ke taur per ...agar ijaazat ho to ...main dilli jaise mahanagar... ki baat kar raha hoon ..kahoon kya ki ek mnovritti /vyavhaar/practice/aur lagbhag parampara ki had tak leek pakad chuki sachhai ki tarah ubhar rahi hai ...vo yah ki ladkey apni shaadi ke baad alag ghar basa rahey hain aur ladkiyaan apney pati ke sahyog se apne ma-baap ke ghar ki dekh rekh mein bhi juti hain .

  • November 25 at 5:22pm · · 1 personLoading...

  •  Nirmal Paneri निर्मल पानेरी matlab jo dekha rahen hai vo sab bakvas hai .....stri kabhi aesi nahi ho sakti ?????????

  • November 25 at 5:27pm · · 1 personLoading...

  •  Atul Arora stree kabhi kaisee ho sakti hai ya purush ..baat yah nahin hai ..donon vaise bhi hain /ho saktey hain .....ek sajjan hain Veer bhupinder singh ji ...vo t.v per apna koi karyakram chalaatey hai ... kisi punjabi chhanel per.. gurbani ki nayi koi vyakhya kartey hue .. use bhi suniye ...t.v per maar dheron cheezein hain ji...'Sadbuddhi hi Sadbuddhi hai...'

  • November 25 at 5:37pm · · 2 peopleLoading...

  •  Ernest Albert all, निर्मल भाई , "पिछले सात आठ सालों में....ना...ना डेढ़ दो दशकों से कहिये..." ! आदमी शिकारी था, औरत नेस्ट / केव कीपर ...पर ये हजारों साल पहले...आज कुछ यदि बदला तो आदि मानव, उस मानव की स्त्री ने "देह" का शिलान्यास सीख लिया, खजुराहो से आगे ...जाने की सोच ली, पारम्परिक साड़ी तज दी , और कई पारम्परिक चीजें भी..आपने मैंने रोना, स्यापा करना सीखा पर अपने अपने घरों में ये सब होने दिया...नहीं क्या ? मेरे निजी विचार में फिरंगी ने हम सबको अपनी परम्परा, संस्कृति के प्रति एकजुट किया, अपर जैसे ही वो गया, हम उन्ही चेहरों, मुखौटों की तरफ हो लिए जो की थे हमारे लिए आज़ादी के मायने यही कुछ ...ये कुछ नया नहीं...हमारी अंदरूनी भूखें, हसरतें, हमारी मानसिकता ...आप माने न माने गंगा तो हमने ही सीवरेज बनाई ना....आप समझ रहे हैं ना ?

  • November 25 at 5:43pm · · 5 peopleLoading...

  •  Atul Arora Dil to bahut karta hai ki apney haathon ki hui ' maili ganga' saaf kar paaoon , per heraclitus ka kathan zindabaad ...'no man ever steps in the same river twice...'

  • November 25 at 5:52pm · · 1 personLoading...

  •  Ernest Albert कह तो सही रहे आप अतुल जी पर...वो जमाना, उन लोगों की हसरतें, भूखें(कोई) और ही थीं...और हमारी ? हम आज भी किसी भी शहर में " दूसरी, तीसरी दफा जाते हैं, पुल कई बार पार करते हैं" पर इस पर बाद में ! अभी इंतज़ार करीं की वर्ल्ड बैंक कब 6 बिलियन डाल...र देगा गंगा (माँ) को साफ़ करने के लिए...और चूंकि हम कोक पेप्सी को रिवर -राइट्स दे ही चुके तो 6 बिलिंन में गंगोत्री ग्लेशिएर का सौदा उनको बुरा नहीं रहेगा ! देश, जनता खुश "मेरी माँ 'साफ़' की जा रही और ये काफी जज्बाती हो रहेगा, फिरंगी फिर देश को जोड़ेगा! द्विजिन्द्र द्विज की कविता "इराक तो इक बहाना है / उन्हें वहां जाना है "!
    शुक्रिया जी
    November 25 at 6:06pm · · 1 personLoading...

  •  Atul Arora shukriya,Ernest ...baad ko baad hi theek hai...vishayaanter ho gaya ... Ashok K. Pandey se bhi maafi maang loon.?

  • November 25 at 6:25pm ·

  •  Musafir Baitha १९२१ में बिहार एवं उडीसा विधान परिषद की एक कार्यवाही महिलाओं को मताधिकार दिलाने को लेकर होती है, जिसके विरोध में कई महिलाएं भी आती हैं.जिस घर में बेटा को ज्यादा और बेटी को कम महत्व मिलता है, वहाँ माँ/महिला ही इस विभेद के मूल में होती है. क्या कीजियेगा,इस कंडीशनिंग को तोडना सहज नहीं. बेटे के लिए अतिशय बेचैनी अति शिक्षित महिलाओं के यहाँ भी मिल जाती है.

  • November 25 at 7:02pm ·  1 personLoading...

  •  Ashok Kumar Pandey जो प्रासंगिक हो वह कभी मेरी वाल पर कभी भी विषयांतर नहीं होता…आप निश्चिंत रहें अतुल जी…वैसे गंगा को एक विशिष्ट हिन्दू प्रतीक बनाना उसी परम्परा की नक़ल थी जिसमे ज़र्मन नस्लवादी कवि और दार्शनिक श्लेगल ने राइन को ज़र्मन राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया था…

  •  November 25 at 7:02pm · · 2 peopleLoading...

  •  Ashok Kumar Pandey यह शिक्षा उसी मनुस्मृतीय परिवेश में होती है मुसाफिर भाई जहां 'होम साईंस' जैसा विषय लड़कियों को पढ़ाया जाता है…मैने कहा न कि ये मुद्दा स्त्री बनाम पुरुष का नहीं है… November 25 at 7:04pm · · 1 personLoading...

  •  Aradhana Chaturvedi अशोक जी, स्त्रियों की अधीनता के विषय में ये सभी मनु के निर्देश एक व्यापक सोच के परिणाम थे. उमा चक्रवर्ती ने अपनी पुस्तक GENDERING CASTE: Through a Feminist Lens में बहुत ही अच्छे ढंग से बतायी हैं. ये टिप्पणी मैं नोट पढ़कर कर रही हूँ. बाकी वा...द-विवाद बाद में पढूंगी.

  • November 25 at 7:56pm · · 1 personLoading...

  •  Tahira Hasan activity of women and men are separted confinment to women in house and free movement for men but he can enter in private space according to his convenience and need.

  • November 25 at 9:12pm ·  · 2 peopleLoading...

  •  Apna Hindustan ASHOK JI AAP KA LEKH AURTON KE BAREY MEYN SOCHANE AUR UNKI DASHA PAR GAMBHIR VICHAR KARNE KO MAZBOOR KARTA HEY,AAP JAIE LOGO KI HIMMMAT SE HE YEH KARYA JARI RAH SAKTA HEY

  • November 25 at 9:16pm · · 1 personLoading...

  •  M.c. Gautam yah mamla janmjat hai.

  • November 25 at 9:26pm ·

  •  Ashok Kumar Pandey कौन सा? क्या मनु महाराज की शिक्षा क्या भगवान जी ऊपर से कान में फूंक कर भेजते हैं? अपने पूर्वाग्रह युक्त 'ज्ञान' का ऐसा भी प्रदर्शन मत कीजिये भाई!

  • November 25 at 10:04pm · · 1 personLoading...

  •  Amrendra Nath Tripathi आदमी को ही मयस्सर नहीं इन्सां होना .............हाँ कुछ चीजें जरूर अखरती हैं जिन्हें पितृसत्ता ने थोपा है !.... घूँघट किसी का शौक या सौन्दर्य-बोध नहीं हो सकता ( तर्क देने वाले ऐसे भी कहते हैं ,इसलिए ) , और न ही यह सही है की किसी मनु ने ही स...बको घूँघट - दीक्षा दी हो ... हम व्यक्ति-लक्ष्य से आगे बढ़ प्रवृत्ति-लक्ष्य की ओर जाएँ , तो बेहतर ! और हे भारतों , हम मैक्समूलर के अनुवाद से चीजें देखें , इससे बेहतर है की हममें योग्यता है की मूल ही देख लें !
    November 26 at 7:24pm


  •  Ashok Kumar Pandey एक कारण था मैक्समूलर का सहारा लेने के लिये…पहला भाई लोग ख़ुद ही दावा ठोंकते हैं कि दुनिया भर ने मनुस्मृति में वर्णित क़ानूनों और ज्ञान का लोहा माना है और दुनिया को मनुस्मृति मैक्समूलर साहब ने ही पढ़वाया था।

  • November 26 at 8:40pm ·

  •  Ashok Kumar Pandey और विश्वास कीजिये इन मनु महाराज से कोई ख़ानदानी बैर नहीं मेरा…मामला 'प्रवृतियों' का ही है भाई मेरे November 26 at 10:22pm ·  · 2 peopleAmrendra Nath Tripathi and Vandana Sharma like this.

  •  Sameer Yadav जो प्रवित्तियों की कमी है उसे मनु या किसी और से क्या जोड़ना...गलत तो गलत है. हाँ इसे जिन्होंने प्रचारित किया वे जरुर मनु-प्रवृत्त रहे होंगे ...लेकिन जाने-अनजाने में इसे आचरित अथवा पालन करने वाला हर व्यक्ति [ पुरुष-स्त्री ] कदाचित नहीं. इसलिए यदि इन प्रवृत्तियों के आज के सन्दर्भ में निरपेक्षता से समझाया जाये तो अधिक लोगों तक पहुंचा जा सकता है.


  • Sameer Yadav आप अधिक मान्य और सफल हो सकते हैं. November 26 at 11:16pm ·

  •  \Rajeev Rahi
    November 26 at 11:17pm · · 2 peopleLoading...

  • इस सन्दर्भ में ये कव्यपंक्तियाँ गौरतलब है-
    "इस समाज में
    शोषण की बुनियाद पर टिके सम्बन्ध भी
    प्रेम शब्द से अभिहित किये जाते हैं
    एक स्त्री तैयार है मन-प्राण से
    ...घर सँभालने,खाना बनाने,कपड़ा धोने
    और झाड़ू-बुहारी के लिए
    मुस्तैद है पुरुष उसके भरण-पोषण में
    हाँ बिचौलियों के जरिये नहीं
    एक-दूसरे को उन्होंने खुद खोजा है
    और इसे वो प्यार कहते हैं"-अलोक श्रीवास्तव
  • 3 comments:

    siddhidaatri said...

    स्त्री को अगर विमर्श का विषय बना दिया गया है ,तो इसमें भी पुरुष प्रधान समाज का हाथ ही है .
    हमेशा से उसे अबला कहना क्या ठीक है ?परन्तु स्त्री को पूरा सम्मान न मिल पाने के लिए
    कुछ हद तक स्वयं जवाबदार है .बचपन से उसके साथ भेदभाव उसे कुंठित बना देता है और
    वो अपने अधिकार के लिए आवाज़ नहीं उठा पाती.....सच है कि अपनों के लिए खाना बनाना उसे
    ख़ुशी देता है .परन्तु जब वो थाली उसके सर पे फेंक दी जाती है .......क्या तब भी वो उस अपने के लिए
    खाना बनाके खुश होगी .........

    समीर यादव said...

    @siddhidaatri -विमर्श में आपके इस बिंदु पर भी इंगित किया है....कोई समस्या है तो कहीं न कहीं इसमें ग्रस्त की भूमिका को भी परीक्षण किया जाना चाहिए ताकि निदान तक पहुँचाने की प्रक्रिया में कोई त्रुटि न रह जाये.
    .

    rajesh said...

    महिला दिवस है..सुनकर ऐसा लगता है जैसे किसी विलुप्त होती प्रजाति को संरक्षित करने का दिन.... महिलायें सहानुभूति की पात्र नहीं हैं बल्कि वे ऊर्जा, शक्ति, प्रेरणा का पुंज है...
    इन्हें दिवसों का मोहताज़ मत बनाइये. साल के 365 दिन आपके हैं...
    फिर भी रस्मन मनाये जाने वाले दिन की औपचारिक शुभकामनाएं........!